संविधान, विधान या शासनादेशो का परिवर्तन कितना ज़रूरी ? और किस तरह??
संविधान, विधान या शासनादेशो का परिवर्तन कितना ज़रूरी ? और किस तरह??
पीयूष अवस्थी
इधर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा आदि में अनेकों वाद -विवादों की स्थितियों का प्रदर्शन देखने को मिला! बात महत्वपूर्ण ये भी नहीं कि संविधान क्या है और उसका प्रारूप और परिवर्तन क्या होना चाहिए ? बल्कि विरोधाभाष की लपटों में ही घिरता नज़र आया ! किसने बनाया, कैसे बनाया, कैसे बनाया, किसने गलतियाँ की और किसने सुधार किया, उन्हीं दांवपेंचो में संसद की कार्यवाही चलती रही! अब हम तो सिर्फ़ अफ़सोस कर सकते हैं, क्योकि ये भी हमारी कमाई का हिस्सा खर्च हो रहा है, आखि़र कुछ हो न हो सांसद को 2000/- दैनिक भत्ता तो मिलना ही है, जो एक मनरेगा मजदूर से पाँच गुना अधिक है!
इस देश में चुनाव प्रक्रिया को अवश्य बदलना चाहिए, और ऐसे विषैले नियमों पर भी जो आम जनता से अलग सिर्फ़ कुछ लोगों के अलग से बनाये गये हों, आम आदमी भी जानता समझता है मगर कह नहीं सकता, उसकी ज़बान में ताले हैं जो ख़ुद उसने अपने साथ होने वाले अप्रत्याशित घटित होने वाले,सच के डर से डाले हैं !
मुद्दा ये महत्वपूर्ण भी है, और होना भी चाहिये कि देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार और कर्तव्य का अधिकारी होना चाहिए! चपरासी से लेकर बड़े अफसरों की तो गिनती ही क्या है, अपने देश की नीतियाँ बनाने से लेकर बजट को फ़ाइनल करने तक का काम तो अंतिम रूप से एक आई. ए. एस. अधिकारी ही करता है, उसमें भी हर विभाग का क्लर्क, अधिकारी और विभिन्न सरकारी अफसरों से निपटते हुये भाषण या देश के विभिन्न विभागों के बजट पूर्णाहुति पाते हैं, उद्घाटन या घोषणाएं सिर्फ़ मंत्री या अब तो सिर्फ़ महामंत्री करते हैं, मेरा यकीन मानिये अगर किसी विषय में उन्हें स्वयं लिखना पड़े तो, वो कार्यक्रम ही टल जायेगा! अफ़सोस होता है, कि अब देश में शायद डॉ राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू जैसे श्रेष्ठ नेता व अपनी क़लम से चमत्कृत करने वाले लोग पैदा ही नहीं होंगे!
पुनः पीछे लौटता हूँ, एक बार सांसद चुना जाने वाला व्यक्ति जो हाथों को जोड़कर, पैरों में गिरकर, कभी पार्टी की चमक से, कभी तन, मन, धन लुटाकर एकबार सांसद या विधायक बन जाता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है, ज़िन्दगी के साथ भी और ज़िन्दगी के बाद भी जैसी कहावतें उसके साथ लागू हो जाती हैं, एक आई. ए. एस. बनने में कितनी शिक्षा, कितनी पढ़ाई, कितना मानसिक श्रम लगता है, जब वो ज्वाइन करता है, तो उसे पहली तनख्वाह 1 लाख से ज़्यादा नहीं मिलती, और कुछ सुविधाएं, जिनमें सब्सिडी भी होती है, अह रू अब माननीय को देखिये पहली बार में ही 2.50 लाख करीब महीने का वेतन-भत्ता, टोल -टाल, फोन- ओन, नौकर-सिपाही रक्षा-कमांडो, ट्रेन-वेन, धरती क्या आसमान की यात्राएँ सिर्फ़ उनको ही नहीं, उनके पूरे परिवार के लिये मुफ्त-मुफ्त-मुफ्त…यानी….टैयाँ उनके बाप का ! और उसपर भी जलवा ये है कि समाज के अन्य वर्गों की तरह उनपर इनकमटैक्स का नियम लागू नहीं होता ! क्यूँ भाई क्यूँ ? क्या आप आसमान से उतरे हैं ? अब यह एक संवेदनशील मुद्दा हमारे वीर जवानों का भी है, जिन्हे मर्णाेपरान्त कोई मैडल, थोड़ा पुरस्कार, और पेंशन जैसी सुविधायें भी सामान्य केंद्रीय कर्मचारियों की तरह मिलती हैं, अगर सच में सर्वें करिये तो तमाम पूर्व शहीद सैनिकों के घर में अभावग्रस्त ज़िन्दगी के दर्शन होंगे! हर युद्ध में शहीद सैनिक को कम से कम इस मंहगाई में 2 करोड़ की त्वरित सहायता मिलनी चाहिए, जबकि उसके फंड का फिलहाल उसे 60 प्रतिशत जारी क्यूँ किया जाता है पूरा 100 प्रतिशत एकमुश्त मिलना चाहिए !
और एक सांसद या मंत्री ! वो जब गरीब की कुटिया में रोटी खाते हैं तो, उनके पड़ोस में रहने वाला उनका बालसखा ख़ुद को सुदामा समझकर गर्व करता है और माननीय उस मक्के की रोटी और सरसों का साग खाकर श्री कृष्ण की तरह आनंदविभोर हो जाते हैं, और महाभारत के संजय की तरह तमाम मीडियाकर्मी गुणगान कर अपनी निष्ठा व्यक्त करते है, वाह देश के कर्णधारों तुम्हारी नाटकीयता पर तनिक भी संदेह नहीं है !
कभी संसद सत्र को देखता हूँ, कभी चुनावी मार्ग रैलियों की स्थितियों को, कभी बाहर से बुलाई गई भीड़ की तमाम जनसभाओं की, कभी गोद लिये गये मीडिया को, कभी गोद से उतारे गये मीडियाकर्मियों के बर्रइयों की तरह उतर आये झुण्ड पर, जो कभी टिकता दिखाई देता है, कभी घबराकर बिकता हुआ!
पिछले लोकसभा चुनावों से लेकर विभिन्न राज्यसभा चुनावों तक, फिर संसद सत्र में संविधान, संविधान संशोधन पर तमाम चर्चाएं सामने आती रही हैं, सत्ता पक्ष की मांग अलग है, प्रतिपक्ष की अपनी कहन है, तो आखिर निर्णय कैसे निकलेगा! प्रतिदिन संसद में होने वाले तमाम खर्चाे को अगर जोड़ लोजिये तो, किसी भी शहर का एक मोहल्ला स्वर्ग न सही तो पेरिस ज़रूर बन सकता है ! दरसल दिक्क़त ये है कि जो बोलना चाहते हैं उनकी बात नहीं सुनी जाती, और जो सुनते हैं उनका टेलीप्रिंटर काम नहीं करता, बिना उसके वो जवाब देने के काबिल नहीं रहते, वो खामोश हो जाते हैं, सदन से बाहर चले जाते हैं, और छोड़ जातें है, गाली गलौज, झगड़ा, मारपीट कर संसद की कार्यवाही को स्थगित करने की प्रणाली!
विषय, मुद्दे तमाम से हैं लेकिन सत्ता पक्ष की एक बात बेहद अच्छी लगी और आवश्यक भी, वो है ‘‘एक देश -एक चुनाव’’ की …! कितना अच्छा सुझाव है, तमाम खर्चे बचेंगे, देश की एकता बढ़ेगी, वा…. ह ! शाबास ! फिर प्रतिपक्ष कहो या विपक्ष.. उसे दिक्क़त क्या है !
दिक्क़त किसी को नहीं होगी जनाब ! मेरी बातें ध्यान से सुनिए, सोचिये, परखिये, इस देश में वोट न डालने वाली अधिकृत 32 प्रतिशत जनता भी आपके साथ होगी! बशर्ते कुछ नियम और भी साथ में बदलने होंगे… न.. न.. घबराइये नहीं.. ये साधारण सी बातें हैं जो आपके सलाहकार आपको बता नहीं पाए या फिर आप जानते ही नहीं !
हर चुनाव के बाद चुनाव आयोग पर सवाल क्यूँ उठते हैं, प्रमाणिकता का अभाव है या पारदर्शिता का, EVM-EVM का शोर मचता है, जब गेंद आपके पाले में हैं तो आप बैलेट बॉक्स को मान्यता क्यूँ नहीं देना चाहते, तब इसके बाद एक देश एक चुनाव की मांग का कोई विरोध नहीं करेगा! दूसरा मुद्दा इसी से जुड़ा है, यह कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति भी माननीय मुख्य न्यायाधीश,सर्वाेच्च न्यायालय, विपक्ष नेता एवं सत्ता पक्ष के त्रिकोणीय सामंजस्य से होनी चाहिए! दरसल इस देश को चुनाव आयुक्त के रूप में एक बार फिर टी.एन. शेषन जैसा व्यक्तित्व चाहिए! आप तैयार हैं तो देश की पूरी जनता भी तैयार है, कोई भी पार्टी जो सत्ता में है, अगर देश की जनसंख्या को देखिए तो उसकी पार्टी के समर्थकों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम है, क्या सिर्फ़ 20 प्रतिशत लोग इस देश का भविष्य अपने तरीके से आंकना चाहते हैं, आज सत्ता में कोई है कल कोई और आएगा, राजनीति में कोई अमरौती खाकर नहीं आया है, आज आप हो कल दूसरा आ जायेगा, लेकिन ये जनता क्या करेगी ?
बहुत सारे मुद्दे हैं, जिनमें विशेष ध्यान जाना चाहिए, अन्यथा इतनी देर हो जाएगी कि हमारा हाल भी पड़ोसी देशों की तरह हो सकता है, ख़ुद को दुनिया की पाँचवीं अर्थव्यवस्था कहना,साबित करना आंकड़ों में आसान हो सकता है लेकिन धरातल पर…..?? ‘‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’’ में 119 देशों की सूची में भारत 103 वें स्थान पर है, जबकि 2014 में भारत 55 वें स्थान पर था, नई सरकार आते ही 2015 में यह 80 वें स्थान पर और 2016 में 97 वें स्थान पर पहुँच गया! पाँच किलो राशन, दुनिया भर का भाषण, उपरोक्त आंकड़े तब और घबराहट देते हैं जब हमें मालूम होता कि इस सूची में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार हमसे बहुत अच्छी स्थिति में हैं! ‘‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’’ में देखा जाता है कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पा रहा है!
दूसरा बड़ा मुद्दा ‘‘आवास’’ की समस्या भी बहुत विकराल है, आंकड़े 1.5 करोड़ भी नहीं दर्शाते, जबकि मंचों पर 4 करोड़ आवास दिये जाने का भाषण दिया जाता है, दरसल नेता जब शिलान्यास करता है, उन्हें भी आंकड़ों में जोड़ लेता है, अब वो बने हों या एक लम्बे समय तक बनने की उम्मीदें लगाये रहें! अगर शहरों की तरफ ग़ौर करिये, देश के हर शहर में रहने वाले लोगों में से 85 प्रतिशत लोगों के पास अपने घर नहीं है, वे या तो किराये के घरों में रहते हैं, या झुग्गी-झोपड़ी में या फुटपाथों पर अपना गुजर बसर करते हैं, इसमें सबसे अधिक समस्या ग्रस्त तो प्रवासी हैं, जो भले ही अच्छी नौकरी में शुरुआत कर रहे हों, ठेला -खोमचा लगाने वाले या ईंट गारा ढोकर, मंदिर, पुल, इमारत, संसद आदि बनाने के काम में लगे हों, इन्हें हमेशा ‘‘बाहर वालों’’ की नज़र से देखा जाता है, उनसे रैनबसेरों में भी वसूली होती है, इनकी मजबूरी है, परिवार पालने के लिये, नवजवान, अधेड के साथ बच्चों को भी तमाम असुविधाओं से गुज़रना पड़ता है! क्योंकि लगभग 32 प्रतिशत घरों के मुखियाओं के पास आय का कोई साधन नहीं है! जिस तरफ भी नज़र डालिये… सब धुआँ -धुआँ नज़र आता है ! फिर ये संसद चल क्यूँ रही है, क्या काम है संसद का या तथाकथित इन माननीयों का, पता नहीं आप जानते हैं या नहीं इस संसद की कार्यवाही में एक दिन का खर्च लगभग 6 करोड़ रूपये आता है, इसकी 30 दिनों की कार्यवाही के खर्च से कितने काम किये जा सकते हैं! सोचिये…. हम किस दिशा और दशा की ओर जा रहे हैं !
भारतीय जवान, मजदूर, इस देश के निर्माण की मज़बूत ताकत प्रवासी मजदूरों आदि सभी लोगों पर, विषयों पर इतना ध्यान देने की आवश्यकता है कि ये प्राथमिक सुधार जैसा कार्यक्रम लगता है! इन झोपड़ी झुग्गियो को अवैध कब्जे के नाम बुलडोजर चला कर मटियामेट कर दिया जाता है, ‘‘गाजा’’ की तरह और कमाल ये है जब चीन जैसा पड़ोसी,हमारी ज़मीं पर अवैध निर्माण करता है तो उसे कब्जा नहीं कहा जाता, क्योंकि दम नहीं है, हमारी सरकार का एक मंत्री कहता है, कोई कब्जा नहीं, वो टीन शेड कोई परमानेंट घर नहीं हैं, अब क्या कहूँ ऐसे लोगों को क्या कहूँ, बस उनके फोटो पर………अभियान चला सकता हूँ, क्योंकि मुझे महात्मा गाँधी जी के शब्दों को मनन करना आता है!
सच मानिये मैंने बहुत से नामचीन लोगों को मंच पर, पता नहीं लेकिन किसी नशे में भाषण करते देखा है, अगर यही हाल लोकतंत्र का रहा तो प्रजातंत्र आने में कोई समय नहीं लगेगा, साहब, बीबी और गुलाम फ़िल्म की स्क्रिप्ट नये ढंग से लिखी जाएगी! क्योंकि इसमें नायक महानायक है, जिसमें महामायावी अभिनेत्रियाँ बदलती रहती है, जिन्हें प्रश्नों के सही जवाब नहीं आते और एक-दो बागड़बिल्ले भी हैं जिन्हें अपनी जात नहीं पता वो दूसरे की जाति पूछने लगते हैं, ये सब मुद्दों को भटकाने की साजिश का अमर्यादित तरीका है !
खैर छोड़िये ! जो हुआ सो हुआ, अब आखिरी मौका है सुधार का, निम्न बिंदुओं को ध्यान में रखना ज़रूरी है….!
सबसे पहले ई वी एम हटाओ बैलेट लाओ
चुनाव आयुक्त, सुप्रीम कोर्ट चयनित करेगी
रेवड़ी बाँटने वालों पर सजा का प्राविधान
विधायक के लिये स्नातक व सांसद के लिये परास्नातक परीक्षा पास होना आवश्यक
और बहुत सी बातों को छोड़ भी देता हूँ, तो ये क्या हो रहा है साहिब….??? सरकारी खर्चे पर, रैली व जनसभाएँ, सेना के जहाजों व हेलीकाप्टारों पर देश के मंत्रियों का अपनी पार्टी की सभाओं में दुरूपयोग…?? जिस महामहिम को जनसभा या रैली करनी होती है उसी के आसपास किसी परियोजना, पुल आदि का उद्घाटन रख दिया जाता है, और इस तरह जनता और सरकार को निःशब्द करने की प्रक्रिया चलती रहती है, वो भी निर्बाध, और कोई पूछने वाला भी नहीं !
एक प्रधानमंत्री तो पूरे देश के लोगों का प्रधानमंत्री होता है, उसका दायरा तो पूरा देश होना चाहिए, चाहे किसी ने उसको वोट दिया हो अथवा नहीं ! अगर देश की रैली करनी हो तो कीजिये, किसी पार्टी का प्रचार करने से पहले इस्तीफा देकर किसी अन्य को कुर्सी में बैठाइये, फिर अपनी पार्टी का प्रचार करिये, आपकी रक्षा में प्रादेशिक पुलिस के अलावा सुरक्षा हेतु न जाने कितने कमाण्डों की ड्यूटी रहती है जिसके लिये सरकारी खजाने पर 600 करोड़ का सालाना खर्च आता है, जहाज, हेलीकाप्टर, भीड़ जुटाने वाली बसें, खाना-पीना और जाने क्या-क्या, आखि़र कितना खर्च होता है, एक एक जनसभा और रैलियों के नाम पर !
समस्याएँ इतनी अधिक है कि गिनाते हुये, कई किताबें पूरी हो जायेंगी ! दोस्तों यह किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है, देश का हाल है, आप नहीं होंगे कल दूसरा आएगा, वो भी आपका उदाहरण देकर, यही सब करता रहेगा! देश की तमाम समस्याओं पर गंभीरता से विचार करके उसका हल निकाला जाना चाहिए, सिर्फ़ चर्चा ही बनकर न रह जाये, बच्चो की प्राथमिक शिक्षा, जी. एस. टी., समान नागरिक संहिता, प्रवासी कामगारों के लिये, ठोस कार्य किया जाना, इलाज, रहने की व्यवस्था,, और रोजगार जैसे मुद्दे तो चीखते -चीखते गूंगे हो चुके है, इनपर विशेष ध्यान देने की सम्यक और महती आवश्यकतायें है, मैं विषयगत लिखता जाऊँगा, फिर भी यह शायद अधूरा ही रहेगा! अभी फिलहाल इतना ही, आगे इस विषय को जारी रखूँगा!
हमारा देश खुश रहे, तरक्की करे, समस्याओं का अन्त हो, हम सब दुनिया के पहले पायदान पर पहुंचें , यही कामना है! आपसे फिर मिलता हूँ… अगले अंक में! शुभकामनायें ..!!!
आपका अपना
– पीयूष अवस्थी
मुख्य सम्पादक
शब्दकार पत्रिका /शब्दकार प्रकाशन