आम वाक्य नहीं ” अब बस”
आम वाक्य नहीं " अब बस"
– मेघा राठी
आम जिंदगी में प्रयुक्त होने वाला एक आम सा वाक्य,”अब बस”। हमारे आस–पास घूमता यह वाक्य न जाने कितनी ही बार हमसे टकराता है। “अब बस” …छोटा सा यह वाक्य अर्थ की गहराई में इतना छोटा नहीं होता है। इस एक वाक्य के अंदर कई भाव छिपे होते हैं…कुछ प्रतीक्षाएं…सहन करने की क्षमता की सीमा का समाप्त हो जाना…साथ में कुछ प्रयासों की अनचाही असफलता और …देर से छिड़े हुए किसी विषय पर विराम की घोषणा।
लेकिन क्या यह सिर्फ एक वाक्य है? क्या यह सचमुच ” विराम” का पर्याय है? नहीं…इसके दीर्घ भाव को सोचकर देखा जाय तो यह वाक्य न तो ठहराव है और न ही थकान है बल्कि यह यह आगे सोचने की ओर बढ़ने से पहले विश्राम के लिए एक अल्प विराम है।
मन के सभी झंझावतों से मस्तिष्क को दूर करने लिए यह वाक्य गति अवरोधक की तरह सामने आता है और रोक देता है उन सभी विचारों को जिन्होंने जीवन में शिथिलता इतनी अधिक मात्रा में भर दी है कि अब उनके पार जाना मुश्किल लगने लगा है। “अब बस”..कहते के साथ थम जाता है नकारात्मक होते जा रहे विचारों– बातों का वेग जिसे रोक देना अत्यंत आवश्यक भी है अन्यथा वे मस्तिष्क की सही निर्णय लेने के प्रणाली पर प्रभाव डालने लगते हैं।
क्रोध के आवेग में कहा गया ” अब बस ” भी विश्राम की चाहत के साथ होता है ताकि संवेगों का प्रतिकूल प्रभाव जीवन पर न पड़े।
वस्तुत: इस वाक्य के बाद मस्तिष्क कुछ अंतराल लेकर संभावनाओं पर विचार करना चाहता है या अपनी अब तक जारी कार्य प्रणाली में बदलाव लाना चाहता है। वाह समझना चाहता है या समझ चुका होता है कि अब तक की प्रतीक्षा का फल उसे वांछित रूप में प्राप्त हो रहा है या नहीं।
यह अंतराल संभावनाओं में सकारात्मकता की तलाश करने के लिए होता है और यहां व्यक्ति की प्राथमिकता शांति की होनी चाहिए न कि आवेश में भरे किसी निर्णय की।
” अब बस” …इस वाक्य की सफलता उसके बाद लिए गए निर्णय की सार्थकता में निहित है। यह वाक्य बदलाव के निर्धारण के पहले का शंखनाद है और शंखनाद सकारात्मक परिणामों के लिए ही ध्वनित होते हैं अतः जब भी इस वाक्य का प्रयोग हो तो स्मरण रहे कि इसके बाद बोले जाने वाले शब्द बहुजन हिताय के लिए मार्ग प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका बनाए न कि आवेश के विष से संभावनाओं को झुलसा दें।
शब्दों के अर्थ जब सकारात्मक बनकर उच्चारित होते हैं तब वे सभी प्रकार से कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं और यही मानव का उद्देश्य भी होना चाहिए।
– मेघा राठी
उप संपादक’‘शब्दकार पत्रिका’’
संप्रति: लेखिका उपन्यासकार, अमर उजाला, दैनिक जागरण, जनसत्ता, पंजाब केसरी, वनिता, जागरण सखी, दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं, नूतन कहानियां आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें: गुस्ताखियां, उंगलियां व विभिन्न सांझा संग्रह,
निवास: भोपाल मध्यप्रदेश