सावन बरसे
भादों बरसे
बरसे बीच कुंँवार में
मेघ बावरे
ऐसे बरसे
ज्यों पत्ते पतझार में
तन-मन-धन
सब डूब रहे हैं
राहत के पल ढूंँढ रहे हैं
त्राहि-त्राहि
हर ओर मचा है
विधि ने कैसा खेल रचा है
जीवन बचा रही मानवता
नाव और पतवार में
अर्ध्य-प्रलय से
दृश्य दिख रहे
आसमान आफतें लिख रहे
बिलख रहे
दुधमुंँहे कहीं तो
वृद्ध माथ पर हाथ रख रहे
युवा विवशता की लहरों को
देख रहे जलधार में
जल में डूबा
शहर सुदर्शन
अवसादो में मन का दर्पण
अचरज भरी
जिंदगी ठिठकी
जल में क्या-क्या हुआ
न अर्पण
करें हवाई दौरे मुखिया
ठाठ करें दरबार में.
– डॉ मंजु लता श्रीवास्तव
डी १०८, श्याम नगर
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