डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लें

डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लें

- डॉ. राकेश जोशी

1

कोई दस्तूर ज़माने का निराला क्यों हो
ये अँधेरों का शहर है तो उजाला क्यों हो

ये सफ़र है तो तुम्हें भी तो कहीं रहना था
इक मेरे पाँव के ही नाम पे छाला क्यों हो

ये धुँआ आज जो निकले तो रुके फिर न कभी
कारख़ानों के लिए सिर्फ़ ये ताला क्यों हो

वो जहाँ भूख से मरते हैं हज़ारों-लाखों
तो वहाँ हाथ में तेरे भी निवाला क्यों हो

आसमां भी तो किसी रोज़ ज़मीं को थामे
इस ज़मीं ने ही उसे रोज़ सँभाला क्यों हो

ये किसी रोज़ उगे हम सभी लोगों के लिए
ये तो सूरज है, ज़रा देर भी काला क्यों हो

उसको गूंगों ने चढ़ाया है यहाँ सूली पे
उनकी बस्ती में कोई बोलने वाला क्यों हो

2

ज़िंदगी भर आदमी को आजमाता कौन है
जब भी हम गिरते हैं तो हमको उठाता कौन है

अब अँधेरा तो हमारी मुट्ठियों में क़ैद है
फिर अँधेरा बन के ये हमको डराता कौन है

इन किसानों की भी वो संसार में सबकी तरह
हाथ में तक़दीर लिखता है, मिटाता कौन है

रास्ते लाचार-से भटके हुए थकते हैं जब
रास्तों को रास्ता फिर से बनाता कौन है

कौन है जो देर तक सोता मिला है आज भी
टूटने से अब भी सपनों को बचाता कौन है

हर किसी को चाहिए सब पेड़, सारी पत्तियाँ
आग लेकिन फिर ये जंगल में लगाता कौन है

हाथ में हथियार ले, लड़ता है हरदम आदमी
हारता कोई नहीं फिर हार जाता कौन है

चाहता है हर कोई गमले में अपने कैक्टस
अब बगीचे में भला सब्ज़ी उगाता कौन है !

– डॉ. राकेश जोशी

प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष

अंग्रेज़ी विभाग

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला

देहरादून, उत्तराखंड

मोबाइल: 9411154939

ई-मेल: joshirpg@gmail.com

परिचय:

अंग्रेजी साहित्य में एम. ए., एम. फ़िल., डी. फ़िल. डॉ. राकेश जोशी वर्तमान में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड में अंग्रेज़ी विभाग में प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष हैं। इससे पूर्व वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के पद पर मुंबई में कार्यरत रहे। मुंबई में ही उन्होंने थोड़े समय के लिए आकाशवाणी विविध भारती में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर भी कार्य किया. उनकी कविताएँ लगभग सभी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी एक काव्य-पुस्तिका ‘कुछ बातें कविताओं में’, तीन ग़ज़ल-संग्रह ‘पत्थरों के शहर में’, ‘वो अभी हारा नहीं है’ और ‘हर नदी की आँख है नम’ अब तक प्रकाशित हुए हैं।

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