पागल
पागल
- उपमा शर्मा
शाम का ऑंचल झिलमिलाने लगा था। अपनी प्रचंड धूप समेट कर आदित्य नारायण अब बादलों की गोद में चल दिये थे। सुरमई आकाश दिन के बिखरे उजाले को अपने आँचल में,समेट मंद- मंद मुस्कुरा रहा था। मेरी आँखें सांझ की उस खूबसूरती को अपनी पलकों में समेट ही रही थी कि नजर बरबस ही सामने घर की छत पर बैठी उस परी से जा टकरायी। परी हाँ परी ही तो थी वो । काला लिबास पहने वो खुद भी इस सुरमई सांझ का कोई खूबसूरत हिस्सा लग रही थी। बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों में उदासियों के बादल जैसे ठहर से गये थे। रोज वो छत के हटनुमा बने इस खास हिस्से में खास वक्त पर जरूर आती थी। हमारी छत मिली होने के कारण एक दूसरे को देख हम मुस्कुरा देते थे। उन दिनों कोठी में कहकहों की जैसे बारिश होती थी। बात बात पर खिलखिलाना उसकी आदत थी। अक्सर ही उसकी और संचित की मुस्कुराहटें हर जगह बिखरी दिखाई देती थीं। पिछले कुछ वक्त से न संचित दिखाई दिया था न हँसी की वो बारिशें कहीं थीं। उसकी तरन्नुम कहीं खो गई थी। संचित जो मेरा सबसे खास होने का दावा करता था न जाने कहाँ गुम हो गया था ? और वो मेरे खास और अति प्रिय मित्र संचित की दोस्त । संचित प्रायः ही उसकी बातें बताता था। उदासियाों और उस परी का बड़ा गहरा नाता लगता था,आज उदासियाँ कुछ गहरा गयी थी ,उसकी आँखों के बादल बरस रहे थे। मेरा मन बेचैन हो उठा । पन्ने फड़फडाने लगे। कलम सच लिखने को कुलबुला रही थी। शायद एक नयी कहानी बनने को तत्पर थी।
दिती की कहानी जो अब तक उस सफेद कोठी की दीवारों में कैद थी। मेरे कदम अनचाहे ही पहुँच गये उस परी की उदासी का कारण बुनने। सुना था वो पागल हो गई है। किसी पर भी वार कर देती है। सबको उससे दूर रहने को आगाह किया जा चुका था।
‘दिती’ हाँ यही नाम था उस परी का। उस कोठी के इकलौते वारिस पीयूष की बेहद सुन्दर पत्नी। जब बोलती यूँ लगता कोई खूबसूरत सरगम बज उठी। हँसती तो बहार के खूबसूरत रंग-बिरंगे फूल गुनगुना उठते।
“दिती क्या हुआ ? आज इतनी उदासी क्यों ओढ़ ली है ,क्या हुआ गुड़िया ?”हाँ गुड़िया जैसी ही थी वो। उसके होठों की हँसी में हमेशा ही एक उदासी छुपी देखी थी मैंने। दिती की आँखों के बरसते सावन-भादों और तेज़ हो गये। मैंने उसे दिलासा दी तो वो मेरे कंधे से लग सिसक- सिसक कर रोने लगी। मैंने उसे चुप कराने की कोई कोशिश नहीं की। कि कई बार गमों का आँसुओं में धुलना जरूरी होता है। मैं उसके दुखों का भी गवाह था, उस पर बरसने वाली खुशियों का भी। लेकिन अब क्या था जो उसको चुपके-चुपके तोड़ रहा था। खूब रो लेने के बाद मैंने उसकी पीठ थपथपाई। कमरे में जाकर पानी का गिलास लाया। उसने चुपचाप गिलास होठों से लगा लिया।
“अब बोलो दिती संचित कहाँ गया? तुम हर रोज़ इस वक़्त छत पर क्यों आती हो? तुम्हें दरवाजे के बाहर क्यों नहीं निकलने दिया जाता। तुम्हारा बेटा मैंने कभी नहीं देखा। कभी उसे भी लेकर छत पर आओ। “बड़ी मुश्किल से बंद हुए आँसुओं का सिलसिला फिर वह चला।
“चुप हो जाओ दिती और मुझे बताओ तुम क्यों इतना परेशान हो? “
“आपको मुझसे डर नहीं लगा? “ दिती ने जबाब न देकर मुझसे सवाल पूछ लिया और जोर जोर से हँसने लगी।
“नहीं। लेकिन ऐसा क्यों पूछा तुमने? “
“ माँजी सबको मुझसे दूर रहने के लिए बोलती हैं। “ अब हँसी की जगह आँखों से आँसू छलक आये।
मैं जबाब में सिर्फ मुस्कुरा दिया और उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। आँसू फिर से बह चले।
“ऐसे रोती रहोगी तो मुझे कैसे कुछ बता पाओगी दिती।”
उसने अँगुलियों की पोरों से आँसू पोंछ लिए। अब वो काफी संयत दिखाई दे रही थी।
“आप कहानी लिखते हैं? “
“हाँ दिती। कोई किताब चाहिए? “ उसके इस वक्त इस सवाल का कोई दूसरा औचित्य मुझे समझ नहीं आया।
“भैया! आप मेरी कहानी लिखेंगे? मेरा और इस पीली कोठी का सच इस दुनिया के सामने लायेंगे? “
“जरूर दिती। “
भैया कुछ कहानियाँ गुमनाम होती हैं जो हवेली, कोठियों के तहखानों में दवा दी जाती हैं। जिनका काला सच किसी को पता ही नहीं चलता।
और कहती चली गयी दिती इस कोठी के वो राज जो दुनिया नहीं जानती थी। बीते लम्हे पन्नों के जैसे परत दर परत खुलते चले गये। “दिती! कहाँ गई थी?“
“ माँ पड़ोस की काकी ने बुला लिया था काम में हाथ बँटाने के लिए।उनके घर पर मेहमान आए थे।”
“किसीको बताकर तो जाती! तुझे पता है तुझे देर हो जाए तो मैं कितनी घबरा जाती हूँ। “
“इतना मत घबराया करो माँ। कॉलेज से देर हो तो घबरा जाती हो। किसी के घर पाँच मिनट देर हो जाए तो चिंता में पड़ जाती हो। घर पर कोई था नहीं किसे बता कर जाती। काकी अकेले पड़ गईं थीं।इसलिए जल्दी में चली गई।“दिती ने लाड़ से माँ के गले में बाँहें डालते हुए कहा।
दो भाई और तीन बहिनों में सबसे बड़ी थी दिती। कुदरत ने इस घर में बहुत दौलत तो नहीं दी लेकिन दिती को टूट कर रूप से नवाजा। पाँचो बहिन-भाई में अलग ही नजर आती वो। जितनी सूरत की प्यारी उतनी ही सीरत की अच्छी। जहाँ दो वक्त का खाने और बच्चों की पढ़ाई को लेकर जद्दोजहद रहती माँ परेशान रहती ।कहाँ से करेगी ब्याह इन तीन लड़कियों का। दिती बेपनाह सुंदर थी बाकी दोनों बेटियाँ इतनी सुंदर नहीं थीं। कहते हैं जवान होती बेटियों की माँ को नींद नहीं आती । यही दिती की माँ के साथ था। ऐसे में दिती की खूबसूरती से आकर्षित हो जब बड़े घर के लड़के पीयूष का रिश्ता आया तो दिती की माँ ने इसे भगवान का आशीर्वाद समझ एक पल न देर लगायी रिश्ता तय करने में। माँ अपने चारों बच्चों का भविष्य तय करने में लग गयी। इतने बड़े घर में ब्याही बेटी कुछ तो मदद करेगी। इन सब से अलग दिती की अपनी ही दुनिया थी। दुनियादारी से अन्जान एक मासूस लड़की। अपनी पढ़ाई पूरी करने का दिती ने बहुत शोर मचाया लेकिन जैसा आम परिवारों में होता है लड़की की न को उसकी शर्म मान रिश्ता कर दिया जाता है फिर यहाँ तो दिती की शादी के रूप में अपना भविष्य संवरता नज़र आ रहा था माँ को। दिती ने इसे ही अपनी नियति समझ हार मान ली। रोना-धोना छोड़ नये जीवन के सपनों में खो गई। ख्वाबों की पालकी में सवार ,जीवनसाथी से मिलन के सपने संजोती हुयी। अपने भाग्य पर इठलाती।अपनी नाजुक उँगली में सगाई की कीमती हीरे की अँगूठी देख इतराती रहती,अपनी खुशियों में मगन ये भी न सोचती उसका मंगेतर एक फोन भी क्यों नहीं करता ? उसके कानों में गूँजती तो बस अपनी सास की मीठी-मीठी बातें “हमारी बहू को जल्दी विदा कीजिए ,हमारा घर सूना है इसके बिना।कुछ नहीं चाहिए ,शादी हमारी कोठी में होगी।आप चिंता न कीजिए आपकी इज्जत अब हमारी इज्जत।”
दिती की माँ अपनी बेटी के भाग्य को सराहने लगी।हर पल आँखों ही आँखों में नजर उतारती रहती।सहेलियाँ मिलने -जुलने वाले रिश्तेदार सब दिती के भाग्य से जल उठे।और ब्याह की बेला भी आ गयी। अपनों के छूटने का दुख तो पिया मिलन की खुशी ,मिले-जुले अहसासों के बीच,सात फेरे और विवाह की पावन रस्मों से दिती पीयूष की हो गयी। महँगे कपड़े ,जेवर और आँखों में सतरंगी सपने ,दिती पर टूट कर रूप आया था। कितनी नजर उतारी थी बहनों ने लेकिन नजर तो लग चुकी थी।
सुहाग रात की बेला में सकुचाई, सिमटी सी दिती लाज की गठरी बनी बैठी थी। पूरा कमरा बेला, चमेली, गुलाब के सुगंधित फूलों से महक रहा था। पिया मिलन के सपनों में लिपटी दुलहन पीयूष की प्रतीक्षा में बैठी थी। दिती को क्या पता था सुहागरात के ये फूल काँटे बन जायेंगे! सतरंगी सपनों की सुनहरी किरणें कैक्टस की चुभन बन जायेंगी। पीयूष को देख लजायी-शरमायी दुल्हन छुईमुई के पेड़ सी हो गयी ।दिल खुशी की ताल पर नृत्य कर रहा था। कि भारी आवाज में छुपी बेबसी ने दिती के अरमान टुकड़े-टुकड़े कर दिये।
“मुझे माफ कर दो दिती ,मैं तुम्हारे लायक नहीं। मैं तुम्हें पति सुख नहीं दे सकता। तुम चाहो तो तलाक ले सकती हो।मुझे कोई आपत्ति नहीं।मैने माँ को बहुत समझाया नहीं मानी वो। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ , जो चाहे सजा दो।”
“ये क्या कह रहे हो पीयूष ?ये कैसा मजाक है ?नयी दुलहन से कोई ऐसा मजाक करता है क्या ?” दिती बेयकीनी से बोली
“ये कोई मजाक नहीं दिती ।मेरे जीवन का सच है जिसे मेरी माँ जानती हैं। मैने बहुत मना किया।माँ ने मेरी एक न सुनी।”
” लेकिन मैं ही क्यों पीयूष ?मैने क्या बिगाड़ा तुम्हारी माँ का ?” नयन कटोरे आँसुओं से भर गये थे।सिसकियों से कमरा भर गया था।
“रोओ मत दिती जो चाहे सजा दे लो। तुम इतनी सुंदर हो ,हर माँ की तरह मेरी माँ भी मेरे लिए चाँद जैसी दुल्हन लाना चाहती थी बिना ये देखे बेटा चाँद पाने लायक भी है या नहीं। फिर तुम ऐसे घर से हो जहाँ मेरी माँ ने तुम्हारी खुशियाँ खरीद कर अपना घर बहू से सजा लिया और मेरे अधूरेपन पर परदा डाल दिया।” जिस सुंदरता से दुनिया जलती थी वो खूबसूरती ही दिती की दुश्मन बन गयी थी । दिती कसक कर रह गयी। इतना बड़ा धोखा। शादी की पहली रात रोते-सिसकते बीत गयी। दुख पीयूष के अधूरेपन से कहीं ज्यादा इस धोखे पर था। दिती का हलक तक कड़वाहट से भर गया।सब कुछ जानकर क्यों बर्बाद की उसकी जिन्दगी ? क्या हक था उसे यूँ सपने दिखाने का। और माफी से उसकी जिंदगी सुधर जायेगी। किसी तरह सुबह हो और निकले यहाँ से। घर जाकर माँ-पापा को सब बताये। सिसकियाँ रूक ही नहीं रही थीं। क्या बीतेगी घर वालों पर! कितने अरमान से शादी की थी ।हीरे सा दामाद। उसी हीरे ने गला काट दिया दिती के अरमानों का। हीरे जड़ी सोने की चूड़ियाँ अब हाथ में चुभ रही थीं। हीरे के सेट गले में बोझ मालूम पड़ रहे थे। पीयूष क्लांत मुख लिये बैठा था। रात न जाने कितनी लम्बी हो गयी थी। काटे नहीं कट रही थी। एक तो बहते आँसू और उससे कहीं ज्यादा ख्वाहिश और ख्वाबों की टूटी किरचियाँ आँखों को जलन दे रही थीं। रात का सन्नाटा हिचकियों की आवाज से बिखर जाता। आज की रात दिती को बहुत बड़ी लग रही थी। आखिर काली रात विदा हुयी ,सुबह का जगमगाता सूरज मुस्कुराता हुआ खिड़की पर खड़ा था। लेकिन दिती की सुबह भी उतनी ही काली थी जितनी बीती रात। दिती की लाल आँखें दरवाजे पर उठीं,सास हाथ जोड़े खड़ी थी।
“बेटी हमारी इज्जत अब तेरे हाथ में है। चाहे इसे नीलाम कर दे या बचा ले। मेरे बेटे का कोई कसूर नहीं ।जो राज कोई नहीं जानता दुनिया जान जायेगी बेटा। तुम्हें यहाँ कोई कमी नहीं होगी। रूपया-पैसा,धन -दौलत। बेटी मेरे बेटे की इस कमी को छुपाने के बदले मैं तेरी झोली दौलत से भर दूँगी।”
“माँ जी,क्या ये दौलत मेरी खुशी मुझे लौटा देगी? क्या पति सुख दे पायेगी ये दौलत।”सिसक उठी दिती
“बेटी तेरे इस त्याग के बदले तेरी दोनों बहनों की शादी अच्छे घरों में हो जायेगी।उनका जीवन सँवर जायेगा।”
“नहीं,नहीं मेरी माँ कभी ये नहीं चाहेगी कि एक बेटी की खुशियाँ दाँव पर लग दो बेटियाँ खुश रहें। मेरी मम्मी को बुला दो।मेरा दम घुट रहा है यहाँ।मुझे मेरे घर जाना है।”
“दरवाजे के पीछे खड़ी सास-बहू का संवाद सुनती दिती की माँ आ खड़ी हुई “बेटी तेरी ससुराल वाले बहुत भले लोग हैं। दोनों परिवार की इज्जत तेरे हाथ है बेटी। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था। तेरी खुशियाँ बेचकर मैने तेरे बहिन -भाइयों की खुशियाँ खरीदी डाली बेटी,लेकिन मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था।”
हैरत और दुख के पहाड़ टूट पड़े दिती पर। उसकी जन्मदात्री ये क्या कह रही थी? उसके अपने घर वालों ने क्या किया उसके साथ। एक खिलौना बना दिया उसे। अपनों का गम ज्यादा दुखदायी था। फिर दिती कभी मायके नहीं गयी। जिन्हें उसकी खुशियों का मोल नहीं क्या करती वहाँ जाकर। हर रिश्ते से विश्वास उठ गया था। एक चुप् दिती के खूबसूरत होठों पर जैसे ठहर गयी।फिर कभी कोई शिकायत दिती के होठों से नहीं निकली।इस घर को अपना लिया था उसने। सच ही कहा था दिती की सास ने।धन-दौलत की रेल -पेल थी वहाँ। लेकिन कौन दौलत से पूरे सुख खरीद पाया है। दौलत से दिती की खुशियाँ खरीद कर भी दिती की सास पीयूष को खुशियाँ न दे पायी। दिती पूरे दिन गुमसुम सी घूमती रहती। पीयूष अपराधबोध में घिरा रहता। ससुराल वाले कुछ न कहते। दिती को पूरी आजादी थी जो चाहे करे। कहीं घूमे-फिरे लेकिन उसकी खुशियाँ ठहर चुकी थीं। हर चीज से उसका मन भर चुका था। सास उसकी कृतज्ञ थी ,कोठी का सच कोठी में ही था। दिती ने कभी पीयूष का सच बाहर नहीं जाने दिया।
दिन -महीने बीतते जा रहे थे।गुमसुम दिती ने अपने भाग्य से समझौता कर ही लिया था कि हवा के ठंडे झोंके से उसकी जिंदगी में संचित ने दस्तक । संचित दिती की सास की खास सहेली का बेटा। संचित की दिती के शहर में नयी-नयी नौकरी लगी थी।कैसे संभव था इतना बड़ा घर होते हुये संचित की आँटी संचित को कहीं बाहर रहने देतीं।
शुरू-शुरू में दिती संचित से दूर ही रहती,लेकिन धीरे-धीरे बातचीत होने लगी। उस सफेद कोठी का सच संचित के सामने खुलने लगा था। दिती की आँखों के गम संचित से छुपे न रह सके। दिती की आँखों की खूबसूरत बदलियों ने संचित को बेचैन कर दिया। संचित की बेकरारियाँ दिती से छुपी न थी लेकिन वो उस घर की बहू थी। ये सच था पीयूष ने कभी दिती पर रोक-टोक नहीं की थी लेकिन दिती ने भी कभी मर्यादा पार नहीं की थी,भाग्य का लिखा समझ समझौता कर लिया था। पीयूष दिती से नजरें नहीं मिला पाता था ,उसे लगता उसने दिती की जिंदगी बर्बाद की है। दिती अब कभी -कभी पीयूष के साथ बैठे संचित के साथ हँस बोल लेती थी। धीरे- धीरे प्यार के रंगों ने दिती को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया।अब दिती के दिन-रात महकने लगे गये । पति पीयूष के लिए बुझे प्रेम के दीप संचित ने प्रज्जवलित कर दिये थे।नये अहसासों ने दिती की दुनिया बदलकर रख दी। अब उसके दिन पंख लगाकर उड़ने लगे। मन पाखी प्रेम के खुले आकाश में संचित के साथ डोलता रहता। खुशियाों के हिंडोले में दिती झूलती रहती। सफेद कोठी का ये सच दिती की सास से छुपा न था। संचित और दिती की आँखों के खूबसूरत रंगों ने सब बता दिया था। दिती के दिन-रात बेहद खूबसूरत हो गये थे। गुमसुम सी रहने वाली दिती अब गुलाब के फूल सी खिली रहती। संचित और दिती की प्रीत पर जैसे प्रकृति भी खुश थी। बादलों की रिमझिम फुहारें मन को भीगों रही थीं। दिती की सास और पीयूष को बाहर जाना पड़ा था। बारिश रूकने का नाम नहीं ले रही थी।बाहर बगीचे में बारिश की दीवानी दिती भीग रही थी। बूँदों के कतरे चेहरे पर फिसल रहे थे।
“आओ न संचित बारिश में भीग कर देखो ,कितना अच्छा लगता है।मुझे बारिश बेहद पसंद है।”
“नहीं दिती ,मुझे बारिश से डर लगता है।तुम भी न भीगो,बीमार पड़ जाओगी।”
“कुछ नहीं होता संचित,आओ तो।”
खींच लायी दिती संचित को भी।आज संचित को भी बारिश अच्छी लग रही थी।जोर से बादल गरजे और दिती डर कर संचित से लिपट गयी।संचित की स्नेहिल छुअन से दिती की बबंद मुट्ठियाँ ढीली पड़ गयी…. यह बादल संचित और दिती दोनों पर खूब बरसा। तूफान आकर थम चुका था। बारिश के बाद हर चीज जैसे निखर गयी थी। दिती भी फूल की तरह खिल गयी। सफेद कोठी के फूलों पर भी जैसे टूट कर बहार आयी थी। दिती की खुशियों में ये फूल भी बेहद खुश थे। अब दिती के होठों पर तबस्सुम की लडियाँ खिली रहती।काली कजरारी आँखों में खुशी के दीप जलते रहते। मैं जब भी शाम को छत पर जाता दिती के गुनगुनाने की आवाज सुनता।एक अन्जाना सा रिश्ता बन गया था दिती की खुशियों से मेरा,आखिर मेरे खास मित्र की खुशियों की तरन्नुम थी दिती।
लेकिन आज फिर काली कजरारी आँखों में उदासी के बादल।फिर सावन की बेमौसम बारिश दिती की आँखों से बरस रही थी। क्या दिती की खुशियों को एक बार फिर नजर लगने वाली थी।एक ठंडी आह भरी साँस मेरे होंठों से निकल गयी।मैं दिती की उदासी का कारण जानने को बेकरार था।मेरी बेकरार आँखें दिती की तरफ उठी
“फिर क्या हुआ दिती ?”
“फिर।” दिती ने सिसकियों में आगे बताना शुरू किया।
कुछ दिन यूँ ही बीत गये। दिती के शरीर में आये परिवर्तन अब किसी से छुपे न थे।माँ बनने के रूतबे ने दिती को अलग ही खूबसूरती प्रदान की । दिती अब और भी सुंदर हो गयी थी। दिती घबरायी माँ जी और पीयूष क्या कहेंगे ?
“लेकिन दिती की सास बेहद खुश थी। दिती का खास खयाल रखा जाने लगा।नन्हें कदमों की आहट से सफेद कोठी झूम उठी। एक नन्हे वुजूद के आने की खुशी में दिती भी मगन थी। संचित के प्यार और इस नयी खुशी में आने वाले वक्त का दिती को पता ही नहीं चला। तय वक्त पर नन्हा मेहमान दिती की गोद में आ गया।कोठी के नन्हे वारिस के स्वागत में सब डूब गये। दिती की सास नन्हे की बलैंया लेते नहीं थक रही थी। सफेद कोठी फिर रंगों से गुलजार हो गयी।सब दिख रहे थे सिवाय संचित के।
दिती से रूका नहीं गया पूछ ही बैठी “माँ ,संचित कहाँ है? कहीं गये हैं क्या ?
“उसने ये नौकरी छोड़ दी बेटा। उसने अपने ही शहर में कोई नया व्यवसाय शुरू किया है। तुम अस्पताल में थी जल्दी में मिल न सका तुमसे।”
“माँ व्यवसाय,लेकिन संचित के पास व्यवसाय के लिए इतने पैसे कहाँ से आये।वो लोग हमारे जैसे कहाँ थे माँ ?”
तो क्या ? इसके आगे दिती से सोचा न गया।संचित इतना खुदगर्ज नहीं हो सकता।अपना बच्चा कैसे छोड़ सकता है?”
माँ ने एक बार फिर अपनी दौलत से अपने घर का बारिस खरीद लिया। एक बार फिर दिती की खुशियाँ बेच दीं। संचित ने दिती की मोहब्बत बेच दी। चंद सिक्कों के लिए छोड़ गया दिती को सिसकने के लिए। उन्होंने अपनी अलग दुनिया बसा ली लेकिन दिती की मोहब्बत उजाड़ कर। क्या रूपया-पैसा इंसानों और इंसानियत से ज्यादा जरूरी है भैया। सफेद कोठी की दरो दीवार एक बार फिर रो रही थी। दिती की खुशियों को नजर लग गयी ।सफेद कोठी की खूबसूरत परी फिर उदास हो गयी थी। बहार एक बार फिर रूठ गयी। कलियों ने खिलना छोड़ दिया,फूल मुरझाने लगे। दिती की गोरी रंगत साँवली पड़ने लगी। पाखी गुनगुनाना भूल गए और दिती के होंठों पर फिर एक चुप ने फिर बसेरा कर लिया। फूल-पत्ते ,पेड़ सब मुस्कुरा उठे लेकिन दिती की चुप न टूटी। प्रेम को धोखा दिती को तोड़ गया। नन्हे बेटे को जब-जब देखती दिती संचित की अक्स आँखों में ठहर जाता। सफेद कोठी और उसके बंदे बड़े खुश थे बस दिती की सास को कहते सुना है इतने बरसों बाद मिली खुशी ने उनकी बहू दिती को पागल कर दिया।आज भी शाम के वक्त छत के उस मखसूस हिस्से में दिती के कहकहे गूँजते हैं।
– डॉ. उपमा शर्मा
संप्रति : दंत चिकित्सक
लेखन की विधाएँ : कहानी, उपन्यास,लघुकथा ,कविता, यात्रा वृतांत, हाइकु, दोहा, कुण्डलियाँ, स्क्रिप्ट राइटर
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लघुकथा संग्रह ‘कैक्टस एवं अन्य लघुकथाएँ ‘ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित
उपन्यास ‘अनहद’ शुभदा प्रकाशन से प्रकाशित
अनुवाद : हाँ, मैंने तुम्हें क्षमा किया ( लेखक – गुरु भाई अमित शर्मा )
संपादन : लघुकथा संकलन ‘आस पास से गुजरते हुए’
‘महिला लघुकथाकार’
‘सहोदरी लघुकथा’
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