फटा नोट चलाने की कला
फटा नोट चलाने की कला
- अखतर अली
जितने भी प्रकार की प्रदर्शनकारी कलाए है उसमें एक कला की ओर आज तक किसी का ध्यान नहीं गया है जबकि इस कला का प्रदर्शन रोज़ाना सैकड़ो कलाकार बीच बाज़ार कर रहे है | यह है फटा नोट चलाने की कला | यह उतनी ही पुरानी कला है जितना पुराना नोट का इतिहास है | जब तक अर्थ व्यवस्था में नोट का आस्तित्व है तब तक इस कला के लुप्त होने की कोई संभावना नहीं है | इसे संरक्षण की ज़रा भी आवश्यकता नहीं है क्योकि यह कला इतनी सक्षम है कि इसे किसी सहारे की ज़रूरत ही नहीं |
नोट के फटने की एक निश्चित जगह होती है नोट उसी जगह से फटते है मानो उन्हें फटने का बकायदा प्रशिक्षण दिया गया हो या छापते समय उनमें एक निश्चित अवधि के बाद फटने की प्रोग्रामिंग फिट कर दी गई हो | कुकर फटना और बम फटने से भी वरिष्ठ है नोट फटना |
यहां ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसे कभी किसी ने फटा नोट न टिकाया और उसने इसे किसी और को नहीं चिपकाया | आदमी कितना भी होशियार हो , चौकन्ना हो वह फटे नोट के आगमन को रोक नहीं सकता क्योकि यहां हर किसी का कोई न कोई बाप मौजूद है | इसे ललित कला का भी दर्जा दिया जा सकता है | कला अकादमी के निर्देशक को चाहिये कि वे इस कला को भी सूचीबद्ध करे क्योकि फटे नोट को चलाने की कला से वो भी तो अपरिचित नहीं होगे |
यह नोट की शारीरिक विकलांगता हैं | कुछ लोग टेप चिपका कर इसकी मरहम पट्टी करते है लेकिन जैसे पैर में पलस्टर लगा आदमी भीड़ में अलग पहचान लिया जाता है वैसे ही टेप लगा नोट भी नज़र आ जाता है फिर भी आदमी धोखा खा जाता है | फटे नोट खंडहर हो चुकी ऐतिहासिक इमारत की तरह होते है , ये घर में बुजुर्गो की तरह होते है जो नहीं की तरह हैं | जेब में फटा नोट जूते में नुकीले कंकड़ की तरह होता है |
आदमी बवासीर हो जाने से इतना बेचैन नहीं होता जितना फटा नोट मिल जाने से होता है | फटा नोट मिलते ही आदमी मचलने लगता है उसकी अकल ठिकाने लग जाती है | जो अपने को तीस मार खां , डेढ़ होशियार , स्यांने , चलता पुर्जा समझते थे वो कल्पना की उंचाई से धड़ाम से गिरकर वास्तविकता की ज़मीन पर आ जाते है | उस समय आदमी की स्थिति उस हारे हुए प्रत्याशी की तरह हो जाती है जिसे जीतने की पूरी उम्मीद थी | अब उसे यही लगता है उसके साथ भीतरघात हुआ है |
हालांकि समीक्षक साहित्य में भी कम नहीं है लेकिन फटा नोट आदमी की कार्यप्रणाली का सच्चा समीक्षक है | यह मुंह देख कर समीक्षा नहीं करता | समीक्षा में अधिकारियों , संपादकों की लल्लो चप्पो भी नहीं करता | यह वो समीक्षक है जो आदमी को उसकी औकात बता देता है |
जुआड़ी और शराबी को फटा नोट चलाने की कोई टेंशन नहीं होती है | जुआड़ी फटा फट से फड़ में डाल फेट देता है दूसरे खिलाड़ी समझ ही नहीं पाते कि ये किसका नोट है और वह स्वयं औरों से पूछता है ये नोट किसने डाला | चूँकि शराबियों से ही अर्थ व्यवस्था संभली हुई है इसलिये उनके एकाध फटे में कोई टांग नहीं डालता है | फटा नोट प्राप्त होते ही शरीफ़ आदमी सोचता है काश वह जुआड़ी और शराबी होता | आज उसे अपने सादा होने पर बहुत गुस्सा आता है | पेट्रोल पंप भी इस महान कार्य को अंजाम देने का ख़ास अड्डा है | एक नोट चलाने के लिये दो लोग लगते है | एक पेट्रोल डलवा कर गाड़ी स्टार्ट रखता है और दूसरा आदमी के फटा नोट थमाते ही पहला तेज़ी से गाड़ी भगाता है इन्हें खतरों के खिलाड़ी भी कहा जाता है |
फटा नोट प्राप्त होते ही आदमी उसे चलाने की जुगत में लग जाता है | फटा नोट अकेला नहीं खपाया जा सकता इसे समूह में मिला कर चलाया जाता है | फटी आवाज़ , फटी कमीज़ और फटी छबि वाले फटे नोट चलाने में सफ़ल नहीं होते | फटा नोट चलाने में ऐसे अभिनय की ज़रूरत होती है जो ज़रा भी फटा अभिनय नहीं लगे | फटा नोट चलाने के लिये ध्यान देने वाली बात यह है कि जो नोट फटा है वैसे ही दस पन्द्रह अच्छे नोट में उसे मिलाया जाये | जैसे दस का फटा नोट चलाना है तो दस के नोटों में मिला कर चलाया जाता है क्योकि जाति वाले के दोष को जाति वाले ही छुपाते है |
साफ़ छबि वाले ही यह गंदा काम कर सकते है | पहले दुकानदार से सामान पैक करवा कर अपने कब्जे में ले लेना फिर उसके हाथ में पैसा देते ही उसके कपड़े की , या हेयर स्टाईल की या व्यापार में उसके अंदाज़ की प्रशंसा कर उसे बातों में उलझा देना ही फटा नोट चलाने का कारगर उपाय है जो हर बार सफ़ल होता है | यह तिकड़म केवल पुरुषो को ही करनी होती है महिलाओं से तो दुकानदार फटा नोट प्रेम पूर्वक स्वीकारता है | अगर इतनी बाज़ीगरी के बाद भी दुकानदार की नज़र में फटा नोट आ जाये तो ऐसा आश्चर्य करना मानो आपको इस फटे हुए नोट की ज़रा भी जानकारी नहीं थी | अब नेताओं की तरह दुकानदार को विश्वास दिलाना होता है कि अभी मेरे पास और पैसे नहीं है आप इसे रख लीजिये नहीं चलेगा तो मेरे को वापस दे देना मैं आपको दूसरा नोट दे दूंगा | यह बात दोनों पक्षों को मालूम होती है कि अब न कोई आयेगा न नोट बदलायेंगा इसे तो फिर किसी को टिकाना होगा |
– अखतर अली
निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल
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