शिक्षा बना मुनाफे का बाज़ार

शिक्षा बना मुनाफे का बाज़ार

अम्बिका कुशवाहा "अम्बी"

आज सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकली थी, घर लौटने से पहले सोची थोड़ी सब्जियाँ खरीद लूँ। यह सोच मैं पार्क से निकलते ही चल दी सब्जी मार्केट कि ओर। सब्जी बाजार में पहुँचते ही मेरी नजर एक शख्स पर पड़ी। जाना पहचाना चेहरा.. अरे ये तो अमरजीत भैया है। अमरजीत भैया ने भी मुझे देखते ही पहचान लिया। अमरजीत हमारे घर मे 10 साल पूर्व किरायेदार के रूप में रहते थे। और प्रतियोगी परीक्षाओं कि तैयारी किया करते थे।

अमरजीत भैया ने मुझे देखते ही मेरे पास आए। मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भईया ने भी मुस्कुराते हुए आशीर्वाद दिया।

मैंने कहा- अमर भईया.. सब ठीक है? आप इतने दिनों में भूल ही गए होंगे। अब तो आपकी जॉब भी लग गई होगी।

अमरजीत भैया मुस्कुराते हुए बोले- हाँ सब कुशल चल रहा है। मैंने खुद का कोचिंग संस्थान खोला है। यही पास ही गाँधी पार्क के बगल में।

मैंने कहा – वाह भईया! ये तो बहुत अच्छी बात हैं। किस क्लास के बच्चों को पढ़ाते हो आप?

अमरजीत भैया बोले- बबुनी, स्कूल के बच्चों को नही बल्कि SSC, रेलवे, बैंकिंग जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाता हूँ।

(भईया की ये बात सुन मुझे अच्छा लगा क्योंकि एक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर चुका व्यक्ति ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का महत्व, मेहनत और संघर्ष को भली-भाँति समझ सकता हैं।)

अमरजीत भईया आगे बोले- कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हो, तो हमारे कोचिंग जरूर भेजना। हम उचित कम मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण पढ़ाते है।

(मेरी दिमाग में कई कोचिंग सेंटरों के बड़े बोर्ड घूमने लगे। जिसपर लिखा होता है तैयारी कि 100℅ गारंटी हम लेते हैं)

मैंने पूछा -भईया! आप फीस कितनी लेते हो?

अमरजीत भईया बोले – हमारे कोचिंग फीस सामान्य विषय से लेकर स्पेशल सब्जेक्ट तक रुपये 20,000 से 80,000 तक औसत समझ लो।

(यह सुनकर अब तक जो सोच रही थी अमरजीत भईया के कोचिंग चलाने के बारे में वो सोच मेरी गलत साबित हुई। जो बंदा 10,000 तक कोचिंग फीस भरने के लिए चाय ब्रेड खाकर पढ़ाई करता था। उनकी भी कोचिंग का इतना ज्यादा फीस की मध्यम वर्ग के स्टूडेंट भी फीस का मानसिक तनाव झेलते रहे।)

मैंने कहा – वाह.. भईया वाह! बड़ी कम फीस है। कई कोचिंग तो स्टार्टिंग टाइम 5% या 10% डिस्काउंट भी देती है। खैर मैं कोशिश करूंगी। कोई न कोई मिल ही जाएँगे जिसे आपके कोचिंग भेज सकूँ।

(अमरजीत भईया का बदला हुआ चेहरा बता रहा था वो मेरे द्वारा किया गया व्यंग समझ चुके थे। लेकिन उन्हें ये भी पता था कि सामने से प्रत्यक्ष बोलना मेरी आदत हैं।)

मैं सब्जियाँ भी खरीद चुकी थी मैंने अमरजीत भईया से बोला, भईया! अब मैं चलती हुँ ऑफिस भी निकलना है फिर। वहाँ से विदा ले मै घर की ओर चल पड़ी।

रास्ते में मेरे दिमाग में बस यही चल रहा था कितनी महँगी हो गई है शिक्षा। छोटे बड़े स्कूल से लेकर कोचिंग सेंटर तक लाखों की फीस, बाजारों में महँगी हुई किताबें। फीस भरने में घर खेत गिरवी हो जा रहे है। कैसे पढेंगे बच्चे? कैसे बढ़ेंगे युवा? इन सब चीजों के बाद भी बेरोजगारी का अलग दंश।

“सब पढ़े.. सब बढ़े” का नारा खोखला दिख रहा है।

जब शिक्षा ही अति मुनाफे का व्यापार बन चुका है तब क्या ही बनेगा शिक्षा सबका अधिकार?

 

– अम्बिका कुशवाहा “अम्बी”

पटना -1 (बिहार)

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