हरिवल्लभ शर्मा “हरि” की कविताएँ
हरिवल्लभ शर्मा "हरि" की कविताएँ
- हरिवल्लभ शर्मा "हरि"
हों नहीं कुंठित हमारी भावनाएं।
कर्म में सब शक्तियों को हम लगाएं।
जिस लिए यह जन्म मानव का मिला है,
तोड़ तन्द्रा आत्मा को हम जगाएं।
तोड़ सकता व्यूह अभिमन्यु यहाँ तो,
हैं युवाओं में बहुत संभावनाएं।
वज्र की छाती बना आघात झेलें,
वार हित फ़ौलाद की करिए भुजाएं।
तोड़ कुंठा की कठिन कारा उठें अब,
चल पड़ें कर्तव्य हम अपने निभाएं।
है उफनता सिन्धु दूषित युग गरल का,
मथ समंदर रत्न अमृत जग लुटाएं।
मध्य आये यदि विपत गिरि कूट कोई,
मार कर ठोकर रसातल को पठाएँ।
कर रहे विस्मृत हमारे शौर्य को क्यों,
कीर्ति की गाथा पुरातन भी पढ़ाएं।
याद कर लें ‘हरि’ विवेकानंद को हम,
फिर सनातन राष्ट्र का बीड़ा उठाएं।
– हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’
जन्मतिथि- 07.06.1953
शिक्षा- स्नातकोत्तर (वनस्पति शास्त्र), स्नातकोत्तर डिप्लोमा- क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस।
संप्रति : सेवा निवृत्त पुलिस अधिकारी मप्रपु
पता- 7 D, 402, रीगल टाउन, अवधपुरी भेल, भोपाल, मध्य- प्रदेश, पिनकोड- 462022
ईमेल- harivallabh.sharma58@gmail.com
मो.- + 918839491673