अखिल ब्रह्मांड अंड सा दिखता जिसे
स्वर्ण पृष्ठों पर इतिहास है लिखता जिसे
हिमालय शिखर पर
सूर्य जैसा जो उगा है
प्रात जिस की आवाज सुनकर
प्रकाश पुंज बनकर जगा है
कौन है वह
चल रहा जो
लिए गति क्रमिक है
अजेय योद्धा
विश्व पथ का वह श्रमिक है
कौन बंजर धरा की गोद में पौधे उगाता
कौन धरती के वक्ष पर दीवारें उठाता
लौह दानव से युद्ध दिन भर
लड़ता कौन है
सिर पर धरे आकाश सारा
हिमगिर पर चलता कौन है
कौन है वह
जो पसीने के मोतियों से
नव धनिक है
सृष्टि भर का बोझ ढोता
वह श्रमिक है
– अशोक कुमार बाजपेई
वरिष्ठ साहित्यकार
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