‘‘अपना’’
लघुकथा
‘‘अपना’’
शोभा रानी गोयल
पड़ौस के घर में बच्चे की किलकारी गूंजी तो अनु का दिल बैठ गया। विवाह को दस वर्ष हो गए। अभी तक उसका दामन खाली था। एक से बढ़कर एक डाक्टरों से खूब इलाज लिया। मंदिर दिवाले सब धोक लगाये। प्रार्थना मंत्रोच्चार सब किये। नतीजा वही..सिफर।
पड़ौस में खेलते बच्चों को देखकर अनु के दिल में टीस उठी काश उसका आंगन भी गुलजार होता। जब भी अनु दुःखी होती वह गांव में अपनी सास को फोन लगाकर बात कर लेती थी। उसकी सास उसे ढांढस बंधाती एक दिन उसकी कोख ज़रूर हरी होगी। सास की बातों से अनु को हौसला मिलता। उसका दिल हल्का हो जाता।
शाम को देव घर देर से लौटा। अनु के पूछने पर देव ने ताना दिया तुमने गोद में खेलने वाला कोई खिलौना दिया है जिसके लिए घर जल्दी आऊं। देव की बात से अनुका मन उदिग्न हो गया।
इस बार अनु का मन कराह रहा था वह किसी भी तरह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। सास ने परिस्थिति की नज़ाकत समझते हुए कहा- अनु परेशान मत हो, मैं कल तुम्हारे पास आती हूँ।
मां के घर आने से देव और अनु बहुत खुश हुए। घर में चहल-पहल हो गई मगर फिर भी कुछ कमी सी थी जिससे चेहरे बुझे हुए थे।
उन्होंने अनु और देव को समझाया- क्या हुआ यदि हम सृजन का सुख नहीं उठा सकते। इस बात का ग़म कब तक मनायेंगे। मंज़िलें और भी हैं। तुम दोनों किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लो। इससे खुद का घर गुंजायमान होगा ही, साथ ही किसी का जीवन भी संवर जायेगा।
नहीं मां, पराया खून कभी अपना नहीं हो सकता। देव ने स्पष्ट स्वर में कहा।
देव की बात सुनकर अनन्या का दिल टूट गया।
ऐसा नहीं कहते देव, जिसे प्यार और स्नेह से पालोगे वह अपना कब बन जाता है पता ही नहीं चलता। मां ने देव को समझाया।
मैं नहीं मानता मां !
बरसों पहले यदि तुम्हारे पिताजी यही सोचते तो तुम अपने कैसे होते। तुम भी तो….
सच्चाई से वाक़िफ होते ही देव अवाक् रह गया।
– शोभा रानी गोयल
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