अधरों में प्यास बो गया

गीत - नवगीत

अधरों में प्यास बो गया

जयराम जय

सिमट गये
इन्द्र धनुष बाँहों के
आकुल आकाश हो गया

नाच रही किरन-किरन
रंग का रचाव लिये
शब्द-शब्द प्राण हँसे
प्यार का प्रभाव लिये

हौले से
तोड़ बाँध संयम के
अधरों में प्यास बो गया

बहकती बहार हँसी
मौसम के संग -संग
नेह बेल छैल गई
तरुवर पर अंग-अंग

अधरों में
महक गया चन्दन वन
जाने क्या खास हो गया

आतुर थे दोनों तट
मिलने को आर-पार
नदिया में डूब -डूब
जाने को बार-बार

दहक रही
मधुगन्धी साँसों को
सोंधा विश्वास हो गया
सिमट गये
इन्द्र धनुष बाँहों के
आकुल आकाश हो गया

– जयराम जय
‘पर्णिका’ बी-11/1, कृष्ण विहार
आवास विकास, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र.)
मो.नं.9415429104 ;9369848238
E-mail-jairamjay2011@gmail.com

 

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