देवमणि पाण्डेय की दो ग़ज़लें
ग़ज़ल बोलती है
देवमणि पाण्डेय की दो ग़ज़लें
देवमणि पांडेय
(1)
टूट गई है लय जीवन की सुर ग़ायब हैं ताल नहीं
क्या कुछ हमसे छूट गया है इसका हमें ख़याल नहीं
अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए
ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं
दिनभर खटा धूप में लेकिन कुछ भी हाथ नहीं आया
क्या खाएंगे बच्चे आख़िर घर में आटा दाल नहीं
क्या क्या नहीं दिया बच्चों को इंटरनेट की दुनिया ने
फिर भी उनके अफ़सानों में क्यूं बूढ़ा बेताल नहीं
दौलत वालो! देख लो आकर क्या हैं ठाट फ़क़ीरों के
जहां भी रहते ख़ुश रहते हैं भले जेब में माल नहीं
अच्छा दिखने की ख़्वाहिश तो हर इंसां में होती है
फिर भी जो बदनाम है उसको इसका कोई मलाल नहीं
ख़्वाब को मंज़िल तक पहुँचाना बेहद मुश्किल है लेकिन
कभी कभी महसूस हुआ है इसमें कोई कमाल नहीं
(2)
पढ़लिखकर क्या करेंगे आख़िर राम श्याम रहमान वग़ैरह
ये भी इक दिन बन जाएंगे चपरासी दरबान वग़ैरह
रोज़ी-रोटी के चक्कर में हमने ख़ुद को गंवा दिया
कहां गया अपना वो तेवर, ख़ुद्दारी,पहचान वग़ैरह
दूरदूर तक आदर्शों से रिश्ता नहीं सियासत का
इनमें कहां नज़र आएंगे सच्चाई, ईमान वग़ैरह
दौलत,शोहरत और प्रतिष्ठा सब कुछ हासिल है फिरभी
किसे पता क्या ढूंढ रहे हैं ये अमीर, धनवान वग़ैरह
फ़िल्में अगर नहीं चलतीं तो सोचो इनका क्या होता !
काट रहे हैं चांदी हरदिन अक्षय और सलमान वग़ैरह
हम हैं सीधे सादे इंसां कोई ऐब नहीं हम में
कभी कभी बस ले लेते हैं,सिगरेट,विस्की,पान वग़ैरह
कम से कम इतवार के दिन तो अपने घर पे रहा करो
बिना बताए आ जाते हैं यार-दोस्त, मेहमान वग़ैरह
– देवमणि पांडेय
सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में जन्म। कविता संग्रह: दिल की बातें, खुशबू की लकीरें, अपना तो मिले कोई प्रकाशित।
संपादन: संस्कृति संगम (मुंबई की सांस्कृतिक निर्देशिका)
सम्मान: विश्व हिन्दी सेवा सम्मान (उज्जैन), साहित्य गौरव सम्मान (मुम्बई), सृजनश्री सम्मान (ताशकंद), भाषा भारती सम्मान (ग्वालियर), शान-ए-अदब अवार्ड (त्रिवेंद्रम), त्रिसुगंधि साहित्य रत्न सम्मान (पिंडवाड़ा), फिल्म ‘‘पिंजर’’ के गीत ‘‘चरखा चलाती माँ के लिए बेस्ट लिरिक्स ऑफ दि इयर’’ से पुरस्कृत।
पता: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063