‘पिता हूँ मैं’
पुस्तक समीक्षा
‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
पुस्तक: ‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
प्रकाशक: शब्दकार प्रकाशन, ग्रेटर नोएडा
रचना शैली: क़तआत-खंडकाव्य
भाषा: हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू
कीमत: 700/- पृष्ठ: 144
‘पिता हूँ मैं’ : एक अद्भुत, अनूठा खण्डकाव्य
– डॉ. सुरेश अवस्थी

परमपिता शब्द आते ही परमात्मा का स्मरण आता है। परमात्मा जिसे हमने देखा तो नहीं पर जिसकी किसी न किसी रूप में उपस्थिति की अनुभूति हमें सदैव होती रहती है। वास्तव में परमपिता एक मिथ है जिसकी अनुभूति की जा सकती पर हमारे जीवन में परमपिता जीती जागती अवर्चनीय, अभिनन्दनीय व अनुकरणीय भूमिका का निर्वहन करने वाला एक जीता जागता प्रत्यक्ष मिथक रहता है जिसे हम सभी पिता कहते हैं। पिता को जन्मदाता, पालनहार जैसे विशेषणों से भी संबोधित करते हैं पर पिता एक ऐसा संबोधन है जिसे परिभाषित करना भाषा से परे होता है और भाव के निकट होता है।
दुनिया की हर भाषा के साहित्य में जन्मदात्री माँ पर केंद्रित साहित्य की रचना हुई हुई है पर पिता पर केंद्रित काव्य साहित्य बहुत ही कम उपलब्ध है। गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीराम चरित मानस को लें तो पिता के रूप में दशरथ की भूमिका मात्र पत्नी कैकेई द्वारे मांगे गए वरदान स्वरूप श्री राम को चौदह साल का वनवास देने और फिर पुत्र विछोह में जीवनलीला त्याग देने वाली भूमिका में सिमट जाती है। चारों पुत्रों को सुयोग्य, सदाचारी, परमवीर व विवेकी बनाने की पिता की भूमिका केंद्र में स्थान नहीं पा सकी। ऐसे ही अन्य महाग्रंथों में भी पिता को कम ही स्थान मिला।
विगत दिवस कविवर पीयूष अवस्थी की एक कृति श् पिता हूँ मैंश् की पांडुलिपि का अध्ययन करने का अवसर मिला तो पिता की बहुआयामी भूमिका के इंद्रधनुषी रंगों से रूबरू हुआ। कवि ने पिता को केंद्र में रख कर कुछ वैसी ही विश्व परिक्रमा की है जैसी पौराणिक सन्दर्भों में कभी श्री गणेश ने माँ-पिता की परिक्रमा करके सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने के पुण्यफल के रूप में प्रथम देवता होने का गौरव प्राप्त कर लिया था। काव्य कृति के एक बड़े भाग में पिता महात्म्य को कताअ के माध्यम से श्पिता उवाचश् के स्वरूप में उसी शैली में प्रस्तुत किया है जैसे कभी भगवान कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप प्रकट करके स्वयं केश् अहम ब्रम्हाष्मिश् का उद्घोष किया था। पूरे काव्य में श्पिताश् स्वयं के विविध रूपों स्वरूपों को प्रकट करता है। जिन्हें भी पिता होने का अवसर मिला है या जिन्होंने अपने पिता को विशद रूप से समझने का प्रयास नहीं किया वे काव्यकृति की एक -एक पंक्ति में पिता के विराट स्वरूप को वैसे ही समझ सकेंगे जैसे परम् पिता के विराटत्व को महाकवियों ने प्रकट किया है।
कृति में चार चार पंक्तियों में पिता को जिस चेतना, गरिमा और गवेषणा के साथ रूपायित किया गया वह न केवल मन, मस्तिष्क व ह्रदय को अभिसिंचित करवे वाला है बल्कि हर सन्तान को आने पिता का महत्व समझा के उसे गौरवान्वित करने वाला है। कौन पिता ऐसा होगा जो इन जैसी पंक्तियों को आत्मसात करके गर्व का अनुभव नहीं करेगा:
हर मुसीबत से तेरी पहले खड़ा हूँ
में तेरी खुशियों का ही तो काफिला हूँ
छत्र हूँ, छाया हूं तेरी, मैं वरद हूँ
मैं पिता हूं, मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ
और ऐसी पंक्तिया पढ़ कर कौन ऐसी सह्रदय सन्तान होगी जो अपने पिता पर गर्वानुभूति नहीं करेगी…..
मैं तेरी हिम्मत हूँ, तेरा हौसला हूँ
मैं तेरी तकदीर का हर फैसला हूँ
हार मत तू, हार मत तू, हार मत तू
मैं पिता हूँ, मैं पिता हूं, मैं पिता हूँ
किसी भी रचनाकार का विस्तृत अनुभव संसार, गहन संवेदना, विषयगत अनुभूतियों, काव्य रचना में प्रयुक्त छंद, उर्दू शाइरी के अरूज का शास्त्रीय ज्ञान-विज्ञान, विस्तृत द्रष्टि अध्ययनशीलता व भाषा पर अधिकार आदि के सामर्थ्य की ऊर्जा उसकी रचनाओं से प्रकट होता है। जब कोई रचनाकार किसी मौन साधक की तरह इन सभी सोपानों से अपनी अंतश्चेतना के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तभी कोई कालजयी, सारभौमिक रचना का जन्म होता है।कविवर पीयूष अवस्थी की रचनाधर्मिता में ये सभी तथ्य नैसर्गिकरूप से समाहित हैं तभी तो वह ऐसी तथ्यात्मक पंक्तियां रच पाते हैं:
जिंदगी कुरुक्षेत्र है, हम सब खड़े हैं
बस निहत्थों की तरह, मुर्दा पड़े हैं
अब लड़ाई अस्त्र शस्त्रों की नहीं है
हम तो बस चेहरे बदलते आँकड़े हैं
समाज में यह सहज ही प्रचलित है कि कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता और अनुभवों की संचित पूंजी से ही अपनी संतानों को जीवन संघर्ष के गुर सिखाता है। रचनाकार ने इस कृति में पिता के आत्मकथ्य के रुप मे बड़ी सहजता से प्रकट तो करता ही है और अपनी संतान की उड़ान को अपने से अधिक ऊंचा और विस्तृत आसमान देना चाहता है।इस सत्य को जिस सहजता से पीयूष अवस्थी ने एक कताः में जिस तरह से प्रकट किया है वह रचनाकार की सामर्थ्य को प्रकट करता है…
जो भी सीखा है सिखाना चाहता हूँ
आसमां तुझको दिखाना चाहता हूँ
कुछ परों को जोड़ कर बाहों में तेरी
खुद से भी आगे उड़ाना चाहता हूँ
इसी तरह का एक कता और द्रष्टव्य है जो रचनाकार के चिंतन की उड़ान के मजबूत परों की पहचान कराता है:
में तेरा बसुदेव हूँ, तेरा जनक हूँ
मैं तुम्हारी आत्मा की इक महक हूँ
जैसे चाहो दिल मे तुम अपने बसा लो
मैं तुम्हारी मुस्कराहट की चमक हूँ
एक पिता की संवेदना को कविवर पीयूष ने अलग अलग कताः में कितनी सहजता से जिया है जिन्हें दुनिया का हर पिता जीना चाहता है और जीता भी है-
तेरी मुठठी बन्द थी जब तू उगा था
मैंने सींचा, जब तुझे,तब तू खिला था
मैं हवा पानी हूँ तेरी, मैं गिजा हूँ
पुत्र बनकर यूँ नहीं मुझको मिला था
आँधियों में दीप सा जलता रहा हूँ
मैं तो तेरी रौशनी बनता रहा हूँ
बन गया जुगनू ,कभी तो चाँद, तारे
मैं अँधेरों से सदा लड़ता रहा हूँ
मैं यहाँ पर पाण्डु हूँ ,घृतराष्ट्र भी हूँ
मैं हिरण्यकश्यप के जैसा पात्र भी हूँ
हर कथा कहती है कुछ अपनी कहानी
मैं पिता के साथ इक सम्राट भी हूँ
सामान्य रूप से एक पिता अपने पुत्र में स्वयं की तस्वीर देखता है। उसी को केंद्र में रख कर सपने बुनता है। पुत्र के तदनुसार ही पाथेय चुनता है पर पीयूष अवस्थी ने कई कतआत में इस मिथ को तोड़ते हुए बेटी का पिता होने पर गर्व की अनुभूति करता है। पुरातन सोच की जंजीरों में जकड़े तमाम पिताओं के लिए उनका यह चिंतन अभिनन्दनीय व अनुकरणीय हैरू
मैं ही तेरे जन्म की भी व्यंजना हूँ
तेरे आने की खबर उद्घोषणा हूँ
तेरी जननी हर तरह से मुस्कराये
मैं भी खुश हूँ बाप बेटी का बना हूँ
कृति की हर पंक्ति सार्थक उद्देश्य से परिपूर्ण तथा जीवंत सन्देश देने वाली है।ऐसी कालजयी कृतियाँ कभी -कभी ,किसी -किसी की कलम से अपने स्वरूप में उतरती हैं। साहित्य, संवेदना और संरचना की वाग्देवी ने यह पुरष्कार प्रियवर पीयूष अवस्थी को दिया है। मेरा सुद्रढ़ विस्वास है कि यह कृति साहित्य की विपुल संपदा के मध्य किसी चमत्कारिक हीरा की तरह चमकेगी। सुधी काव्यप्रेमी व गुनी आलोचक इसका आत्मिक अभिनंदन करेंगे।
मेरी ओर से अशेष शुभकामनाएं !

– डॉ. सुरेश अवस्थी
विश्व के लगभग 26 देशों
में अनेकों बार काव्य पाठ
अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि
राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षाविद्
एवं वरिष्ठ पत्रकार
निवर्तमान विभागाध्यक्ष (हिंदी):
गुरुनानक कॉलेज, कानपुर