इंसान
इंसान
डॉ. शिखा अग्रवाल

कीर्ति की कार लाल बत्ती पर रुकते ही एक किन्नर ने कार की विंडो खटखटाते हुए पैसे मांगना शुरु कर दिया। कीर्ति ने बड़े ही उपेक्षित भाव से उस पर नजर डाली और दूसरी तरफ देखने लगी। अच्छी कद-काठी का वह किन्नर, कीर्ति की गाड़ी के शीशे पर तब तक दस्तक देता रहा जब तक गाड़ी आगे नहीं बढ़ गई।
थोड़ी ही दूरी पर मेडिकल स्टोर से मम्मी के लिए दवाइयां लेने के लिए कीर्ति ने गाड़ी रोकी। जैसे ही वह मेडिकल स्टोर की तरफ जाने लगी, किसी ने उसे धक्का देकर पर्स छीनने की कोशिश की। पर्स तो हाथ से नहीं छूटा लेकिन कीर्ति जमीन पर गिर पड़ी। उसने वहां खड़े तमाशबीन लोगों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन मदद करने की जगह उनमें से कुछ ने तो मोबाइल पर वीडियो बनाना शुरू कर दिया। तभी उसका हाथ मरोड़ कर पर्स छीनने की कोशिश कर रहे बदमाश की किसी ने धुनाई कर दी। फिर उठने का प्रयास कर रही कीर्ति को सहारा देकर खड़ा किया। अपनी सहायता करने वाले को देख कर वह चौंक गई। यह तो वही किन्नर है जिसे कुछ देर पहले वह बेहद हिकारत की दृष्टि से देख रही थी। “इस भीड़ भरी जगह में मौजूद इतने इंसानों में से किसी ने मुझे नहीं बचाया और आपने..”कहते हुए कीर्ति रो पड़ी। “हम भी तो इंसान हैं बहन” किन्नर ने सहज मुस्कान के साथ कीर्ति को कार में बिठाया और डॉक्टर की पर्ची लेकर दवाई लेने मेडिकल स्टोर की ओर चल दिया।
डॉ. शिखा अग्रवाल
राष्ट्रीय पत्र, पत्रिकाओं में नियमित रूप से कविताएं, कहानी और लघुकथाएं प्रकाशित।
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सीकर,राजस्थान
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