खुशियों के साथी
खुशियों के साथी
डॉ अलका अग्रवाल

उस दिन सड़क पर लाल बत्ती होने पर , जब मैने कार रोकी तो देखा कि एक बच्चा खिलौने बेच रहा है । उसके मासूम और दयनीय चेहरे को देखकर समझा जा सकता था कि उसे पैसों की सख्त जरूरत है। इसलिए अपनी जेब से कुछ रुपये निकालकर मैने उसे दिए।लेकिन वह दृढ़ स्वर में बोला, ” मैं भीख नहीं लेता।”
हरी बत्ती होने पर मैं आगे तो बढ़ गया,लेकिन उस बच्चे का आत्म- सम्मान और जरूरत दोनों मुझे पीछे धकेलते रहे।…. और मैं उसी के बारे में सोचता रहा।… कैसे उसकी मदद करूं ….?
ऑफिस से लौटते समय मेरी नज़र बच्चों के एक अस्पताल पर गई,एक स्कूल और एक अनाथालय का बोर्ड भी दिखाई दिया ,एक पार्क में खेलते हुए बच्चे भी दिखाई दिए ।जबकि इससे पूर्व इन सब पर मेरा ध्यान ही नहीं गया था,लेकिन जहां चाह ,वहां राह।
मैने इस बच्चे से खिलौने खरीदकर इन सब स्थानों पर जाकर , बच्चों को बांटने शुरू कर दिए ।
अब वे सब नन्हे दोस्त मुझे ‘ खिलौने वाले अंकल ‘ कहते हैं। और हां…अब हम सब एक दूसरे की खुशियों के साथी हैं।
डॉ अलका अग्रवाल
फ्लैट नम्बर B-103
B-7,जानकी विहार अपार्टमेंट
शिव मार्ग ,बनीपार्क
जयपुर 30201