प्रेम में समर्पण की अनिवार्यता
प्रेम में समर्पण की अनिवार्यता
मेघा राठी
प्रेम छोटा शब्द है लेकिन अर्थ में अनंत और व्यवहार में देखा जाय तो प्रेम का अर्थ कई कहे–अनकहे रूपों में ढला हुआ होता है। प्रेम मात्र एक भाव नहीं होता है ,प्रेम स्वयं में कई प्रकार के भावों को साथ लेकर चलता है। त्याग, समर्पण ये दो विपरीत भाव हैं किंतु प्रेम में समाहित हो जाने के बाद ये दोनों ही प्रेम का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। भावुकता के साथ हृदय में कठोरता का भी संगम हो जाना, केवल प्रेम में ही संभव है। इसी कारण कहते हैं कि प्रेम असंभव को भी संभव कर देता है।
प्रेम को मन में बनाए रखने और अक्षुण्ण रखने के लिए हृदय का कठोर होना आवश्यक है ताकि अनचाहा कुछ भी मध्य न आ सके। अनचाहे भाव जैसे क्रोध, जलन ,जिद ये सभी प्रेम के तंतु को कमजोर करते हैं। वहीं उपेक्षा, लापरवाही, आत्ममुग्धता ,दंभ भी ऐसे भाव हैं जो प्रेम की मजबूत इमारत में दीमक बन जाते हैं।
कितना सुकून भरा शब्द है प्रेम लेकिन प्रेम के अनिवार्य तत्त्वों के बिना यह निष्प्राण हो जाता है।प्रेम का एक अहम कारक है समर्पण यदि समर्पण का भाव प्रेम में खत्म हो जाय तो प्रेम निर्जीव हो जाएगा। प्रेम में समर्पण नहीं केवल सहूलियत देखी जाय तो बिना समर्पण भाव से किए गए प्रेम में शिकायतें जन्म लेने लगती हैं, दोष उत्पन्न होने लगते हैं क्योंकि प्रेमी के प्रति हृदय से समर्पित न होने पर व्यक्ति न तो साथ समय बिताने का उत्सुक होता है न ही उसे फर्क पड़ता है कि उसके किसी व्यवहार से उसके प्रेमी को दुख होता है तो उस कार्य को किया ही न जाय। समर्पित व्यक्ति में भटकाव की स्थिति नहीं आती है किंतु यदि समर्पण का अभाव हो तो प्रेम प्रचुर मात्रा में मिलने के बाद भी व्यक्ति अपने प्रेमी को प्रतिदान नहीं दे पाता। हालांकि प्रेम व्यापार नहीं है जिसमें दान प्रतिदान की भावना हो लेकिन जब दो लोग संबंध में होते हैं तब एक– दूसरे के प्रेम का प्रतिदान आवश्यक होता है।
समर्पित व्यक्ति अपने प्रिय के प्रेम का प्रतिदान देने के विषय में विचार नहीं करेगा क्योंकि यह सब स्वत: ही व्यवहार में आ जाता है। समर्पण किसी त्रुटि को अवसर नहीं देता। समर्पण बाहरी नहीं होता है ,समर्पण पूर्ण रूप से आंतरिक होता है। प्रेम की अनंत स्थिति में प्रेम का अपार रूप से उमड़ना ही समर्पण है। समर्पण का अर्थ किसी के नियंत्रण में रहना नहीं है। समर्पण में बिना किसी शर्त के ,बिना किसी अनुबंध के ..व्यक्ति स्वयं ही मात्र प्रेम के वशीभूत होकर संबंधों के लिए जो उचित व्यवहार होता है ,उसे अपनाता है।
समर्पण को कभी भी कमजोरी की निशानी नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह एक बहुत बड़ी ताकत है। समर्पण ज्ञान के साथ, भावनाओ के प्रचुर आवेग के साथ उत्पन्न होता है।
समर्पण का अर्थ है जो कमजोरियां संबंधों के लिए हानिकर है उन सभी को त्याग कर शुद्ध रूप से ,पूर्ण रूप से अपने प्रेम समक्ष होना।
बिना समर्पण का प्यार अधूरा होता है। समर्पण के बिना प्रेम पतवार विहीन नाव की तरह है जो लहरों हवा के साथ चलती है और हिचकोले खाती किसी तरह किनारे पहुंच भी सकती है या फिर डूब सकती है किंतु ये कठिनाई केवल उस व्यक्ति को आती है जो एकतरफा संबंध में समर्पित है। संबंध को किनारे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी केवल उसी की रह जाती है। इस कारण वह दुःख, विक्षोभ में न चाहते हुए भी आ जाता है। प्रेम में आदर्शवादी स्थिति की कल्पना आसान है किंतु व्यवहारिक दृष्टि से यह परस्पर संबंधों में तभी संभव है जब दोनों लोगों का एक दूसरे के लिए पूर्ण समर्पित होने का भाव हो। एक –दूसरे की खुशियों की परवाह हो, सम्मान हो…यही तो है समर्पण।
– मेघा राठी
उप संपादक ‘‘शब्दकार पत्रिका’’
संप्रति: लेखिका उपन्यासकार, अमर उजाला, दैनिक जागरण, जनसत्ता, पंजाब केसरी, वनिता, जागरण सखी, दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं, नूतन कहानियां आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें: गुस्ताखियां, उंगलियां व विभिन्न सांझा संग्रह,
निवास: भोपाल मध्यप्रदेश