जुलूस
जुलूस
- कला कौशल
चौरसिया की हत्या का आज बारहवां दिन था। दोपहर में संकल्प-सभा का आयोजन किया गया था। संगठन के आदमी सुबह से ही इसकी तैयारी में लगे थे। बांध के ऊपर बनी सड़क के मोड़ पर काठ की चौकियों से मंच बनाया जा रहा था। सड़क की दोनों तरफ़ झंडों की लड़ियां संगठन के चिह्न लिए लहराने लगी थी, जो मुख्य मार्ग से जुड़ाव तक जाती थी। वहां लहू रंग के बैनर ताने गए थे। बैनर पर चौरसिया की तस्वीर सभा की सूचना और संकल्पों के बीच सुदृढ़ थी।
दूर-दूर से आए फ़ौलादी नारों वाले आदमी इसी रास्ते से मंच तक पहुंच रहे थे। उन सबके गांव अलग-अलग थे, उनकी पोशाकें और शक्ल-सूरतें भी भिन्न थीं। पर उन सबके हाथों में एक जैसे झंडे एकरूपता प्रदान कर रहे थे। उनके पहुंचते-पहुंचते माइक से इंक़लाबी गाने शुरू हो गए थे। “समाचार है यही देश का,यही समय का हाल है। भूल-भुलैया में ग़रीब हैं, घेरे हुए दलाल हैं।”
सबकी आंखों में चौरसिया की चलती-बोलती छवि थी। कोई उन्हें चन्दा उगाहते देख रहा था, कोई उन्हें धरना-प्रदर्शन की तैयारी करते देख रहा था, कोई उन्हें भाषण करते देख रहा था, कोई उन्हें संगठन का अख़बार बेचते देख रहा था। यानी कि हर किसी की आंखों में उनकी कोई-ना-कोई छवि थी।
वे अपने गांव के एक सामान्य आदमी थे। अर्थात् गांव की सीमा ही उनकी दौड़ और पहुंच की हद थी। ग्रामीण उत्सवों पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के वे सूत्रधार बन जाते थे। उनकी यह अगुआ वाली भूमिका खेलों से शुरू हुई थी। कबड्डी के वे कमांडर माने जाते थे। अपनी टीम की तरफ़ से जब वे मोहरा बन कर विभाजन-रेखा के पास जाते तो प्रतिपक्षी की धड़कनें बढ़ जाती थीं। वहां वे जिस तरफ़ आगे बढ़ते प्रतिपक्षी हाथ भर पीछे धॅंस जाते। वह ललकारते हुए कभी बाएं,कभी दाएं और कभी गुंबद की तरह बीच में निकल जाते। इस तरह वे बड़ी देर तक लयबद्ध गाते रहते।
चेत कबड्डी आबो दे,तबला बजाबो दे।
तबला में पैसा, लाल बगैचा
कुइयां में डोल, झनझन बोल।
चेत कबड्डी…
उनकी इस हूल-पील से अक्सर कोई-न-कोई उनकी छुअन में आ ही जाता। प्रतिपक्ष का खिलाड़ी उनसे मात खा जाता। यदि कभी वे प्रतिपक्षी की पकड़ में आ जाते तो उनका दम तोड़ना कोई आसान काम नहीं होता। प्रतिपक्षी उन्हें चारों तरफ़ से घेरे हुए ‘हरदी-चूना’ बोलाने के लिए खींचते रहते और वे एक ही सांस में ‘चेत कबड्डी…ईईई…’ करते हुए सीमा के संस्पर्श के लिए इंच-इंच टसकते रहते। यह सब रोज़ ही होता।
उनकी शिक्षा-दीक्षा गांव की परिधि में जितनी हो सकती थी,हुई। वहां उन्हें गणित में विशेष रुचि थी। वे सुकंठ नहीं थे। परंतु अन्य विषयों के नाम पर हिंदी की सारी कविताएं कंठस्थ कर लेना उनका दूसरा प्रमुख कार्य था। गणित में वे अराजकता की हद तक कौतूहल थे। बचपन में वे कभी एक,दो,तीन,चार,पांच…तो कभी एक दूनी दो,दो दूनी चार, तीन दूनी छह,चार दूनी आठ,पांच दूनी दस… तो कभी दो ग्राम, दो किलो, दो पसेरी, दो मन, दो क्विंटल, दो टन…तो कभी दो इंच, दो फीट, दो मीटर, दो मील, दो योजन की बेतरतीब छलांग लगाते। फिर अचानक सौ से गिरा अनठानवे, छियानवे, चौरानवे ,बेरानवे और नब्बे की उतार पर लुढ़क जाते।
गाॅंव में जब परंपरागत उत्सवों से नित्य-नाटक, गाना बजाना आदि भी जुड़ा तो स्वाभाविक रूप से चौरसिया उससे भी जुड़ गये। उन नाटकों में कोई आधुनिक बोध नहीं था। लेकिन समाज की नज़र में जो उदात्त पक्ष था,चौरसिया उसे हथियाने की फ़िराक़ में रहते थे। ऐसा नहीं कि नाटकों में ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित चरित्रों से कोई सहानुभूति का भाव होता था, बल्कि समाज जिसे आदर्श मानता था,उससे उन्हें राड़ हो जाती थी। उसे पाने और मंच पर बख़ूबी निभाने में वे प्राणपन से लग जाते थे। एक तरह से उन नाटकों और चौरसिया की भूमिका में ‘यह सब क्यों’ का नहीं, ‘हम क्यों नहीं’ का संदेश छिपा होता था। बहरहाल चौरसिया कोई जन्मजात आदर्शों का पुतला नहीं,बल्कि उनके उत्साह और बहिर्मुखी प्रतिभा ने समाज की जीवन-चर्या में उन्हें उभरी हुई आकृति की तरह फिट कर दिया था।
सदी के मध्य के उत्तरार्द्ध में जब सोवियत रूस के सहयोग से यहां तेल शोधक कारखाने का निर्माण होने लगा तो वहां से अनेक वैज्ञानिक और इंजीनियर आए थे। उनमें कई के साथ उनकी पत्नी और बच्चे भी थे। उनके बच्चे अपने माता-पिता की तरह गोरे-चिट्टे दिखते थे। उनके गौरांग और भूरे बाल यहां के लोगों के ख़ासे आकर्षण के विषय होते थे। तभी से यहां के लोग हर सुंदर बच्चे को ‘रुसियन’ कहने लगे। बच्चा कहीं का हो, किसी का हो,यदि वह गोरा है तो वह झट से कह बैठते-अरे भाई,यह तो एकदम रुसियन है।
तभी आसपास के लोग रूस के इंजीनियर परिवार को देखने पहुंच जाते थे। उनकी पढ़ी-लिखी पत्नियां फुर्सत के क्षणों में कोई पत्र-पत्रिका या ज्ञान-विज्ञान की चीज़े पढ़ती रहती थीं। जब यहां के गंवई-ग्रामीण बायोस्कोप देखने-सी उत्सुकता लिए उनके पास पहुंचते तो वे अपने उनसे मुखातिब हो जाती थीं। वे उनकी कुछ भी ना समझ पाने बाली बातें बड़े ग़ौर से सुनती रहतीं और कभी-कभार ग्रामीणों के लिए तदनुरूप अबूझ एकाध बातें बोलतीं या सिर्फ़ सर हिलातीं या इशारे करतीं। उनके बच्चे यहां की औरतों के माथे के सिंदूर पर हाथ फिरते या देशी बच्चों के नाक से चू रहे पोटे को उंगलियों में लेकर तार बनाते। इस तरह उन लोगों के बीच संकेत संवाद चलता रहता था। वे अपने यहां के रूसी व्यंजन खाने के लिए देते तो उसके अजीबो-ग़रीब स्वाद इन्हें रोमांचित करते थे। इनके चेहरे के बदलते भाव को रूसी महिलाएं ग़ौर से देखती रहतीं। कभी दोनों भाषाओं के जानकारी उन दोनों को अभिव्यक्त करना चाहते तो वह उन्हें मना कर देतीं।
चौरसिया ने पहली बार उन लोगों के इन महान् कार्यों को जाना था। इस कारखाना के खुलने से स्थानीय लोगों की जीविका के भी अनेक स्रोत खुलेंगे । बाहरी लोगों के जीवन को क़रीब से देखने से उनकी अपनी दिनचर्या की अनगढ़ता और एकरसता भी दूर होगी। इन दोनों चीज़ों के संयोग से कृषि और उद्योग का एक ऐसा स्तंभ उठ खड़ा होगा,जिस पर इलाक़े के विकास का दीप जल उठेगा। ऐसे सुघर विचार उन्हें उनके प्रति प्रतिष्ठा के भाव से भर देते थे। उनके देश,उनकी सरकार और वहां की व्यवस्था के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ने लगी थी। वे जैसे-जैसे वहां के बारे में जान पाते,उनकी चाहत और बढ़ जाती। वे जानकारी की एक गिरह सुलझाते तो उनके अंदर रोचकता लिए और अनेक गिरहें मिल जातीं। इस तरह उनके जानने और उसके प्रशंसक बन जाने की एक अनवरत प्रक्रिया चल पड़ी।
उनका रूसी इंजीनियरों के निस्वार्थ कर्म, उनके देश की मानवतावादी व्यवस्था और उन तमाम चीज़ों के पीछे की महान् विचारधारा के प्रति आकर्षण को नागो दा ने भांप लिया था। वे उनसे भारतीय संदर्भ में उन चीज़ों को लागू करने की बातें करते थे।
“सोवियत रूस में जो कुछ हो रहा है या उन रास्तों पर चलने वाले दूसरे देशों में जो हो रहा है,वह सब हमारे लिए पेंटिंग में पिरोने की चीज़ें नहीं,बल्कि उन रंगों और सुगंधों को यहां उगाने की आवश्यकता है। उसे उगाएंगे यहां के लोग, ज़मीन तैयार करेंगे यहां के लोग, उसे खाद-पानी देंगे यहां के लोग और अंततः उसको समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करेंगे यहां के लोग। हम ज़्यादा-से-ज़्यादा उससे प्रविधि ले सकते हैं, प्रयोग की प्रेरणा ले सकते हैं। इसलिए उस स्वप्न भूमि की महक यदि हमारी रूह को ख़ुशी और ताज़गी प्रदान करती है तो आइए,उसे अपनी क्यारियों में लगाने के लिए प्रयत्नशील लोगों के साथ हो लें।”
चौरसिया ने नागो दा की बातों को इस अंदाज़ में लिया जैसे कोई बेथलेहम और मक्का को भारत में खोजे। उन्होंने अन्यमनस्क ढंग से कहा-“नागो दा,यह पार्टी,पॉलिटिक्स वाली बात है। आप जानते हैं कि मेरा इन चीज़ों से कोई वास्ता नहीं।”
लेकिन सोवियत इंजीनियर्स के हमारे जैसे पिछड़े इलाक़े में आने के मक़सद क्या पॉलिटिक्स के गलियारे से नहीं गुज़रते? क्या वे देवदूत हैं ?”
नहीं, वे देवदूत नहीं। लेकिन उन्हें दो देशों के सदाशयतापूर्ण संबंधों की परिणति क्यों नहीं मानें?”
दरअसल, इन सदाशयता पूर्ण संबंधों का आधार निरपेक्ष नहीं। हां, हम यह मानते हैं कि समझौता संबंध परस्पर है।”
नहीं,यह दो देशों का संबंध परस्परता से ज़्यादा उस महाबली का मानवीय सरोकार है, जो आसुरी प्रवृत्तियों और शक्तियों के ख़िलाफ़ अक्षय स्तंभ की तरह लोगों को संबल देता है।”नागो दा ने बड़े संयत ढंग से चौरसिया को सच्चाई समझाने की कोशिश की।
इस तरह उन दोनों के बीच संवाद का एक सिलसिला शुरू हो गया था। नागो दा अपनी तथ्यपूर्ण बातें सरल ढंग से रखते और चौरसिया की सकारात्मक बातों की सराहना भी करते। यानी कि चौरसिया की निषेधवादी बातों के खंडन की बजाय उसके समानांतर अपनी सही बातें रख देते थे। नागो दा का यह दुर्लभ गुण चौरसिया के दिल में उतर जाता। वे उन्हें कुरेदते भी रहते,ताकि विचारों के पड़ चुके बीज अंकुर दें। इस तरह खुरदुरे रास्ते से चौरसिया शनै:शनै: उनकी ओर मुड़ते गए,झुकते गए और एक दिन उनके विचारधारा को आत्मसात कर लिया।
नागो दा बस्तापट्टी के दिहाड़ी मज़दूरों के संघर्ष से उभरे थे। वहां से छूटे तो अपने इलाक़े में संगठन का काम शुरू कर दिया था। ग़रीब किसानों और खेत मज़दूरों के इस इलाक़े में कुछ लोगों के पास ही अधिकांश ज़मीनें थीं। वे ज़मींदार बड़े नगरों में रहते थे और वोट के कारोबार करते थे। पर उनकी आय और ऊर्जा के स्रोत ये पिछड़े हुए इलाक़े थे । यहां जब भूमि संघर्ष शुरू हुआ तो उन कारोबारियों के कान खड़े हो गये। उन्होंने इलाक़े में साम, दाम, दंड, भेद की खिचड़ी परोसनी शुरू कर दी।
सावन,भादो में जब हलुहर नदी मेढ़क निगले सांप की तरह लस्तपस्त रहती है तो टोले-के-टोले लोग बांधों पर आ बसते हैं। उनके माल-मवेशी,बच्चे-वृद्ध सब पेड़ के नीचे या कच्ची छावनी में समय बिताते हैं। वैसे ही विवश लोगों के बीच पहली बार कंबल और पॉलिथीन के वितरण किए गये। उनके लिए स्वादिष्ट फूड पैकेट और मिनरल वाटर के पाउच भी बांटे गये। इसके अलावा भूपति राजनीति के हवाबाज़ों की आंखों से और भी कई चीज़ें बरसीं। फिर भी भूमि संघर्ष का ताप बढ़ता ही गया तो उन्होंने खिचड़ी के प्रकार भी बढ़ाये थे।
सरज़मीन पर काम करने वाले इन धरती पुत्रों के जीवन का बड़ा भाग संगठन और संघर्ष में ही बीता था। पर अपने परिवार के लिए ये अनुत्पादक वीर थे। तिस पर कल के शोहदे रंग-बिरंगे झंडों को थामते,बदलते हुए दनादन असेंबली और संसद की सीढ़ियां लांघ जाते। दूसरी तरफ़ इन धरती पुत्रों को अपनी पार्टी में भी मीटिंग और सम्मेलनों के अलावा कभी कोई पूछ नहीं हो पाती थी। जिए तो अपने करतब से,मर गए तो दिखावे के दो फूल से ज़्यादा औकात नहीं। ज़िला और प्रांत के सदस्यों,सचिवों के सभी तरह के लोगों से मधुर संबंध होते। वह गांव की सभा में आते तो झक सफ़ेद क्रीज़दार आवरण में और हाथों में बिसलेरी की बोतल झुलाते हुए। इससे नीचे के कार्यकर्ताओं में कुछ था,जो दरकने लगा, जिसकी आवाज़ दूसरा कोई नहीं सुन सकता था। इसलिए वैचारिक फिसलन भरे रास्ते पर उनके पैर अक्सर डगमगाने लगता थे।
संगठन का काम बढ़ा तो छोटे किसानों,खेत मज़दूरों और ग़रीबों में उनकी साख बढ़ी। पर संघर्ष की निरंतरता ने शत्रु भी कम खड़े नहीं किये। एक सिरे पर राजनीति के हवाबाज दृश्य-अदृश्य अवस्था में तैनात थे तो दूसरे सिरे पर उनके हमशक्ल भूमि संघर्ष की भाषा बोलते हुए सक्रिय हो गए थे। किसी ने देखा नहीं, सिर्फ़ सब ने सुना कि नागो दा उन्हीं कुचक्रों में फॅंस गये। नागो दा धीरे-धीरे धरातल से उठ कर ज़िले में वास करने लगे थे। ज़िले की राजनीति का मतलब लोग समझते थे, वोट्स का बंदरबांट, सीट्स की सांठगांठ। परंतु नागो दा ने यहां संघर्ष की जो ज्योति जलाई ,वह उनके दूर होने से बुझी नहीं, बल्कि बढ़ती ही गयी।तिस पर चौरसिया ने लौ को अपनी अंजुरी की आड़ दे दी।फलत: वह और भी भयानक रूप में फैलने लगी थी। जिसमें झुलस रहे शत्रु पलटवार करने लगे थे। इलाक़े में शुरू किया गया मौत का तांडव उसी का परिणाम था।
भूपति राजनीति के हवाबाज़ों ने चाल उल्टी पड़ती देख अपनी कार्यनीति को करवट दे दी। अब वे फ़ौरी तौर पर अपने छोटे शत्रु को साथ लगाने लगे थे। कहते हैं,वे भी फ़ौरी तौर पर ही उनका सान्निध्य स्वीकार कर लिए थे। पानी और पावक के इस अचंभित मेल पर दोनों जीत गए थे। अब वह उनकी मंसा पूरी करने के लिए तैयार थे,अपनी भाषा बोलकर। वह सर्वहारा नाम की चादर ओढ़ कर सामंतों के अरमानों को मंज़िल तक पहुंचाने के लिए वचनबद्ध थे। इस तरह पार्टी प्रहार के मोर्चे का विस्तार हो गया था।
संगठन ने ठाकुर सिंह की तीन बीघे ज़मीन पर भूमिहीनों, ग़रीबों को बसाने का फ़ैसला लिया था। ग़रीबों का जुलूस बांस-फट्ठी,छप्पर-कांटी,तार-पन्नी आदि सरंजाम लेकर गंतव्य की ओर चल पड़ा था। बच्चे टीन के डब्बे और कंटर गले में लटका कर पटापट पीट रहे थे। संगठन के आदमी झंडा लिए नारे लगा रहे थे। ‘भूमिचोर मुर्दाबाद…’आसपास के लोग इस पर भारी अचरज में पड़ गए भूमिचोर…! क्या कोई भूमि और आकाश की भी चोरी कर सकता है? वे इसी उधेड़बुन में पड़े थे कि अगले नारे की धमक ने उन्हें और भी उद्भ्रांत कर दिया। ‘पूंजीवाद-सामंतवाद हो बर्बाद… हददबंदी से फ़ाज़िल ज़मीन भूमिहीनों को देनी होगी… ‘ इस पर उनके साथ चल रहे सर्वहारा स्वर साधते-‘देनी होगी-देनी होगी।’
खेतिहर मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी देनी होगी… किसानों को लाभकारी मूल्य देना होगा… वृद्धा पेंशन देनी होगी… बेरोज़गारी भत्ता देना होगा… काम के बदले अनाज योजना चालू करनी होगी… भूमिचोर मुर्दाबाद… इंक़लाब- ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद -ज़िंदाबाद!’
इस तरह नारे में संपूर्ण समाज नज़र आता था। पर हर कोई उसे टुकड़ों में ग्रहण कर रहा था। बाॅंध पर चलता हुआ जुलूस धीरे-धीरे ताव की तरह धधकने लगा था। सूर्य की किरणें चेहरे को रक्तिम कर रही थीं। दूर छिटके हुए कुत्ते भौंक रहे थे और खूंटे से बंधे माल-मवेशी रस्सी तुड़ा कर मानो अग्रधावी होना चाहते थे। उधर हलुहर की धारा वीचियों के साथ आगे बढ़ रही थी। पर बड़े-बुजुर्ग नंगे बदन पीछे-पीछे लाठी की टेक लिए चल रहे थे।
जुलूस सरज़मीन पर पहुंचा तो सान्याल अपने अदृश्य हथियारों के साथ पहले से मौजूद थे। उनके आदमियों के हाथों में भी इसी रंग के झंडे थे। सान्याल चौरसिया से मुख़ातिब हुए। उन्होंने कहा-“इस ज़मीन पर भूमिहीनों को बासगीत का पर्चा दिलाने के लिए सरकारी दफ़्तर में आवेदन दिए जा चुके हैं। वह ग़रीबों की एकता ना तोरें और अपने जुलूस वापस ले जायें।”
“… ग़रीबों का हक़ काग़ज़ की सड़कों पर चल कर नहीं आएगा। उसे ज़मीन पर ही ज़मीन का हक़ मिलेगा। जो इससे अलग सोचते हैं,वे स्वयं भ्रम में हैं या ग़रीबों को भरमाना चाहते हैं। यह भ्रम की खेती आप छोड़ दें। इसी में आपकी राजनीति की सार्थकता है और ग़रीबों का भला भी।” चौरसिया ने भी उसी तेवर में जवाब दिया। फलत: दोनों में वाक्युद्ध शुरू हो गया। उधर भूमिहीनों ने अपने-अपने माथे का सामान ज़मीन पर पटक दिया और सर्वत्र फैल कर छौनी-छप्पर उठाना शुरू कर दिया था।
सान्याल के आदमी उन्हें ऐसा करने से रोकने लगे,पर उनकी संख्या कम थी। चौरसिया उनकी बात मानने के लिए हरगिज़ तैयार नहीं हुये। उनके आदमियों ने एक ज़ोरदार नारे से उनके इस इंकार का पक्ष-पोषण किया। नारों के मर्म को भांप कर जो भूमिहीन जिस अवस्था में थे, उठ खड़े हुये। किसी के हाथ में कांटी ठोकने का औजार था, किसी के हाथ में बांस और किसी के हाथ में हॅंसिया था। वे सब उसे ही लिए तन गये। उन्होंने चौरसिया और उनके आदमियों का समर्थन किया।
इस तरह वक़्त का बहाव हलुहर की वीचियों के साथ आगे बढ़ता रहा। इसी बीच चौरसिया की हत्या सिपाही राय के घर पर कर दी गयी। सिपाही अपने को बीच का आदमी कहते थे। अर्थात् चौरसिया और सान्याल दोनों से उतना ही लगाव, जितना दुराव। एक इलाक़े में रहने वाले लोगों का जैसा आपसी संबंध होता है, कुछ उतना ही कुछ उसी प्रकार का राग-विराग सिपाही का उन दोनों से समझ सकते हैं। दरअसल सिपाही के घर पर एक चौथे व्यक्ति के आपसी विवाद के निपटारे के लिए पंचायत रखी गई थी। जिसमें चौरसिया और सान्याल दोनों पंच चुने गए थे। चूंकि, सिपाही की समदर्शी वाली छवि सर्व विदित थी, इसलिए वादी-प्रतिवादी और पंचों ने स्थल के नाम पर सहमति दे दी। तिस पर सिपाही ही दोनों को बुलाने भी गए थे।
वादी और प्रतिवादी कभी दोनों नागो दा के आदमी माने जाते थे। पर अर्सों साथ-साथ रहने के बावजूद वे दोनों के विवाद सलटा नहीं पाए थे। दरअसल उनके फ़ैसले से उन दोनों में एक के नाराज़ हो जाने की पूरी आशंका थी। इसलिए वे लगातार इससे बचते रहे थे। जब वे धीरे-धीरे इलाक़े की सरगर्मी से किनारा करने लगे तो चौरसिया ने उनकी बागडोर संभाल ली। चौरसिया वादी प्रतिवादी दोनों से छोटे थे।अत: वादी झट् से सान्याल के खै़मे में चला गया। सान्याल को उन दोनों के विवाद के सत्यासत्य में कोई रुचि नहीं थी,बल्कि वे अपने साथ एक आदमी के जुड़ जाने से ख़ुश हुए थे। इस पर प्रतिवादी ने अच्छा मौक़ा देखकर चौरसिया का दामन थाम लिया। अब विवाद का एक पक्ष स्वत: पाला बदल लिया था। इसलिए चौरसिया के लिए भी विरासत में मिली दुविधा समाप्त हो गई थी। दोनों प्रसन्न थे।
भूमि संघर्ष के मैदान में चौरसिया से मात खा गए सान्याल ने वादी की पीठ को सहलाया। पंचायती के लिए सिपाही के घर का चयन उसी योजना का परिणाम साबित हुआ। उधर सिपाही इसे बिन माॅंगे मिली मुराद मान कर मगन थे। दो गुट्ट के लोग आमने-सामने संवाद करेंगे और उसके सूत्रधार वे स्वयं बनेंगे। इससे अच्छी बात और क्या होगी! यदि सुलह-सपाटा होता है तो स्वाभाविक रूप से वे यश के भागी होंगे। यदि बात नहीं बनी तो उनकी ओर से पुनः पहल का दरवाज़ा खुला रहेगा। इन तमाम चीज़ों का समाज में एक ऐसा संदेश जाएगा,जिसे इलेक्शन में भुनाया जा सकता है।
यह सब सिपाही के मन में तब आया,जब सान्याल ने वादी को उनका नाम सुझाया था। इसके बाद सिपाही इन चीज़ों को संयोजित करने के लिए उत्साह में सक्रिय हो गये। सभी लोगों का उनके घर पर जुटान हो सका। कभी-कभी लोगों को अपनी सद्छवि के दुरुपयोग हो जाने का संज्ञान तक नहीं हो पाता है।जब तक वह स्थितियों को समझ पाता है,उसके क़दम दलदल में फंस चुके होते हैं।
चौरसिया की उसी रोज़ हत्या हो गयी। आज उसका बारहवां दिन था। इन बारह दिनों में संगठन ने ‘शहीद कोष’ जमा किया था। ऐसा लग रहा था कि सारे लोग एक अभियान पर निकल पड़े हैं। आज वह कोष चौरसिया के परिजन को सुपुर्द किया जाना था। जुलूस क्षेत्र भ्रमण के लिए निकला तो और लोग भी उससे वर्ण-विन्यास की तरह जुड़ते चले गए थे। आगे आगे पूर्व जन-प्रतिनिधि जनेश्वर वर्मा,नागो दा और दूसरे अगुआ दस्ता चल रहे थे। उनके अनुसरण में विशाल जुलूस नारों के साथ चल रहा था। राह चलते प्रदर्शी और गुमसुम सवारियां सड़क किनारे खड़ी हो गई थी। जुलूस के अग्रसिरे पर चौरसिया की तस्वीर लिए कुछ नवजवान चल रहे थे। तस्वीर निर्विकार और निस्तब्ध थी। लेकिन लोगों की चंचल स्मृतियां मानो उसमें हलचल पैदा कर रही थीं। नागो दा बार-बार धोती की खूंट से अपनी आंखें पोंछ लेते थे। उनका गला रुंध गया था, जैसे अब बुक्कार फाड़कर रो पड़ेंगे। उन्हें इस रूप में देख कर दूसरे लोग भी रुआंसा हो गए थे। आंसू और नारे ने मिलकर एक अजीब-सा समां बाॅंध दिया था। मानो झींसियों के बीच आसमान में बादल का सीना विदीर्ण हो गया हो। जिसके कंपन से रोम-रोम रेगनी के कांटे सदिश मालूम पड़ने लगे थे।
सिपाही के घर के आगे से गुज़रते हुए जुलूस अचानक भीड़ बन कर बेकाबू हो गया। न जाने किस अदृश्य खिंचाव से लोग उनके घर की ओर लपक पड़े। राजनीतिक नारों की जगह उनके मुॅंह से ठेठ गालियां निकलने लगीं। निश्चित तौर पर किसी उत्तेजित समूह का वह आक्रामक रूप हिंसा के बदले हिंसा और हत्या के बदले हत्या कर सकता है। सिपाही तो चौरसिया की हत्या के दिन से ही फ़रार चल रहे थे। घर में उनकी औरतें और बच्चे रह गए थे। भीड़ को अपनी ओर लपलपाते हुए देख कर औरतें घर में घुस गयीं। पर हड़बड़ी में उनका तीन साल का बच्चा जो चौकी के नीचे खेल रहा था, बाहर ही छूट गया। घर में बंद औरतें भय और शोक से मूर्छित होने लगीं। उनके कानों में बच्चों के भयातुर स्वर पिघलते हुए शीशे की तरह पर रहे थे। बच्चे की माॅं के हृदय में हूक उठी और वह बेतहाशा किवाड़ की कुंडी खोलने के लिए दौड़ पड़ी। पर अन्य औरतों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी। बच्चे की छत-विक्षत काया उनकी आंखों में घूम गयी। “वे बच्चे को बेरहमी से उठाकर बेल की तरह पटक… फिर पाषाण हृदय उन निर्मोहियों के क्रोध की आग में पूरा घर लहक… और वे सब ज़िंदा ही जल…!
उधर हो-हंगामा सुनकर अपनी धुन में रमा बच्चा जब बाहर निकला तो भीड़ एकदम सामने आ चुकी थी। एक बारगी तो वह कुछ समझा ही नहीं और इस तरह बेपरवाह गरज़ते लोगों को देखकर हतप्रभ हो गया।भीड़ अब अपने चरम रूप को प्राप्त कर चुकी थी और क्रोध की भट्टी पर उबल रहा खून छनछना कर जल रहा था। जिसमें भुन रहा भीड़ का मन चिंघार उठा था। मानो अगले ही पल वे बच्चे की बोटी-बोटी उड़ा देंगे। तभी एक ही रंग के ताज़े झंडे की असंख्यता को देखकर वह अप्रत्याशित रूप से खिलखिला उठा। वह लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ा और झंडे के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया।
राजनीतिक जुलूस हत्यारी भीड़ बन कर जिस अदृश्य कौंध से इधर मुड़ी थी, कुछ ही पलों में वह उसी वेग से पुनः जुलूस बनकर लौट गयी। बच्चा अब भी हाथ बढाए झंडा माॅंग रहा था।
– कला कौशल
द्वारा -यमुना कृष्णा पुरम्, यशपाल नगर,न्यू कॉलोनी, बाघा, डाकघर-सुहृद नगर, बेगूसराय -851218, बिहार
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