जोंक हुई मछली

जोंक हुई मछली

- पीयूष अवस्थी

‘‘आई-लव-यू’’ कहते हुए सामने वाले ने अचानक उसके हाथ पर हाथ रख दिया। वह इस हमले के लिए तैयार नहीं थी। वह बुरी तरह घबरा गई। उसने ज़ल्दी से अपना हाथ हटा लिया। कमरे में कोई नहीं होगा, उसे यकीन था, फिर भी एहतियातन उसकी नज़र इधर-उधर घूम गई। उसे अपनी धड़कन बाहर तक सुनाई दे रही थी। वह ज़रूरत से ज़्यादा घाघ निकला। बोला ‘‘अगर बात बुरी लगे तो संभाल लेना कि मैंने कुछ कहा ही नहीं और अगर ठीक लगे तो…… जवाब ज़रूर देना।’’ बात पूरी करके वो अज़ीब ढंग से मुस्कुराया था। और, कविता…. उसे लग रहा था कि उसका पाँव साँप के घर में पड़ गया है। उसे एहसास हो गया था कि वह इस जाल में फँसती जा रही है। उसे इस कमरे का एक-एक पल भारी लग रहा था। तभी दरवाजे की आहट से दोनों चौंककर सम्भल गये। सामने वाले आगन्तुक को अनदेखा सा करते हुए अपने पद का चौंगा पहन लिया। बड़े संयत स्वर में बोला-

               ‘‘मिस कविता ! ये बहुत इम्पार्टेन्ट लेटर है, इसे आज ही डिस्पैच कर दीजिये, ताकि ज़ल्दी जवाब आ जाए।’’ इतना कहकर वह दूसरी ओर मुखातिब हो गया। कविता ने मेज से पैंसिल और नोटबुक उठाई और अपने कमरे में चली आई।

               आते ही वह कुर्सी पर निढ़ाल सी गिर पड़ी। काफी देर यूँ ही बैठी हाँफती सी रही। उसे कमरे की एक-एक चीज़ घूमती नज़र आने लगी। घबराहट में उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं।

               घर पहुँचते ही अलमारी से अपना नियुक्ति-पत्र निकाला। मुड़ी हुई पर्तों को सीधा किया और उसे पढ़ने लगी- ‘‘यह नियुक्ति पूर्णतया अस्थाई है, बिना किसी पूर्व सूचना क,े नियत समय के पूर्व भी समाप्त की जा सकती है।’’

               उसे नियुक्ति-पत्र मिले लगभग एक वर्ष हो रहा था, और हर तीन महीने बाद उसका कार्यकाल पूर्व शर्तों के आधार पर अब तक बढ़ता आया था। इस अनुभाग में आने से पूर्व वह इसी विभाग के दो अन्य अनुभागों में कार्य कर चुकी है। लेकिन, पिछले छै महीने से उसे इसी अनुभाग में कार्य करने का आदेश मिला है। हाँ ! वो स्टैनो ही तो है। इस अनुभाग में आते ही उसे खतरे की गन्ध मिलने लगी थी। हर नज़र उसे चीरती निकल जाती। उस पर भी उस नियुक्ति विभाग के बड़े बाबू….उनकी नज़र देखकर ही कंपकपाहट हो जाती थी, उसे दो गुम्बदों के बीच चौड़ी सी माँग, सुरंगी अधेरों से लिपटा बदन, चेहरे पर चेचक के हल्के-हल्के दाग़, सफेदी में डूबा पाजामा-कुर्ता, मुँह में चुनही भरे, पैंतालीसवीं सीढ़ी पर भी उसकी आँखों में भँवरा बैठा था। उनकी सहानुभति कभी-कभी सर पे हाथ फेरने से लेकर पीठ थपथपाने तक जा पहुँचती। अन्दर से खीज उठती लेकिन फिर भी हँसकर टालना पड़ता। कितने ही लोग उसे आत्मीयता की किताब पढ़ाना चाहते हैं। कुछ भी कहकर उसके चेहरे की गुदगुदी पढ़ना चाहते हैं। मिलते ही बड़े बाबू का टेप ऑन हो जाता, ‘‘मैंने तो साहब से भी कहा था कि कविता बहुत अच्छी लड़की है, परेशान भी है, उसे ज़रूर क्लीयर कर दीजिये।’’

               उसे लेकर कितनी ही बातें इस ऑफिस मे होती थीं, लड़की अच्छी है! गुमसुम रहती है ! बाहर हिसाब बना रखा होगा! अभी-अभी तो आई है, थोड़े दिनों में सब सीख जायेगी! सुना है केवल माँ है और छोटे भाई-बहन, बेचारी ! परेशान है। और जाने क्या-क्या…. लेकिन, वह सारी बातें अनसुनी करती गई।

               आखिर, उसे नौकरी करनी थी। छटपटाने से भी क्या हो सकता था! बीसियों बार उसने भद्दे मजाक को हँसी में उड़ा दिया था। लेकिन, वह अच्छी तरह सम्मझ चुकी थी कि कौन जानवर कितना चालाक होता है।

               और…. आज, उसके साहस ने घुटने टेक दिये थे, हालांकि बार-बार उसे इस बात की आशंका होती थी लेकिन….! 

               उसने नियुक्ति-पत्र को मोड़ा और बड़ी लापरवाही से उसे डायरी के बीच में दबा दिया। धीरे-धीरे उसकी आँखों से कोई भाप निकलती साफ नज़र आने लगी।

               काफी देर लेटे रहने पर भी नींद नहीं आई, करवट बदली और बगल में लेटे भाई-बहनों को देखने लगी। कितने चैन से सो रहे हैं। उसकी नज़रें घूमते-घूमते…… माँ के चेहरे पर जा पड़ी, हाँ……! कितना दुख ढोया है उन्होंने। कितनी चिन्ताओं ने घेर रखा है उन्हें और माँ……..जब कभी धीरे से कहती है- ‘‘ज़ल्दी से तेरे हाथ पीले कर दूँ….. और कहते-कहते खुद ही चुप हो जाती है। वह अपनी माँ की छटपटाहट ठीक से पहचानने लगी है।

               पिता की अकाल मृत्यु ने सब कुछ तोड़कर रख दिया था। छोटे भाई बहन, आमदनी का कोई अन्य साधन नहीं। धीरे-धीरे घर की जमा पूंजी समाप्त होने लगी थी। बड़ी मुश्किल से उसने स्टैनोग्राफी का कोर्स पूरा किया। उसे और उसके परिवार को किन-किन मुश्किलों से जूझना पड़ा, इस राज़ से आवाज़ पैदा होने से पहले ही उसे किसी तरह नौकरी मिल गई थी। उस समय का तीन माह का अप्वाइन्टमैंट लेटर, उसे कितनी खुशी कितना साहस, कितना जल दे गया था। उसे लगा था कि घर के बहुत से सूराख बन्द हो गये हैं।

               उसके बाद जैसे-जैसे नौकरी की अवधि बढ़ती गई, उसे नौकरी से मोह बढ़ता गया। उसकी ज़रूरतें बढ़ती गई। एक मात्र वही तो सहारा है जो अपने पूरे परिवार को इस जहां की भीड़ में कन्धों पर उठाये चल रही है। वरना ये भीड़, किसे कहाँ ले जाती। किसे रौंद कर निकल जाती- कुछ पता ही नहीं चलता…… घबराकर उसने सोचना बन्द कर दिया।

               तभी भोर की सूचना चिडियों ने चहचहाकर दी। उसे माँ की आवाज सुनाई पड़ी….. ‘‘कवितू ! उठेगी नहीं क्या ! ऑफिस नहीं जाना क्या !’’ लेकिन वह चुपचाप लेटी रहीं।

               चाहकर भी आज दूसरे दिन भी ऑफिस नहीं गई। तबीयत खराब होने का बहाना करके उसने माँ की चिन्ता शान्त कर दी। पूरे दिन भी बुझी-बुझी सी बैठी रही। सोनी के हाथ माँ ने दर्द की टिकिया भी मंगा दी थी लेकिन उससे खाई नहीं गई। चुपचाप लेट गई।

               स्नेह से माँ ने सर पे हाथ फेरते हुए कहा ‘‘तू दो-चार दिन आराम कर ले दौड़ा-धूपी में बहुत थक जाती है। मैं सोनी के हाथ से तेरे आफिस में अर्जी भिजवा दूंगी।’’

               ऑफिस और अर्जी का ख्याल आते ही उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। ‘‘नहीं माँ ! मैं ठीक हूँ मैं आज आफिस जाऊँगी।’’ कहकर वो तैयार होने चली गई।

               आज भी उसका ऑफिस जाने का मन नहीं था। लेकिन नौकरी करनी थी। उसे आना पड़ा। सारे दिन वो अनमने ढ़ंग से बैठी रही। उसे अधिकारी ने बुलाया भी था लेकिन वहां कुछ अन्य अधिकारी, कर्मचारी पहले से बैठे हुए थे, वो डिक्टेशन लेकर बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली आई थी। वापस आकर वह मेज पर सर रखे, आँखें बन्द किए, लगभग अधलेटी सी, जाने क्या-क्या सोचती रही….।

               उसकी भंगिमा टूटी तो ख्याल आया कि पत्र टाईप करना है। उसने कागज़ मशीन पर लगाया और टाईप करने लगी। तभी दरवाजे से प्रविष्ट होता हुआ अर्दली दिखाई पड़ा। उसके हाथ में कोई काग़ज था। उसने काग़ज ले लिया और अर्दली को कमरे से बाहर जाता हुआ देखती रही। उसने कागज़ देखा…. ‘‘कुमारी कविता! अस्थायी आशुलिपिक, दिनाँक……… को बिना किसी पूर्व सूचना के कार्यालय में अनुपस्थित रहने का क्या कारण है ! इससे कार्यालय के कार्य में बाधा उत्पन्न होती है, कृपया स्पष्टीकरण दें।’’ और उसने नीचे टंका हुआ दस्तख़त ग़ौर से देखा। हूबहू, कोई भी फर्क नहीं। न तो नाम में और न ही दस्तखत में, जो उसके अप्वाइंटमेंट लैटर में है। उसे इस कागज़ और निरस्तीकरण आदेश में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लगा। वह अच्छी तरह से समझ गई थी कि उसे अस्थायी से स्थायी बनाने में ये दस्तख़त किस क़दर आवश्यक है। नियुक्ति से अब तक की सारी कड़ियाँ एक-एक कर जुड़ने लगी। एक अज़ीब सी वहशत भरी मुस्कान उसके चेहरे को छूकर निकल गई थी। उसकी आँखों में घृणा, मजबूरी एक साथ आसानी से पढ़ी जा सकती थी। कागज़ लिये एकटक सीलिंग फैन को देखती रही। पँखे से फिसलती हुई नज़र रोशनदान के बीच छटपटाते हुए कीड़े पर पड़ी जो मकड़ी के जाल में उलझ गया था और मकड़ी धीरे-धीरे उसे अपने जाल में मज़बूत और मज़बूत जकड़ती जा रही थी।

               आज उसने नई साड़ी पहनी थी। अपने मोहक रूप को आदमकद आइने में चलते समय फिर निहारा, और ऑफिस की और चल दी।

               तमाम अभिवादनों से लड़ते हुए अपने कमरे में पहुँची। काँधे से बैग उतार कर मेज पर रख दिया और कुर्सी पर बैठ गई। रूमाल निकाला और पसीना पोंछने लगी।

               ऑफिसर आने की आहट उसे मिल गई थी। सुराही से गिलास भरकर गटागट पी गई। बड़ी देर बैठे-बैठे पेपरवेट नचाती रही। उस नाचते हुए पेपरवेट को देखती रही जिसके अन्दर बिखरे हुए बहुरंगी फूल एक के पीछे एक भाग रहे थे, और एक अज़ीब सा रंग उसे नज़र आ रहा था। यकायक उसके हाथ से पेपरवेट छूटा और मेज के नीचे गेंद की तरह गट-गट करता हुआ दूर तक चला गया।

               किताबी चेहरे पर अपेक्षाकृत कुछ निश्यचात्मक पृष्ठ रंगीन हो उठे। वह कुर्सी से उठी। अपने को व्यवस्थित किया और दूसरे कमरे में प्रविष्ट हो गई।

               ‘‘हैलो सर कैसे हैं आप।’’

               इस परिवर्तित माहौल से वह चौंका ज़रूर था लेकिन शायद बह इस हमले के लिए पूरी तरह तैयार था। ‘‘ओह… मिस कविता ! आइये बैठिये… मैं तो ठीक हूँ, आप सुनाइये।’’’

               ‘‘सर ! फीवर आ गया था, इसलिए नहीं आ सकी दो दिन, कोई था भी नहीं जो एप्लीकेशन भिजवा सकती।’’

               ‘‘अरे, अब कैसी है तबीयत ! ठीक है, न !!’’

               ‘‘जी !’’

               ‘‘तो, कल क्यों नहीं बताया !’’

               ‘‘मैं समझी आप नाराज हैं।’’

               ‘‘वाह भई ! ये भी खूब रही….. मैं तो सोच रहा था कि तुम मुझसे नाराज़ हो।’’ कहते हुए उसने आप से तुम तक की यात्रा समाप्त कर दी।

               ‘‘नो सर !’’ कहते हुए कविता उठकर चलने लगी तो उसे कोकिल स्वर सुनाई पड़ा। ‘‘हाँ सुनो, दो दिन की एप्लीकेशन दे देना, बाक़ी मैं संभाल लूँगा।’’             

               ‘‘यस सर !’’

               ‘‘और सुनो, ये सर-वर नहीं चलेगा। तुम चाहो तो….बात पूरी होने के पहले ही वो बोल उठी ‘‘लेकिन……सर…..’’ वह कमरे से बाहर निकल आई और जमीन पर पड़ा पेपरवेट लठाया। पेपरवेट को गिर कर चकनाचूर हो जाना था लेकिन टूटा नहीं था, केवल कुछ निशान से पड़ गये थे। उसने पेपरवेट उठाया। जी चाहा कि चूम ले पर, मेज़ पर रख दिया।

               धीरे-धीरे गुदगुदाने वाली बातें दोनों तरफ से आने लगीं थी। उसकी सलाह पर ही उसने बड़े फ्रेम का चश्मा पहन लिया था। वह जानबूझ कर एकान्त को टाल देती। मौका पड़ने पर इधर-उधर हो जाती। हर बार उसकी यही कोशिश होती कि जब कोई अधिकारी, कर्मचारी कमरे में कोई बैठा हो तभी जाए। उसे अब आँखों में आँखें डालकर बात करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी। लेकिन, अब उसे ये सब बुरा नहीं लगता था। ऐसे मौके पर अक्सर ही अन्जान सी बन जाती है। अपने आपको ढीला छोड़ देती हैं। आखिर, इसमें उसका जाता भी क्या है ! हाँ, कभी कभी हाथ ही तो थामने लगता है। और फिर देखने या छूने से क्या होता है।

               धीरे-धीरे उसका पंजा मजबूत होता जा रहा था। उसे अपनी नौकरी की चिंता समाप्त सी हो चली थी। अब उसे आफिस समय से लेट पहुँचने में कोई डर नहीं लगता था। कभी-कभी तो वह आफिस टाइम में बाहर भी घूम आती थी। उसे सामने बैठा हुआ अधिकारी अब बौना लगने लगा था। उसकी अंगुलियाँ सामने बाले को दिशागति देने लगीं थी। जितना भी कविता उस अधिकारी से जुड़ती जा रही थी उस अधिकारी की मानसिक टूटन बढ़ती जा रही थी। शायद ये कविता की घृणा का कोई भीतरी अंश था। कभी-कभी वो शिकायती स्वर में ऐसे कहती जैसे बहुत आत्मीयता हो ‘‘आप कितने दुबले हो गये हैं, अपने स्वास्थ का ध्यान रखना चाहिए आपको, लगता है घर में कोई आपका ध्यान नहीं रखता’’ और तब घर के नाम से दूसरी तरफ जो कंपन होता, उसे देखकर जाने क्यों कविता की आंखों की चमक और तेज़ हो जाती।

               और उस दिन…… उस दिन तो उसका चेहरा देखने लायक था। जैसे किसी ने कालिख पोत दी हो, जब कविता कह बैठी थी, ‘‘सुना है आपके पौत्र होने वाला है, देखिये मिठाई न मिली तो लड़ाई कर लूँगी, बोलिये खिलायेगें कि नहीं !’’

               अब उसे ऑफिस का माहौल पूरी तरीके से समझ में आ गया है। हर शख्स के बारे में वह जानती है। ऑफिस का तो माहौल ही बदल गया है उसके लिये। उन दोनों के संबंधों को लेकर कानाफूसी करने वालों की कमी नहीं है। लेकिन, वह अच्छी तरह समझ चुकी है कि लोग उससे भीतर ही भीतर कितना डरने लगे हैं। उनकी नज़रें भी ख़ुशामद से भरी हैं। ऑफिस के तमाम लोग उसे अब ‘‘कविता जी’’ कहने लगे हैं। हां, सभी को यह डर है कि कहीं उनकी शिकायत न कर दे। अधिकारी की नज़र में अच्छा बना रहने के लिये भी लोग उससे अच्छा ‘‘बिहैव’’ करने लगे हैं। उसे भी लगता है कि उसकी मुट्ठी में अब कोई वज़नी चीज़ बन्द हो गई है। उसे अज़ीब सी खुशी होती है, फिर भी जाने क्यों उसे कहीं न कहीं अपनी कमज़ोरी का एहसास बराबर होता रहता है। कभी कभी व्यंग्यभरी नज़रें उसे वेध जाती हैं। उसे लगता है कि वो दल-दल में फँसती जा रही है। लेकिन, स्वयं ही आश्वस्त हो जाती है। ऊँह ! ये तो दुनियां है, मैंने तो जीने का रास्ता बनाया है।

               दो दिन से वह ऑफिस नहीं आई थी। आज उसे छोटे भाई के एडमीशन के लिए स्कूल जाना था इसलिये ऑफिस पहुँचने में देर हो गई थी। उसने दूसरे कमरे में झाँककर देखा लेकिन कुर्सी खाली पड़ी थी। वह अपने कमरे में वापस चली आई। कुर्सी पर बैठ भी नहीं पाई थी कि बड़े बाबू का मिश्री घुला स्वर सुनाई पड़ा ‘‘आपका ही वेट कर रहा था कविता जी! मुबारक हो, आप परमानेन्ट हो गयी हैं, कल ही आदेश हुए थे।

               ‘‘थैंक्यू’’ कहते हुए उसने कागज़ ले लिया था। थोड़ी देर बाद ये खबर उड़ती हुई तमाम लोगों तक पहुंच गई और फिर बधाई देने वालों ने कोई संकोच नहीं किया।

               हालाँकि ये बात उसे पहले से ही मालूम हो चुकी थी फिर भी उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान खेल रही थी। उसने कागज़ लिया और पढ़ने लगी…. इबारत समाप्त होते ही उसने बड़े अज़ीब ढंग से कहा था- ‘‘आई-लव-यू।’’ फिर गले के अन्दर से ढ़ेर सारा थूक उलिया के उगल दिया था- आक-थू।

पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

शब्दकार प्रकाशन एवं शब्दकार पत्रिका

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