पुष्पेंद्र ‘पुष्प’ की ग़ज़लें
पुष्पेंद्र 'पुष्प' की ग़ज़लें
- पुष्पेन्द्र 'पुष्प'
रक़ीबों को पुकारा जा रहा है
हमें दिल से निकाला जा रहा है
हमारी आँख पर पट्टी लगाकर
नया मंज़र दिखाया जा रहा है
बदन की ख्वाहिशें अब तक वही हैं
मगर चेहरा बदलता जा रहा है
जहाँ तक है रसाई तीरगी की
वहाँ तक भी उजाला जा रहा है
पुरानी दास्तानों को बदलकर
नया इतिहास जोड़ा जा रहा है
जहाँ सूरज ज़रूरी है वहाँ पर
फ़क़त जुगनू दिखाया जा रहा है
सफ़र में दोनों जानिब नक्श-ए-पा हैं
मुसाफ़िर है कि भटका जा रहा है
तुम्हारा यूँ नज़रअंदाज़ करना
मिरे दिल को लुभाता जा रहा है
इधर सारे तमाशाई खड़े हैं
उधर पर्दा गिराया जा रहा है
किसी गिर्दाब में कश्ती फँसी है
निगाहों से किनारा जा रहा है
मुसल्सल देखकर काविश हमारी
सुख़न भी रंग लाता जा रहा है
-पुष्पेन्द्र ‘पुष्प’
फिर से उम्मीद कुछ दिखी है अभी
यानी उल्फ़त में दिलकशी है अभी
क्यूँ मुझे ग़ैर की ज़रूरत हो
मेरी ग़ज़लों से दोस्ती है अभी
लौट आओ वफ़ा की राहों में
मैं वही, दिल मिरा वही है अभी
तेरी आमद का इंतज़ार मुझे
रात-दिन है, घड़ी-घड़ी है अभी
मुझको मंज़िल की जुस्तजू ही नहीं
ज़िन्दगी राह ढूँढती है अभी
कोई जुगनू ही भेज दो जानाँ
मेरी राहों में तीरगी है अभी
कौन है अस्ल बाग़ का वारिस
फूल में, ख़ार में ठनी है अभी
आप जैसे गुलों की संगत में
मेरी हर भोर शबनमी है अभी
कैसे मैं बज़्म से चला जाऊं
तेरी महफ़िल में शाइरी है अभी
– पुष्पेन्द्र ‘पुष्प’
व्यवसाय- अध्यापन
सुशीलनगर उरई जनपद- जालौन (उ.प्र.)
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