पीयूष अवस्थी के दोहे (पियूषा- दोहावली से)
पीयूष अवस्थी के दोहे (पियूषा- दोहावली से)
- पीयूष अवस्थी
राजनीति के मंच पर, झूठ बन गये साँच
कठपुतली ही देखती, कठपुतली का नाच
जो हैं पूरे गाँव के, पहुँचे हुये हक़ीम
उनके घर बीमार हैं,कब से राम -रहीम
चिन्ता में मन यूँ पिरै, जैसे पिरती ऊख
गिद्ध जहाँ पर बैठते, पेड़ जाय वो सूख
जीवन लम्बा सोच मत, दे इसको विस्तार
इस दुनिया में छोड़ जा, कुछ अच्छे क़िरदार
बातें तल्ख़ न कीजिये, दिल में पड़े दरार
जैसे टूटा आइना, घर की इक दीवार
सरल भाव जो राखते, वो जग से कछु पाय
गोबर गिरै ज़मीन पर, माटी लेय उठाय
अब तो लूट खसोट की,चर्चा साँझ सबेर
ना शबरी ना राम हैं, ना वे जूठे बेर
चौखट भीतर राखिये, घर की हर तक़रार
धीमीं बानी बोलिये, सुनतीं हैं दीवार
दुनिया का दस्तूर है,सदियों का है खेल
जिन पेड़ों पर फल लगे,उन पर चले गुलेल
लम्बा रस्ता नाप के,तन,मन भरी थकान,
सारा दर्द निचोड़ लें, माँ की इक मुस्कान
मुश्किल आती है सदा, ले कुटुंब को साथ
तब थामें ही राखिये, निज कुटुंब का हाथ
लाख उजाला बाँटता, जगमग हो संसार
दिया तले होता मगर, आले में अँधियार
सोन खटोला लेटकर, नींद बहुत है दूर
बिन बिस्तर ही सो गया, थका हुआ मज़दूर
लाख छिपाये ना छिपे, कुछ भी कर व्यभिचार
तुझमें बैठा देखता , तेरा ही करतार
फुटपाथों पर सो रहे , कितने ही भगवान
इक मूरत के वास्ते, मन्दिर आलीशान
फिर से चौसर बिछ गई, जाति धर्म पर दाँव,
एक नये कुरुक्षेत्र को ,दौड़ रहे हैं पाँव
क्या मानव कर्तव्य हैं ,क्या मानव अधिकार,
दोनों भाषा सीखिये , होगा बेड़ा पार
सबसे साझा मत करो, अपने दिल की बात
कोई बन तेरा सगा, कर देगा प्रतिघात
दूर तलक बहती नहीं, हर कागज की नाव
हवा में जैसे न टिकें, बहुत देर ये पाँव
गंगा रोज़ नहाय के , धुलें न मन के पाप
आँसू की इक बूँद से, होता पश्चाताप
मनमानी मत कीजिये , हो सत्ता आसीन
चलती फिरती है यहाँ , पाँवों तले जमीन
चाँद ,सितारे ये ज़मीं , तेरी साँसें प्रान
उसका ही हो जायेगा, सब उसका सामान
– पीयूष अवस्थी
मुख्य संपादक
शब्दकार प्रकाशन एवं शब्दकार पत्रिका
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