राजेन्द्र तिवारी की ग़ज़ल – राजेन्द्र तिवारी
राजेन्द्र तिवारी की ग़ज़लें
राजेन्द्र तिवारी
1-
कहने को सरदार रहे हो तुम भी तो
फिर भी दिल से हार रहे हो तुम भी तो
प्यास बुरी शय है समझाते फिरते हो
प्यासे बरख़ुर्दार रहे हो तुम भी तो
बे-मतलब कोई बाज़ार नहीं जाता
क्यों हरदम तैयार रहे हो तुम भी तो
कोई कुछ समझाये फ़र्क नहीं पड़ता
आदत से लाचार रहे हो तुम भी तो
गीतों, ग़जलों नज़्मों के बँटवारे के
थोड़े ज़िम्मेदार रहे हो तुम भी तो
कोई कमसिन क़िस्सा याद नहीं है क्या
जिसका इक किरदार रहे हो तुम भी तो
मेरी सारी ग़ज़लें मेरी थोड़ी हैं
शामिल आख़िरकार रहे हो तुम भी तो
2-
गर हक़ीक़त के तरफ़दार नहीं हो सकते
आप कुछ भी हों क़लमकार नहीं हो सकते
लोग दौलत के दिवाने तो बहुत दिखते हैं
क्या मुहब्बत के तलबगार नहीं हो सकते
जिनकी हर बात पे जुमला है ‘तेरी जान क़सम’
ये समझ लो कि वफ़ादार नहीं हो सकते
आदमी हैं तो कभी दिल भी बहक सकता है
कैसे कह दें कि गुनहगार नहीं हो सकते
ये अलग बात है हम आपके मतलब के नहीं
दिल के दरवेश हैं दरबार नहीं हो सकते
क्या ये मुमकिन है ज़मी आस्मां को चूमे कभी
जो हैं बुनियाद वो मीनार नहीं हो सकते
– राजेन्द्र तिवारी
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