पड़ोस वाली आंटी – अलका अग्रवाल
पड़ोस वाली आंटी
– अलका अग्रवाल
मैं कॉलोनी में ही घर के पास वाली किराने की दुकान पर कुछ सामान लेने गई थी। पड़ोस वाली आंटी भी दुकान पर सामान लेने आई थीं। हालांकि वह बहुत दूर नहीं रहती हैं, लेकिन मिलना जुलना कम ही हो पाता है। 6 माह में ही आंटी के बालों में सफेदी और चेहरे पर झुर्रियां बहुत अधिक दिखाई दे रही थीं । उनकी आंखें जैसे गड्ढे में धंस गई थीं, बहुत कमजोर भी नजर आ रही थीं। इतने से समय में इतना बदलाव मुझे समझ में नहीं आ रहा था। मैंने उनसे पूछा भी,
” आंटी ठीक तो हैं आप।”
उन्होंने कठिनाई से मुस्कुराते हुए कहा,” हां ,सब ठीक है । ” कहकर, ज्यादा बात न करते हुए,नजरें बचाकर, वे चली गईं ।”
5 मिनट बाद ही उनकी बहू सामान लेने आई। उन दोनों के जाने के बाद मैने दुकानदार से पूछा कि बहू और सास अलग-अलग सामान लेने आईं, …..कुछ समझ में नहीं आया।
दुकानदार ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं निरी बुद्धू हूं ।
“इसमें समझने समझाने की बात क्या है बहन जी, घर-घर चूल्हे माटी के । बहू ने शादी के एक माह बाद ही अपना चूल्हा अलग कर लिया।…. इकलौते बेटे की मां पर क्या गुजरी होगी? ” उसने मुझे दुनियादारी का सच समझाते हुए कहा।
मैं सोच रही थी कि आंटी ने कॉलोनी के लोगों के कपड़ों की सिलाई करके बेटे को पढ़ाया लिखाया। अंकल तो बरसों पहले ही गुजर गए थे ।तब भी वे नहीं हारी थीं ।…..पर यह अलगाव का आघात जैसे उनके पूरे जीवन की आशाओं पर तुषारापात था।आदमी संकटों से नहीं,अपनों से ही हारता है।
– डॉ अलका अग्रवाल
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