कम्मो – यशोधरा भटनागर
कम्मो
– यशोधरा भटनागर
काली घटाओं का घटाटोप, उमड़ते- घुमड़ते बादल ,माटी की सौंधी गंध और बूंदों का संगीत।अहा!वर्षा ऋतु का मंगलकारी आगमन !
शीघ्र ही पकौड़ों की सुगंध वातावरण में रच-बस गई और नथुनों के रास्ते उतर जिह्वा को रससिक्त कर गई। यही तो सरस आनंद है।
बरसते पानी में भीगते-थिरकते,तन-मन भीग गया।तभी बर्तनों की ‘छन्न ‘की आवाज ज़मीन पर लौटा लाई।
कम्मो बर्तन साफ कर रही थी। ‘”जल्दी आ ,बाहर कितना मज़ा आ रहा है ।चल चाय बना ला,पोर्च में बैठ कर पिएँगे और हाँ साथ में…।” मैं बोलती चली जा रही थी कि प्रत्युत्तर में कम्मो चाय लेकर आ गई।
”घरों की छतों से झरने बन गिरता पानी कितना अच्छा लग रहा है ?अब गर्मी से थोड़ी राहत मिलेगी।देख पेड़-पौधे कितने हरे और खुश लग रहे हैं !”
“मैडम जी मैं घर जाऊँ ?”
“थोड़ी देर रुक जा ।”
“मैडम जी घर में पानी भर गया होगा।अभी अपने झोपड़े को बरसाती कहाँ पहनाई है? खाना कैसे बनाऊँगी ?लकड़ी भी गीली हो गई होगी,चूल्हा कैसे जलेगा?”
“अच्छा चाय तो पीकर जा।”
वर्षा की झरती बूंदों के साथ एक-एक घूँट को कंठ में उतारते मैं पावस की पहली झड़ी का आनंद ले रही थी पर कम्मो पूरी चाय एक घूँट गटक गई। उसकी इस उद्विग्नता से मैं भी कुछ परेशान हो गई और मेरा मन कम्मो के साथ हो लिया। सामने ही बनी झोंपड़ियों में एक झोंपड़ी कम्मो की भी है।
सिर पर दुपट्टा डाल,आप ही आप व्यथा कथा गुनती -गुनाती,चली जा रही थी। झोपड़ी के बाहर ही बिन वसन रमुआ पानी में छपा-छप्प नाच रहा था।किसको ढके?झोपड़ी या रमुआ?उसकी मुट्ठी भिंच गई। मुट्ठी में कसा पसीने से भीगा नोट कसमसा कर रह गया।
कम्मो गीली-सूखी लकड़ियों को सुलगाने लगी।झोपड़ी में धुआँ ही धुआँ भर गया और पावस संग उसकी आँखें भी झरने लगीं।
कम्मो का चूल्हा भी बूंदों की मार संग जलता-बुझता रहा…छन्न-छन्न, भक्क-भक्क…।
डॉ.यशोधरा भटनागर
152, अलकापुरी, देवास, मध्यप्रदेश-455001
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