आज अमावस है पर कितनी फैली है उजियाली।
हर दीपक ने लौ अपनी अम्बर को आज उछाली।
नन्हे नन्हे दीप हैं पर कितनी है बात निराली।
इन दीपों ने आज बदल दी रात भयानक काली।
फिर से आज धरा पर है एक नूर की बेला आली।
जगमग जगमग दीप लिए फिर आई है दीवाली।।
दीपक हैं या मणिमरकत हैं आज चमकते घर घर।
दीपक हैं या तोड़ के तारे फेंक गया है अम्बर।
या श्री राम के उगल रहे हैं अब तक आग धनुष शर।
तारे टंके हुए हैं या दीवाली की चुनरी पर।
कुछ भी हो दीवाली तेरी शोभा बड़ी निराली।
जगमग जगमग दीप लिए फिर आई है दीवाली।।
विजय ‘अरुण’
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