“ईश्वर-अल्ला तेरो नाम” – पीयूष अवस्थी

Piyush_Awasthi_Color-

“ईश्वर-अल्ला तेरो नाम”

– पीयूष अवस्थी

आज 2 अक्टूबर है, दूर किसी लाउडस्पीकर से यह भजन सुनाई दे रहा था ‘‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान’’! श्रद्धेय महात्मा गाँधी जी की तस्वीर आँखों में उतर आई! अधिकांश जातिवाद को हवा देतीं ख़बरें धूमिल सी पड़ गयीं! मन में एक अजब सी ख़ुशी का अहसास हुआ, लगा जैसे कोई बिछड़ा हुआ साथी बरसों बाद यकायक सामने नज़र आ गया हो! मैं कमरे से निकलकर बालकनी में आ गया, पूरे भजन/गीत  को ध्यान से सुना, बहुत अच्छा लगा, शायद यही वक़्त की ज़रूरत भी है! अब तक तो सिर्फ़ ‘‘ईश्वर-अल्ला तेरो नाम’’ ही अधिकांश याद रहता था, आज तो पूरे गीत की पंक्तियाँ ज़हन में तैरने लगीं थीं! संभवतः मेरी तरह ही आपने भी पूरा गीत/भजन न सुना हो, दरअसल मूल भजन में महात्मा गाँधी जी ने कुछ बदलाव किये थे या कराये थे! उन्होने भजन में ‘‘अल्लाह’’ शब्द जोड़ दिया था ताकि विशेषकर हिन्दुओं और मुस्लिमों में धर्म निरपेक्षता और सदभाव, एकता, सुलह का वातावरण और मजबूत हो! वैसे इस भजन की मूल पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं:

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम!
सुंदर विग्रह मेघाश्याम, गंगा तुलसी शालिग्राम!
भद्रगिरीश्वर सीताराम, भगत-जनप्रिय सीताराम!
जानकीरमणा सीताराम, जय-जय राघव सीताराम!

 

यह भजन सैकड़ो वर्षों से लोकप्रिय था, महात्मा गाँधी जी अक्सर इसे सुना करते थे, गाया भी करते थे, एक दिन देश के हालात और समाज का चिंतन कर उनके मन में इसे सार्वजनिक धर्म निरपेक्ष स्वरूप देने का विचार आया, उन्होंने इसे परिवर्तित रुप प्रदान किया और यह भजन एक लोकप्रिय भजन और गीत के रूप में जनमानस के मानस पटल पर छा गया, इसे बहुत लोकप्रियता मिली! सर्वप्रथम 12 मार्च, 1930 को महात्मा गाँधी जी के नमक आंदोलन ‘‘डांडी मार्च’’ के समय इस गीत को गाया गया था! पूरा गीत/भजन निम्नवत है:

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सबको सन्मति दे भगवान।
सबको सन्मति दे भगवान,
सारा जग तेरी सन्तान।।

इस धरती पर बसने वाले,
सब हैं तेरी गोद के पाले।
कोई नीच ना कोई महान,
सबको सन्मति दे भगवान।।
सबको सन्मति दे भगवान,
सारा जग तेरी सन्तान।।

जातों नस्लों के बँटवारे,
झूठ कहा ये तेरे द्वारे।
तेरे लिए सब एक समान,
सबको सन्मति दे भगवा

सबको सन्मति दे भगवान,
सारा जग तेरी सन्तान।।

जनम का कोई मोल नहीं है,
जनम मनुष का तोल नहीं है।
करम से है सबकी पहचान,
सबको सन्मति दे भगवान।

सबको सन्मति दे भगवान,
सारा जग तेरी सन्तान।।

ईश्वर अल्लाह तेरे नाम,
सबको सन्मति दे भगवान।
सबको सन्मति दे भगवान,
सारा जग तेरी सन्तान।। 

यह गीत/भजन सबको रास आया! इस गीत की लोकप्रियता बढ़ती गई और गीत के साथ ही गाँधी जी पर आस्था रखने वाले लोगों में सौहार्द, एकता, धर्मनिरपेक्षता का वातावरण विकसित करने में इस भजन/गीत ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी जी इस भजन कोई अपनी रोज़ की पूजा में करते थे, इस वजह से भी यह भजन बहुत प्रसिद्ध हुआ, इतना प्रसिद्ध हुआ कि मूल भजन को लोग भूल सा गये, शायद ही किसी को याद रहा हो! हालांकि मूल भजन के रचयिता के बारे में तमाम मतांतर हैं, इस भजन की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग संस्करण हैं, कुछ लोग इस मूल भजन का श्रेय तुलसीदास जी को देते हैं, कुछ लोग 17 वीं सदी के मराठी कवि-संत रामदास

द्वारा रचित मानते हैं, लेकिन प्रमाणित रूप से यह  17 वीं शताब्दी के वैष्णवी संत श्री लक्ष्मणाचार्य के ग्रन्थ ‘‘श्री नमः रामायणम’’ में इस भजन का ज़िक्र मिलता है! वैसे 1948 में एक फ़िल्म आई थी ‘‘श्री राम भक्त हनुमान’’ उसमें इस मूल भजन का मूल स्वरूप उपलब्ध है!

लेकिन सच तो यह है कि अधिकांश भारतीयों को महात्मा गाँधी का भजन ‘‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम…! ही याद है!

फिर भी वो कौन लोग हैं जो महात्मा गाँधी के इस अमर गीत को मृत्यु देना चाहते हैं, इसकी मूल आत्मा को नष्ट कर देना चाहते हैं, सौहार्द और एकता के अटूट संबंधों को छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं ! ऐसे कतिपय लोग कितनी भी कोशिशें कर लें, उन्हें कभी सफलता नहीं मिलेगी, क्योंकि हमारा समाज आज जाग गया है, शायद कुछ-कुछ समझने लगा है, कुछ अंधे हो गये लोगों को छोड़कर बाकी समाज की आँखों में छाया धुंधल्का अब साफ होने लगा है, सबको साफ़ दीखने लगा है! हमारा समाज किस गलत रास्ते की ओर ढकेला जा रहा है? लेकिन अब हमारा समाज जाग गया है, सजग हो गया है, कितने ही दुर्दान्त लुटेरों, आतिताइयों ने, पश्चिमी देशों ने हमारी सभ्यता, सौहार्द को मिटाने की कोशिश की लेकिन भारत के जांबाज़ वीरों ने इसे होने नहीं दिया, मुहम्मद इक़बाल का यह शे’र हमेशा ज़िन्दा रहा और ज़िन्दा रहेगा!

‘‘कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़हाँ हमारा!’

इस ख्याल में मेरे भी दोहे शामिल हैं (पियूषा-दोहावली से):
खींच धरम के नाम पर, कितनी ही तलवार
कोई खींच न पायेगा, भारत में दीवार !

बाबर से डायर तलक, सबके क्रूर प्रहार
इस माटी के बीज ने, कभी न मानी हार

अब ऐसे सभी लोगों को सचेत हो जाना चाहिए, जो इस जनता को नाकारा समझते हैं, खिलौना समझते हैं, फूट डालना और राज करना, यही नीति अंग्रेजों की भी रही है, वही प्रक्रिया फिर-फिर दोहराने की प्रवृत्ति आखि़र कितने दिन चलेगी! एक दिन अंग्रेजों को भी हारकर भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था! अपनी नफ़रत का बाज़ार तुम अपने पास ही  रक्खो, एक दिन तुम्हारी चालाकी, तुम्हारी नफ़रत तुम्हें ही खा जाएगी!

महात्मा गाँधी जी के आदर्शाे पर चलने वाले भारतीयों के सब्र का जब-जब इम्तिहान लिया गया है, उन्होंने मुहब्बत से, हौसले से हर इम्तिहान पास किया है, शुक्र मनाओ कि हम अभी तक अहिंसक हैं! महात्मा गाँधी भी शायद इसी प्यार मुहब्बत, शांति आंदोलन, भारत जोड़ो यात्रा, डांडी यात्रा जैसे शांति के नारों से अभिभूत थे, तभी उन्होंने गीता के एक श्लोक की आधी पंक्ति को प्राथमिकता प्रदान की और उसी को अपना हथियार बनाया:  ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’’

जबकि पूर्ण श्लोक इस प्रकार है:

‘‘अहिंसा परमो धर्मः
धर्म हिंसा तदैव च!’’

(अर्थात- अहिंसा मनुष्य का परम् धर्म है, किन्तु धर्म की रक्षा के लिये हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है)

इस पूरे श्लोक का पालन तो कर सकते हो लेकिन पहले यह तो तय कर लो कि तुम्हारा ‘‘धर्म’’ क्या है?

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, शिया-सुन्नी, ऊँच-नीच, ठाकुर-जाट, आदि-आदि, न जाने कितने खेमों में बँटने वाले या बाँटे गये हो, तुम्हें सच नहीं पता, तुम धीरे-धीरे कब बँटते चले गये, कोई तो था जो तुम्हें अपने इशारों पर नचाने के लिये बाँटता चला गया और तुम….! तुम लोग समझ ही नहीं पाए!

लेकिन धर्म की परिभाषा सबसे अलग है, धर्म तो कर्म के अनुसार मापना चाहिए, इस देश में भी किसान, जवान, विज्ञान, मज़दूर, डाक्टर- ये प्रमुख धर्म हैं, इक्का-दुक्का और जोड़ सकते हैं, इन सबकी कोई धर्म जाति माइने नहीं रखती क्योंकि इनके द्वारा उपजायें अन्न पर कोई जाति नहीं लिखी होती, जवान पहरेदारी करता है वहाँ कोई मेजर कोई जवान होता, डॉक्टर सभी का इलाज करता है, मजदूर मकान से लेकर संसद और राममंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च सभी बनाता है, विज्ञान- इसमें तमाम अनुसंधान करने वाले, शस्त्र बनाने वाले, फोन, नेट आदि-आदि! कहने का अर्थ है जब हमारे कर्म ही हमारी जाति बताता है तो फिर और कोई धर्म क्या करेगा!

हाँ, एक और सार्वभौंमिक धर्म है जो सबसे बड़ा है, इन सब धर्मों से बड़ा! वो है देश धर्म!!

देशहित तो सबसे बड़ा धर्म है! इससे बड़ा कोई धर्म हो ही नहीं सकता! तुम्हारे देश या कोई तुम्हारे देशवासियों पर आक्रमण करे, देश बेचने लगे, खंडित करने का प्रयास करने लगे तो उसपर वैसा ही प्रतिरोध करो जैसा वो कर रहा है, हिंसा का अर्थ सिर्फ़ मारकाट या खूनखराबा नहीं है, उसका प्यार से विरोध करो, दुत्कार कर विरोध करो! उससे उसकी शक्तियाँ छीनकर विरोध दर्ज़ करो, लेकिन कैसे भी विरोध करो!

आइये आज महात्मा गाँधी जी की यौमे-पैदाइश, उनके जन्म दिवस, महीने पर हम सब यह शपथ लें कि जब भी मौका मिले सप्ताह में, पाक्षिक, महीने में हम सब मिलकर अपने आसपास के चौपाल पर, किसी मैदान पर, या जहाँ हर तरफ से लोग आ सकें, वहाँ महात्मा गाँधी जी के सहृदयता से परिपूर्ण भजन को तन्मयता से, संगीत के साथ, झूम-झूम कर गाएंगे, जिसमें हर वर्ग के लोग शामिल होंगे, अंधों की आँखों में नई रौशनी प्रकट करेंगे! यह गीत जब गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर तक अपने महल्ले, अपनी सोसाइटी, चौपालों तक बार-बार गाया जायेगा, आने वाली पीढ़ियों को एक नई दिशा मिलेगी, इसकी गूंज से देश को लूटने वाले, बाँटने वालों का कलेजा हिल जायेगा! मैं भी कोशिश करुँगा, आप भी कीजिये !!

 

जय संविधान की…..!
जय महात्मा गाँधी की……!
जय भारत माता की………!!

 

 

-पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक

शब्दकार पत्रिका/शब्दकार प्रकाशन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *