विस्तृत भजिया कथा सार…?
विस्तृत भजिया कथा सार...?
- दिनेश गंगराड़े
जब और कुछ ना हो खाने के लिये तो मैगी या भजिये खाना चाहिए।जब बनाने को कुछ और ना हो तो तो भजिये,मैगी बनाना चाहिए। जब भी कुछ खाने का ,खिलाने का मन हो ,कुछ खाने का मन ना हो। करने को कुछ ना हो ,करने के लिये बहुत कुछ हो ,तो भजिये बनाने से बेहतर और कुछ नहीं।ये बनाना आसान,भक्षण आसान और जब आसान काम हासिल हो तो कठिन काम क्यों करना? ये सोचना भी बेकार है। काम करता ही क्यों है मनख।पापी पेट के लिए नही,जीभ के लिये।जीभ दीवानी है भजियों की। उसके लिये मर मिटने वाली,जान देने वाली, उसके लिये भजिये से अच्छा ना पहले कुछ था ना अब है ,ना आगे जाकर रहेगा।भजिये किसे पसंद नहीं,तले पकौड़े हर आदमी को पसंद आते है और जब तक आदमी अपनी पसंद का खाता पीता है सुखी रहता है। ऐसे में सुखी रहने की ज़िम्मेदारी भजियों के अलावा और किसी पर डालना बेमानी है।भजियों से दूरी बनाकर दुखी होना समझदारी नही। सुखी रहने का सबसे सस्ता ,सुंदर और टिकाऊ तरीक़ा है जो इंसान ईजाद कर सका है अब तक वह भजिया ही है।भजिये समावेशी ,
संतोषी सरल और सुलभ होने का पाठ पढ़ाते है हमें,थोड़ा सा तेल और और बेसन ,मूँग या उड़द का घोल लें, और फिर जो मर्ज़ी हो आपकी आलू ,प्याज़ ,धनिया ,मिर्च ,गिलकी बैंगन पालक ,ब्रेड ,पनीर ,भुट्टा ,मैथी ,फूलगोभी,पत्ता गोभी, टमाटर, जो आसपास दिखे,घर मे हो,डाल दें इसमें।सभी को अपना बनाना आता है भजिये को। इनके घोल को गर्म तेल की कढ़ाई में छनछनाते देखिये।आपको लगेगा नरक के गर्म तेल के कढ़ाह उतने बुरे और डरावने भी नहीं होंगे जितने हमें बताए गये हैं।
भजिये सारे दुख दर्द की दवा है,इन्हें खाते वक्त मजा हासिल होता है ,आप सारे ग़म भुला देते है। खुश रहने की दवा है भजिये और फिर यह दवा बहुत मँहगी भी नही। दारू का सबसे सटीक खार मंजन भजिया ,मौसम का साथ और मिल जाये इसे फिर इसके क्या कहने। अब ये मत कहिये कि दारू ख़रीदना आपकी औक़ात से बाहर है अब। भजिये होते हैं
मिलनसार। दारू ना तो चटनी सही।भजियों के साथ चटनी बना ना सके आप ! वो भी मामूली लागत पर । चटनी नहीं तो चाय को आज़मा लें। भजियों की चाय से भी खूब जमती है। अब भी इसे लेकर भी अपनी फटी जेब का रोना रोयें तो कौन मानेगा आपकी।कौन बदनसीब होगा जिसने कभी इनका स्वाद न लिया हो।भजिये दोस्तों के लिये ज़रूरी। मेहमानों के लिये ज़रूरी। आप फटेहाल हो ,कोई अचानक चले आये घर ,ऐसे में भजिये ही आपके स्वाभिमान की रक्षा करते है। होली हो या दिवाली। सारे त्यौहार अधूरे ही हुए उनके बग़ैर ।भजिये बेरोज़गारी का इलाज। इसलिये और कुछ आये ना आये ,हर हिंदुस्तानी को भजिया बनाना आना ही चाहिए।ताज्जुब की बात यह कि भजिये जैसे मिलनसार और सरल चीज के भी दुश्मन मिल जाएँगें आपको। ये आपको डराने से बाज नहीं आएँगे। ये तेल और मिर्च की दुकान है,।
ब्लडप्रेशर के दुश्मन है,वज़न बढा देगें , मार डालेंगे जैसी वाहियात बात करने वाले अकलमंद लोगो की कमी कहाँ है हमारे यहाँ। इनकी एक मत सुनिए। आपने कभी सुना है कि भजिये न खाने वाला कोई इंसान अमर हो गया है ? ऐसे मे जब भजियों से मुलाक़ात हो , उन्हें खा ही लेना चाहिए पर भजिये बनाना सब को आता तो क्या बात थी। बहुतेरे बनाते है बेस्वाद। कच्चे पक्के। मसालों के हिसाब का ठिकाना नहीं। ऐसे में पेट भी ख़राब होता है और दिमाग़ भी। अच्छे बने भजिये भी पेट ख़राब करते ही है । केवल भजिये खाकर ज़िंदा रहना मुश्किल। भजियों में होती है मिर्च। खाने वाले को लगती है। कभी कभी ऐसी जगह जाकर लग जाती है ,जहां नहीं लगना चाहिए।दूसरे दिन भजिये बदला लेते है। भजियो की ज़्यादा बात की जाए तो उनको भी लगती है मिर्ची जिन्होंने सबसे पहले उनकी बात शुरू की थी।इस सारी कहासुनी का लब्बोलुआब यह कि भजिये हमारी ज़िंदगी में इस तरह शामिल हैं कि जहां भी जाओ इनकी महफ़िल सजी दिखती है।और फिर आजकल बारिशों का मौसम है। बारिश के दिन भजियों की चाहतों के दिन होते हैं।बरसात होती ही इसलिए है ताकि भजिये बन सके और भजिये बनते हैं तो बरसात होने लगती है।क्या कहा आपने। भजिये खाने का मन होने लगा है आपका। पर एक ज़रूरी बात बताना भूल गया मैं आपको शायद। आप जब चाहें तब आपकी बीबी तब भजिये तलना शुरू कर दें ऐसी बीबियाँ केवल मुझ जैसे नसीब वालों को ही हासिल होती हैं । ज़ाहिर है , भजियो से क़िस्मत के अच्छे बुरे होने की तस्दीक़ भी की जा सकती है । ऐसे में अपनी बीबी से भजियों की बात कर के देख लें एक बार। यदि बनवा लें आप उससे भजिये तो मुझे बताना ज़रूर याद रखे।कुछ लोगों की नाक भजिये सी होती है,कई बार भजिया नाक के आकार का बन जाता है? बचपन में हम जब भजिये खाते थे तो उनके आकर अनुसार कभी बंदर, कुत्ता, मुर्गा, बकरी, बिल्ली, मोटर, गाड़ी, चूहा खाते थे तब माँ जोर से चिल्लाती थी। भजिये-चटनी का चड्डी, बनियान सा सदियों से साथ है। दोनों एक-दूजे के बिना अधूरे है। भजिये न बने तो शीतला सप्तमी, दिवाली,रंगों का त्यौहार ही न मने? भजियों में नमक का बड़ा टँटा रहता है, ज्यादा हो गया तो हेडेक,कम रहा तो महा हेडेक? नमक का स्वाद देखने में ही लोग एक-दो प्लेट सलटा देते हैं। जिस बहु को भजिया बनाना भी न आये उनकी दुर्गति है।आलसियों को लोग बोलते हैं यहां कई भजिया तल रहे हो?इनकोभजिये,पकोड़े,गुलगुले,भी बकते है।
-दिनेश गंगराड़े,
समरपार्क, निपानिया, इंदौर452010 मप्र