अलका मिश्रा की ग़ज़लें

अलका मिश्रा की ग़ज़लें

– अलका मिश्रा

1-

ख़्वाबों को पलकों पर ढोना पड़ता है
जागी आँखों से भी सोना पड़ता है 

उसको पाने की चाहत तो अच्छी है
लेकिन इसमें ख़ुद को खोना पड़ता है

मुर्शिद से कुछ पाना हो तो फिर हमको
बिल्कुल बच्चे जैसा होना पड़ता है

दुनियादारी के रस्ते पर चल तो दें
लेकिन बीच में  मन का कोना पड़ता है

बाद में आएँगे सच्चे रिश्तों के फल
बीज प्यार का पहले बोना पड़ता है

इतना भी आसान नहीं सच का रस्ता
इसमें अक्सर भूखा  सोना पड़ता है

2-

देखने में तो माह पारा है
अस्ल में ज़िंदगी शरारा है

राख़ हो जाएं उसको छूकर हम
बस यही ख़्वाब अब हमारा है

साँस आने से साँस जाने तक
ज़िंदगी सिर्फ़ इक ख़ासारा है

मंज़िलों के सुरूर ने हमको
हाय! किस मोड़ से गुज़ारा है

जीत हासिल हुई तो है लेकिन
कोई हम में, हमीं से हारा है

एक साकित सी झील थे हम भी
जाने कंकर ये किस ने मारा है

ग़ज़ल- पाँच

लब हिले ही नहीं शिकायत में
हम तो मारे गए मुरव्वत में

जज सुबूतों पे फ़ैसला देंगे
लाख सर पीटिये अदालत में

सच न कहने के दाम मिलते हैं
झूट चलता है अब सहाफ़त में

अब किसे फ़िक़्र है ज़माने की
कुछ नहीं रह गया नसीहत में

लाख क़ाबिल हों आप, ये सच है
कुछ नहीं सूझता मुसीबत में

ये सरापा सराब है साहब
क्यूँ भटकते हैं सब मुहब्बत में

ज़िंदगी ख़ुशगवार रहती है
दोस्तों की हसीन सोहबत में

– अलका मिश्रा

ग़ज़लगो, कवियित्री

पता – कानपुर, उ. प्र.

ई मेल – alkaarjit27@gmail.com

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