पीयूष अवस्थी के पद

पीयूष अवस्थी के पद

- पीयूष अवस्थी

*** कृपया विशेष ध्यान दीजिये ***

प्रिय दोस्तों!

         लगभग 15 वर्षो से फेसबुक के माध्यम से आप सभी से जुडा रहा हूँ, गीत, ग़ज़ल, पद, कविता, कहानी लेख, हास्य -व्यंग्य आदि अनेक विधाओं की रचनाएँ देखने, पढ़ने, सुनने को मिलती रहीं! लेकिन कहीं भी ‘छंद -विन्यास’ की महती शैली ” पद ” का सृजनात्मक पहलू कहीं धूल धूसरित  होकर लुप्त होता गया! दरसल यह तो एक छंद शैली है अधिकतर पदों के लिये सूरदास जी और मीरा को ही जानते हैं, और मन में कहीं ऐसी धारणा अवतरित, व्याप्त हो चुकी है कि पद का मतलब भक्ति भाव की रचनाएँ!

          इस संदर्भ में मेरा ध्यान कई बार गया, वर्ष लगभग 1980 के आसपास कई पदों का सृजन करने का प्रयास किया था, जो सामयिक वातावरण, हालत को समाहित करने का माध्यम थे, बीच में एकाध बार मैंने fb में पोस्ट भी किया, लेकिन शायद लोगों ने बहुत महत्व नहीं दिया, मेरी ग़ज़लों को जो प्रोत्साहन मिलता था, वो नहीं दिखाई पड़ा!

         लेकिन अब मुझे मेरा पुराना पदों का खज़ाना मिल गया है, इसे और आगे बढ़ाने का सिलसिला जारी रखूँगा, शायद ” पियूषा -दोहावली ” की तरह एक और ” पियूषा -पदावली ” भी किताब के स्वरूप में सामने आ सके!

        आप विशेष ग़ौर करेंगे तो इन पदों में दोहे, ग़ज़ल की आत्मा भी दिखाई देगी! आप भी इस विधा को आगे ले चलने हेतु साथ आइये! आपका फेसबुक और मेरी पत्रिका में भरपूर स्वागत होगा, आशा हैँ आपको कुछ नयेपन की झलक दिखने को मिले! शुभकामनायें (इसे बोल्ड करना है )

                             *** पद *** (1)

    भैया ! तेरा किधर खयाल !!

    उनके हाथों ही तलवारें, जिनके हाथों ढाल !

    उसने ही  फेंके हैं दाने, जिसने फेंका जाल !

                                       भैया! तेरा किधर खयाल..!

    दर्पण छोड़ रहा है केंचुल, चहरे चढ़ती खाल !

    एक युधिष्ठिर साथ नहीं है, यक्ष सैकड़ों ताल !

                                       भैया! तेरा किधर खयाल –!

    जो अति  में वैभवशाली हैं, मति  में हैं कंगाल !

    काँधे पर लादा हैँ जिसको, निकला वो बेताल !

                                        भैया ! तेरा किधर खयाल..!

                                (2)

      भैया ! वक़्त बड़ा संगीन !!

       आँखे तो अपनी हैं लेकिन, सपने पर -आधीन !

       अपनों  से  संबंध  हैं  ऐसे, जैसे  भारत – चीन !

                                        भैया ! वक़्त बड़ा संगीन..!

       जीत -हार उनकी मरजी है, कौड़ी, पाशा तीन !

       जिनके  पाँवों  ज़मीं नहीं है, वे  सत्ता आसीन !

                                        भैया ! वक़्त बड़ा संगीन..!

       खुशियाँ सारी फुर्र हो गईं, सब चहरे ग़मगीन !

       महंगाई  के  सर्प  नाचते, बाजे  कहीं न बीन !

                                        भैया ! वक़्त बड़ा संगीन..!

       चाहे  जिसकी  आँखों  झाँको, आँसू  हैं रंगीन !

       प्यास बुझेगी तभी “पियूषा”, खोदो नई ज़मीन!

                                        भैया ! वक़्त बड़ा संगीन..!

– पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक

शब्दकार पत्रिका

शब्दकार प्रकाशन 

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