रिश्तों में गर्माहट
रिश्तों में गर्माहट
- डॉ. शिखा अग्रवाल
मां, आपके और पापा के लिए स्वेटर भेजे थे, मिल गए होंगे। कैसे लगे? बहुत गर्म है ना” दूर देश बैठे बेटे ने फोन पर पूछा। “हां बेटा, स्वेटर तो मिल गए पर तुम लोग कब आओगे। बहुत साल हो गए तुम लोगों से मिले हुए।” बेटे से बात करते हुए नर्मदा की आवाज भर्रा गई। नर्मदा के पास बैठे अखिलेश उदास से शून्य में देख रहे थे। अक्सर ऐसा ही होता था कि जब भी नर्मदा की बेटे से बात होती थी तो उसकी आंखों से आंसू बहने लगते थे और पिता, अखिलेश, चुपचाप बैठे हुए दोनों की बात सुनते रहते। फिर आखिर में दो शब्द पिता से बोल कर बेटा फोन बंद कर देता था। कभी कभी तो अखिलेश को लगता था कि दुनिया की चकाचौंध में फंस कर बेटे को विदेश भेज कर बहुत बड़ी गलती कर दी। लेकिन तब तो सब के सामने इस बात का गुरूर होता था कि उनका बेटा विदेश में रहता है। पर अब बढ़ती उम्र और सेहत के साथ ना देने के कारण उन दोनों के लिए इतना लंबा सफर संभव नहीं था और बच्चों के पास आने का समय नहीं है।
इस बार बेटे के आने का अंतराल और इंतज़ार कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया था। हर बार वह आने का प्रोग्राम बनाता था और ऐन वक्त पर किसी न किसी कारण से उसका आना कैंसिल हो जाता जिसकी भरपाई वह कोई ना कोई गिफ्ट भेज कर करता रहता। “समय मिलते ही आ जाएंगे मां, ताशी भी अब बड़ी हो गई है। उसको भी आप लोगों से मिलवाना है।” बेटे ने बात खत्म करते हुए फोन रख दिया। बहू और ताशी से बात करने की तमन्ना दिल में ही रह गई। उन्होंने सिरहाने रखा, बेटे का भेजा हुआ स्वेटर कसकर थाम लिया और खुद से ही बात करने लगी, ‘ बेटा, हमें तुम्हारे प्यार और साथ की जरूरत है, हमें स्वेटर की गर्माहट नहीं; रिश्तों में गर्माहट की जरूरत है।’
– डॉ. शिखा अग्रवाल
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