“किशोरावस्था का प्रेम”
कथा- कहानी
"किशोरावस्था का प्रेम"
सतीश "बब्बा"
हल्की – हल्की रेखा, नाक के नीचे भूरी लाइन से मूछों का आकार और चिकने – चिकने गालों पर भूरे – भूरे रोंएं मुझको आकर्षक बनाती थीं। मैं अब समझ पाया जो मेरी भाभियां कहतीं थीं कि, “पा जाऊं तो दबाकर रखे रहूं!” उनकी रहस्यमय बातें तब मैं समझ नहीं पाता था।
अपनी हमजोली विषमलिंगी के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था। शायद यही किशोरावस्था थी कि, शरारतें बढ़ने लगी थीं।
लेकिन अम्मा और बापू का डर बहुत था। मजाल क्या थी अपनी कि, किसी को बिना मतलब टोंक सकते।
प्राथमिक पाठशाला छूट गई थी। जूनियर हाईस्कूल से अब कालेज में पढ़ाई के लिए पैदल छः – सात किलोमीटर जाना पड़ता था। और घर में भी पढ़ाई अलग करते थे।
छुट्टी पर और शाम को सहपाठियों के साथ प्राइमरी स्कूल की तरफ खेलने चले जाते थे। जहां बचपन की ताजा यादें और छूटते बचपन का गम भावविभोर करता था।
वैसे भी किशोरावस्था में बापू का डर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर बाप की कड़ी निगरानी न हो तो पूरा जीवन दुखमय हो सकता है। किशोरावस्था में बापू का भय हमें बहुत ऊंचाई तक पहुंचाने में कारगर होता है। फिर भी पिता जी की आंखें बचाकर स्वस्थ शरारतें हो ही जाया करती थीं।
हम भी प्राइमरी स्कूल के पास रहने वाली रानी की ओर आकर्षित हो गये थे। कितनी सुन्दर थी वह बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर उसने भी पांव रखा था। वह सिर्फ नाम की रानी नहीं थी; वह रूप की रानी और दिल की रानी थी।
प्राथमिक पाठशाला पास होने के कारण रानी कक्षा पांच पास कर लिया था, वरना उस जमाने में फिर गांव में बेटियों को कहां पढ़ाते थे कोई! तेरह साल में शादी की चर्चा और फिर शादी; फिर पांच या सात साल में गवना कर दिया जाता था।
हां तो अब समझ में आ रहा है कि, मेरा आकर्षण साधारण नहीं था, मुझे रानी से प्यार हो गया था। फिर भी मैं उससे कभी भी इसका इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि बापू की इज्जत का और गांव, परिवार तथा बुजुर्गों के डर के अलावा एक डर और था कि, कहीं मेरा प्यार एकतरफा न हो! वह डर भी मैं सम्मानजनक मानता हूं; यही डर तो हमारा संस्कार और संस्कृति है।
मैं कालेज से आकर जल्दी जल्दी रानी के घर की ओर भागता।
कुछ सहपाठी मित्र मेरे साथ हुआ करते थे। हम रानी के दरवाजे के सामने जोर – जोर से बोलते, बातें करते और प्राइमरी स्कूल के कुएं जाकर बैठा करते थे! जहां रानी मिट्टी का घड़ा अपने कमर में दबाकर एक हाथ से और एक हाथ में लोहे की बाल्टी लटकाए रस्सी कंधे पर डालकर आ जाया करती थी।
रानी के घरवाले खेतों से रात में ही लौटते थे और रानी सभी काम कर लेती थी और पानी में खूब समय लगाया करती थी। मैं उस घड़े और रस्सी के भाग्य पर जलता था।
कुछ सहेलियां रानी की कुएं के पनघट पर हंसी – ठिठोली रानी के साथ किया करती थीं। जाने क्या कहतीं, लेकिन उनकी हंसी से ऐसा लगता था जैसे गुलाब के फूल झरते हों।
कभी कभी हिम्मत करके मैं बिना प्यास के ही प्यासा हो जाता फिर भी रानी से नहीं कह पाता उसकी सहेलियों से कहता और उसकी सहेलियां कहतीं, “रानी, बेचारा प्यासा है, तुम प्यास बुझाओ इसकी!”
शायद उनको पता था, फिर भी मैं उनके इस बात को भी नहीं समझ पाया था। रानी मुझे पानी पिलाया करती थी अपनी बाल्टी में धार बनाकर और मैं चुल्लू से पानी पीता कहां पानी को बहाते हुए रानी के चेहरे पर आंखें गड़ाए देखा करता था।
जब कोई सयानी भाभी और बूढ़ी काकी आती तब रानी शर्म से लाल हो जाती और मैं पानी पीना छोड़कर एक तरफ जहां से वह दिखाई देती और उसके घर का रास्ता होता वहां जाकर अपने मित्र मंडल के साथ बैठ जाया करता था।
रानी को देने के लिए मैं रोज प्रेम – पत्र लिखा करता, शायरी लिखता और उसे देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। बापू का और रानी का बराबर डर था कि, कहीं नाराज न हो जाए।
ऐसे ही ऐसे में वर्षों बीत गए। मेरी शादी हो गई और रानी भी अपने ससुराल चली गई। तब मोबाइल की कल्पना तक नहीं थी; रेडियो का समय आ गया था।
आज बहुत सालों बाद रानी मिली थी। उसका भाई उसे लिवाकर आया था। उसने मुझे मेरा नाम लेकर बुलाया था और मैं भी उससे, “रानी कब आई तुम?” पूछा था।
उसके चेहरे पर आज भी वही वही आकर्षण था फिर कुछ खोई सी लगी थी वह मुझे। सरकारी नौकरी वाला पति था उसका, मैं उसके बारे में पता किया था।
मैंने उससे कहा, “रानी, तुम्हें याद है जब हम पैदल कलकहाइन लोखरी मेला करने बैसाख में जाया करते थे!”
उसने कहा, “हां हां क्यों नहीं, तुम किस्सा – कहानियों की किताबें ज्यादा खरीदते थे। और मुझे एकबार जलेबी दो आने की पाव भर दिलाया था!”
मैंने कहा, “रानी, माघ मे हम लालापुर मेला करने गए थे तब तुमने मुझे नंदन और चंपक खरीद कर दिया था वह मेरे पास अभी भी लाइब्रेरी में मेरे रखी हैं!”
उसके भाई ने कहा, “कल आपके घर रानी आने को कह रही थी तब और बातें कर लेना अभी जाने दीजिए देर हो रही है!”
हम फिर अपने घर आ गए और रानी अपने भाई के साथ उसके घर चली गई।
उसके तीसरे दिन में अपने आफिसनुमा बैठकें में बैठा था कि, रानी आ गई।
मैंने उसे आदर के साथ बैठाया और नाश्ते के लिए पूछा। तब वह कहने लगी, “बब्बा, बब्बा नाम और बब्बा हो भी गए हो, परंतु आज मैं नाश्ता करने नहीं तुमसे बात करने आई हूं!”
उसकी जबान से तुमसे संबोधन सुनकर बहुत ही अच्छा और अपनापन लगा। फिर भी मैं चुप रहा।
रानी ने कहा, “और सुनाओ बब्बा, अभी भी तुम बारह साल के हो क्या?”
मैं अपने प्रेमाश्रु कहूं या दुखाश्रु या या और कोई अश्रु कहूं उन्हें छुपाने की कोशिश के साथ इतना ही कह पाया, “रानी, तुम कैसी हो!”
रानी ने कहा, “बहुत बड़े धन की मालकिन हूं मैं! फिर भी बचपन और किशोरावस्था का प्रेम तुम जो हो मैं भुला नहीं पाई हूं, आज मुझे कहने में कोई डर भी नहीं है और आज गांव खुसर – फुसर भी नहीं करेगा और तुम्हारे मेरे बापू का डर भी नहीं है!”
अब मैंने कहा, “हां रानी, तुम यह बताओ क्या मेरी तरफ तुम भी मुझसे प्यार करती थी? मैं नहीं जानता वह प्यार ही था या चाहत, आकर्षण लेकिन तुम्हें देखे बिना मुझे चैन नहीं मिलता था!”
आज बिना झिझक, बिना डरे मैंने उससे अपनी बात कह दी थी।
रानी की आंखों से चंद अश्रुबिंदु गिरे और फिर उसने उन्हें आंचल से पोंछा और कहने लगी, “शायद वही प्यार था, पवित्र प्यार मेरा पानी भरा रहता था फिर भी मैं तुम्हारी आवाज सुनकर घिनौची का भरा पानी फेंककर दौड़ी – दौड़ी कुंए पर तुम्हें देखने आती थी; इस बात को मेरी सखियां भी जानतीं थीं!”
मैंने पूछा, “फिर तुमने मुझसे कभी कहा क्यों नहीं?”
वह गंभीर थी और कहने लगी, “यही तो हमारे संस्कार थे, मेरी तुम्हारी समस्या एक थी। मैं तुम्हें कमजोर नहीं, तुम्हें पूजती हूं। मैं लड़की जाति शर्म और मर्यादा में बंधी हुई थी, तुमसे कुछ कहने में शर्माती और डरती थी कहीं तुम मुझसे दूर न हो जाओ!”
मैंने कहा, “पगली कहीं की, मैंने बहुत खत लिखे थे तुम्हें, और रात भर जाग – जागकर तुम्हारी तस्वीरें बनाया करता था मैं!”
रानी गंभीर थी। उसने कहा, “तुम्हारी मेले वाली जलेबी इतनी स्वादिष्ट थी, सोंधी थी और मीठी थी जो इतने दिनों बाद भी उस स्वाद को दुबारा नहीं पा सकी हूं, इसी बात से तुम अंदाजा लगा सकते हो!”
रानी ने रुंधे गले से कहा, “कहने को सभी सुख हैं मुझे, एक तेरे प्यार से वंचित मैं आज भी कुछ खो गया है इस दुख से दुखी हूं!”
मैंने कहा, “रानी, मैं इतना कहां कमाता हूं, मैं तो तेरे सुख की कल्पना से खुश हूं और जीवित हूं!”
रानी ने कहा, “बब्बा, तेरे जैसा प्यार करने वाला शायद ही दुनिया में दूसरा कोई और होगा, मैं तो एक बार, एक टाइम खाकर भी तेरे संग सुखी रहती। सामाजिक तौर पर भी तेरा – मेरा विवाह हो सकता था लेकिन मर्यादा में बंधे हम दूर हो गये, तुम मेरी नजर में गिरे नहीं हो, तुम महान हो!”
मैंने उसे समझाया, “शायद कुदरत को यही मंजूर था!”
मैं आज भी रानी का हाथ पकड़ कर चूमना चाहता था लेकिन आज भी मैं मर्यादा नहीं लांघने की कोशिश की और तमाम बातें करते रहे मुझे ऐसा लगता था कि, वह बैठी रहे और कभी न जाए।
शायद रानी की भी मनोदशा यही थी और मेरी स्थिति को जान रही थी।
रानी ने कहा, “बब्बा, इसीलिए तुम मुझे आज भी बहुत अच्छे और महान लगते हो तुम आज भी मर्यादित हो! मैं जानती हूं कि तुम मुझे छूने के लिए आतुर हो क्योंकि मैं भी तुम्हें स्पर्श करना चाहती हूं, नहीं हम दोनों आज भी अपनी और अपने खानदान की, अम्मा – बापू की मर्यादाएं नहीं तोड़ना चाहते, तुम महान हो बब्बा!”
मैंने झट कहा, “रानी, मैं कुछ भी नहीं हूं तुम्हारे सामने, तुम प्रेम की प्रतिमूर्ति हो, मर्यादा और संस्कारों की देवी हो!”
हम दोनों बहुत देर तक आंसुओ से अपने – अपने चेहरों को भिगोते रहे।
हमारे पास आज कोई नहीं था न कुछ कहने वाला न ही आने वाला। फिर भी हम दोनों मर्यादा से बंधे हुए थे। अपने – अपने बच्चों के लिए।
जो उसकी सहेलियां थीं और मेरे सहपाठी थे आज भी वो हमसे हमारे इस किशोरावस्था के प्रेम का जिक्र कभी कभी कर ही देते हैं। और हम अपने बीते दिनों की अनुभूति से रोमांचित हो जाते हैं।
समय हो गया था और हम दोनों को फिर से मर्यादा का पालन करना था। एक दूसरे से अलग होकर कभी अलग न होकर भी अलग हो जाना था।
मैं रानी को अपने बैठकें से बाहर तक छोड़ने आया और रानी बिना मुड़े तेज कदमों से अपने मायके अपने घर की ओर चली गई।
उसके अंदर क्या था वह जाने अनुमानित शायद मेरी तरह के के हिलोरें वह भी दबाना चाह रही थी।
– सतीश “बब्बा”
पता – सतीश चन्द्र मिश्र, ग्राम+ पोस्टआफिस= कोबरा,
जिला – चित्रकूट, उत्तर – प्रदेश, पिनकोड – 210208.
मोबाइल – 9451048508, 9369255051.
ई मेल – babbasateesh@gmail.com