उसके लौट आने की आस
कथा- कहानी
उसके लौट आने की आस
डॉ प्रदीप उपाध्याय
मैं जब ट्रेन से लौट रहा था तब रह-रहकर वही सब बातें जेहन में आ रही थी। मैंने सोच भी तो लिया था कि अब तत्काल वापस लौटने का कोई मतलब नहीं। लेकिन फिर भी मन नहीं माना और हिमांशु से कहकर ट्रेन से वापसी का रिजर्वेशन करवा लिया था। कहीं न कहीं मन में आस थी कि छोटू लौट आएगा। मुझसे ज्यादा तो सविता के मन में यह बात थी और वह कह भी रही थी कि मुझे तो आज भी विश्वास नहीं हो रहा है कि छोटू नहीं रहा। ट्रेन से उतरते समय भी और रिक्शे में सवार होते समय भी छोटू ही दिलो-दिमाग में पैठ जमाए हुए था।
मुझे याद आ रहा था जब उस रात मैं कितना परेशान रहा । सविता भी लगातार कह रही थी कि देखो छोटू कल से घर नहीं पहुंचा। बगीचे और मकान पर नौकर-चाकर रखने का क्या मतलब है आखिर उनको छोटू का भी तो ध्यान रखना चाहिए था। हम सिर्फ चौकीदार रखकर ही काम चला सकते थे लेकिन सोचा था कि परिवार वाला रहेगा तो अच्छे से देखभाल हो सकेगी।
मैंने भी तो घर से निकलते वक्त ही किशन को ताकीद कर दिया था कि एक तो तुम्हें पेड़ -पौधों का ध्यान रखना है और दूसरा खास तौर पर ध्यान रखना है छोटू का।बस इन्हीं में मेरी जान अटकी रहती है और इसीलिए मैं कहीं आता-जाता नहीं हूं, शहर से बाहर जाने का कोई अवसर आता भी है तो किसी न किसी बहाने से टाल दिया करता हूं, लेकिन जहां जाना जरूरी रहता है, वहां तो जाना ही पड़ता है।
इसीलिए इस बार भी मैंने जाने से पहले किशन से कहा था कि -“पिछली बार चार दिन के लिए ही साहित्यिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए जयपुर गया था किन्तु तुम चार दिन भी ठीक से देखरेख नहीं कर सके थे और टफी चला गया…तुमने मुझे ज़माने भर का दर्द दे दिया …किन्तु देखना किशन,इस बार कोई ग़लती मत करना,कहीं कोई गड़बड़ मत होने देना।”
तब उसने मेरी बात पूरी होने के पूर्व ही आश्वस्त करते हुए कहा था कि -“नहीं बाबूजी,अब कोई ग़लती नहीं होगी,आप तो बेफ़िक्री से भैया के घर होकर आओ। यहां हम लोग सब संभाल लेंगे।” और मैंने उसकी बात पर विश्वास करते हुए हिंमाशु से पन्द्रह दिन रीवा रहने की सहमति दे दी थी।रीवा जाकर रोजाना की खोज खबर तो किशन से मोबाइल पर लेता ही रहता था और साथ में सीसीटीवी कैमरों पर भी वॉच कर लेता था किन्तु उस दिन जब दोपहर से ही छोटू के घर से गायब होने की सूचना मिली, तभी से किसी अनिष्ट की चिंता सताए जा रही थी। अन्तर्मन सशंकित तो था ही।मैंने जब सीसीटीवी कैमरे पर सुबह-सुबह देखा था तब वह पोर्च में कुर्सी पर बैठा हुआ था और सुस्त भी दिखाई दे रहा था।
मैंने चौकीदार किशन से पूछा भी था -” छोटू ठीक तो है न!” तब भी उसने यही कहा था कि-” हां,वह ठीक है।” सविता ने भी फोन लगाकर उसके हालचाल पूछ लिए थे और किशन की पत्नी राधा से यह भी कह दिया था कि -“छोटू यदि ज्यादा परेशान कर रहा हो तो हमें बता देना,हम तत्काल लौट आएंगे , भैया की छुट्टी भी है,वे छोड़ जाएंगे ।”
राधा ने इतना जरूर कहा था कि- “छोटू, दिनभर गेट की तरफ देखता रहता है।उसे लगता है कि आप जल्दी वापस आ जाओगे।पहले टफी था,तब दोनों साथ में रहते थे,उस समय इतनी दिक्कत नहीं थी।अब वह गेट से बाहर जाने की कोशिश करने लगा है।एक बार तो साइड की दीवार कूदकर बाहर निकल गया था। किन्तु आप लोग किसी बात की चिंता मत करना।हम लोग संभाल लेंगे।”
लेकिन फिर भी मुझे लगा कि वे लोग सही स्थिति नहीं बता रहे थे और इसीलिए मन में धुकधुकी बनी हुई थी। हालांकि वे हर बार यही कहते रहे कि छोटू ठीक है।आप परेशान मत होइए।
हमसे हिमांशु ने कहा भी था कि मम्मी -पापा आप लोग दिन में चार -छ: बार कैमरे देख लेते हो।छोटू के बारे में आपकी बैचैनी समझ में आती है। आपको हमसे ज्यादा चिंता तो आपके उन बच्चों की रहती है।दीदी भी यही कह रही थी। वह कह रही थी कि पापा -मम्मी हफ्ते -दस दिन के लिए आते हैं लेकिन उनका मन तो वहीं अटका रहता है। इसीलिए कह रहा हूं कि आप कहें तो छुट्टी वाले दिन आप लोगों को छोड़ आता हूं।
तब सविता ने उससे कहा भी था कि अरे तुम क्यूं परेशान होते हो। सरकारी नौकरी में कहां बार-बार छुट्टी मिल पाती है। तुम तो ट्रेन का रिजर्वेशन करवाकर बैठा देना।तब मैंने ही कहा था कि नहीं एक सप्ताह के बाद तो हिमांशु को भी जाना ही है,तभी उसके साथ चले चलेंगे,अभी उसे क्यों डिस्टर्ब करें। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि छोटू के बारे में हमारी आशंका सही साबित हो जाएगी। मुझसे ज्यादा आशंकित तो हिमांशु था और शायद इसीलिए वह बार-बार हमें वापस लौटने का कह रहा था। संभवतः उसे कुछ पूर्वाभास हो रहा था या फिर उसके मन में यह बात रही हो कि छोटू को कुछ हो गया तो सारा दोष उसी के सिर होगा क्योंकि वही उन्हें लेकर आया था।
इसी संशय पूर्ण स्थिति में जब कमलेश का फोन आया कि मामाजी,छोटू नहीं रहा। संभवतः रात को ट्रेन की टक्कर से उसके प्राण पखेरू उड़ गए।तब मैं यह सुनकर स्तब्ध रह गया। कुछ पल के लिए तो मैं अवाक सा मोबाइल थामे बैठा रहा,उधर से हेलो -हेलो की आवाज भी शायद मेरे कानों तक नहीं पहुंच पा रही थी।कुछ देर बाद जब मैंने अपने आप को संयत किया तब भी मेरे मन में एक ही ख्याल बार बार आता रहा कि ऐसा कैसे हो गया। आखिर छोटू लावारिस की तरह ऐसे कैसे जा सकता है! फिर भी मन मानने को तैयार नहीं था ।पास ही खड़ी सविता ने जब यह वार्तालाप सुना तो उसका तो रो-रोकर बुरा हाल हो गया।वह मुझपर ही बरस पड़ी और गुस्सा होकर प्रलाप करने लगी और बोली -” मैंने तो आपसे पहले ही कहा था कि हम लोग वापस चले चलते हैं। नौकरों के भरोसे छोटू को नहीं छोड़ सकते।” मैं कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि मेरी भी आंखों से अश्रुधारा बह चली थी।
मैंने अपने आप को थोड़ा संयमित करते हुए कमलेश से पूछा कि एक बार फिर से देख आओ कि वह छोटू ही है।ऐसा तो नहीं कि ट्रेन की टक्कर के कारण तुम उसे पहचान ही नहीं पाए हो और वह कोई और हो।तब उसने कहा था कि नहीं मामा जी,वह छोटू जैसा ही लग रहा है।उसका शव ज्यादा क्षत-विक्षत नहीं हुआ है। लगता है कि अचानक ट्रेन के आ जाने की वजह से वह तेजी से दूसरे ट्रैक की तरफ मुड़ा हो और इसी बीच उसे हल्की सी टक्कर पीछे से लगी हो और वह जब-तक दूसरे ट्रैक पर पहुंचा होगा, दूसरी तरफ से आ रही ट्रेन से उसका मुंह टकरा गया होगा, जिससे वह संभल नहीं पाया होगा।बस उसके मुंह पर ही चोंट के निशान दिखाई दे रहे हैं। मैं पहुंचा तब तक उसे वहां से हटाकर किनारे पर रख दिया गया था। मुझे लगता है कि वह छोटू ही है। रतन सिंह ने भी जाकर देखा था और वह भी यही कह रहा था कि वह छोटू ही है।
इतना सुनने के बाद मैं कमलेश से कुछ कहने-सुनने की स्थिति में ही नहीं था।अब कहता भी तो क्या कहता।शायद इस स्थिति के लिए मैं ही जवाबदार था। मैं मन ही मन खुद को कोस रहा था। मुझे लगा कि छोटू की मौत का मैं ही गुनहगार हूं। इसी बीच भावना का भी दिल्ली से फोन आ गया था। शायद उसे भी खबर लग गई थी।हम लोग तो छोटू के बारे में ऐसा सुनकर कुछ सोचने समझने की स्थिति में ही नहीं थे लेकिन भावना ने फोन पर हिमांशु से कहा कि छोटू को लावारिस जैसा मत छोड़ो। किसी से कहकर उसका अंतिम संस्कार तो करवा दो। हिमांशु ने तत्काल अपने मित्रों से फोन पर कहकर घर के बगीचे में ही टफी के पास छोटू को दफन करने का इंतजाम करवा दिया और वीडियो कॉल कर हिमांशु को बता भी दिया।
मैं वह परिदृश्य देखने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था।इधर मेरे मन में उथल-पुथल कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मुझे वह बात भी याद आ रही थी जब सविता खुद दो-तीन दिनों से लगातार कह रही थी कि चलो,हम लोग वापस चले चलते हैं। किशन पर हमें जरा भी यकीन नहीं है। पिछली बार भी उन लोगों ने ध्यान नहीं रखा था।और अभी भी स्थिति वैसी ही है। पिछली बार ठंड का सीजन था और अत्यधिक ठंड लगने से टफी बीमार हो गया था जबकि उसके ठंड से बचाव का पूरा इंतजाम करके गए थे लेकिन किशन ने ध्यान नहीं दिया और अभी बारिश का सीजन चल रहा है।ये लोग तो नौ बजे से दरवाजा बंद कर सो जाते हैं। बाद में यह भी नहीं देखते कि कौन आ रहा है,कौन जा रहा है।छोटू भी सीसीटीवी कैमरे में कई बार नहीं दिखाई दिया। मुझे तो शंका है कि वह रात रात भर गायब रहता रहा होगा। लेकिन मैंने सविता को यह कहकर तब चुप करा दिया था कि अब हम लोगों को अधिकांश समय तो यहीं रहना है। इसलिए उसे भी आदत में आ जाने दो।छोटू को आदत हो जाएगी अपने बिना रहने की।
लेकिन क्या यह संभव था।जब हमारा यहां रीवा आने का कार्यक्रम बन रहा था, उसके दो दिन पहले की ही तो बात थी जब हम दोनों ही घर के बाहर लगी कुर्सियों पर बैठे थे।वह भी सुस्त उदास बैठा था,मेरे मन में भी बेचैनी थी। शायद उसे भी बिछोह का अहसास हो गया था।तभी तो वह मेरी ओर देख रहा था। शायद कुछ कहना चाह रहा था और मैंने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेर कर सहला दिया था।तब भी वह मेरी ओर ही देखता रहा। वैसे भी उसके देखने का अंदाज ही कुछ ऐसा था कि उसके प्रति वात्सल्य भाव उमड़ता ही चला जाता था। ये बातें सोच -सोचकर मन में पश्चाताप का भाव भी उमड़ रहा था कि सविता की बात मानकर मैंने तत्काल वापस लौटने का मन क्यों नहीं बनाया!
छोटू रह -रहकर मेरी स्मृति में आकर झकझोर रहा था।मुझे याद आ रहा था जब पहली बार वह मेरे पीछे पीछे चला आया था। मैं उज्जैन से एक साहित्यिक कार्यक्रम से लौट रहा था। कॉलोनी की मुख्य सड़क पर ही मित्र वर्मा जी से कह दिया था कि यहीं ड्राप कर दें,भीतर उबड़-खाबड़ रास्ता है। वहां से जब मैं घर की ओर चला आ रहा था तभी मुझे आभास हुआ कि मेरे पीछे पीछे एक छोटा सा मरियल सा पिल्ला भी मेरा अनुसरण कर रहा है। मेरे रूकने पर वह भी खड़ा हो गया और पूंछ हिलाने लगा। मैंने उसे डांटते हुए वापस भगाया तो वह कुछ दूर वापस जाकर रुक गया था। इसके बाद मैं अपने घर के मुख्य द्वार से होकर घर में प्रवेश कर गया था। कुछ देर बाद एक पिल्ले के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दी तो मैं घर के बाहर निकला , दरवाजे के बाहर उसे ही खड़ा पाया जो टफी से डरकर चिल्ला रहा था। जबकि टफी उसे सुंघने और पहचानने में लगा हुआ था। उसे दूसरा कोई हाथ भी नहीं लगा पा रहा था,वह डरकर जोर से चिल्लाने लगता था।
मैंने टफी को दूर किया और उसे एक कटोरी में थोड़ा दूध दिया और रोटी दी जिसे वह इतनी जल्दी चट कर गया जैसे बरसों का भूखा हो। मुझे दया आ गई थी। सविता ने भी कहा कि इसे यहीं रहने दो,हमारा इतना बड़ा बगीचा है, कहीं भी रह लेगा।बाहर आवारा कुत्ते इसे मार देंगे। हां,इसे घर के अंदर नहीं आने देंगे, टफी घर में पड़ा रहता है,यही काफी है। मैं घर की सफाई करते करते परेशान हो जाती हूं।
तब मेरा मन भी उसकी मासूमियत देखकर पसीज गया था।और मैंने हामी भर दी थी। उसके बाद से तो वह पूरे समय मेरे पीछे पीछे ही घूमा करता था।जब मैं घर के अंदर प्रवेश करता था तो वह घर की ड्योढ़ी के बाहर बैठकर घर के अंदर झांकता रहता था और उधर टफी शाही ठसक के साथ पूरे घर में विचरता रहता।अंदर सोफे पर बैठकर उसे मुंह चिढ़ाता हुआ दिखाई देता था और बेचारा छोटू अपने आप को अछूत मानकर बाहर से ही घर में झांकता रहता था। मुझे इस बात को लेकर टीस भी होती थी लेकिन परिजनों के कारण कुछ कह नहीं पाता था। गर्मी के दिनों में एक दिन दोपहर के समय छोटू घर के बाहर बुरी तरह से हांफ रहा था और टफी घर के अंदर आराम से पंखे की हवा में खर्राटे भर रहा था। मैंने जब उसकी स्थिति देखी तो उसे घर के अंदर बुला लिया। पहले तो वह अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि सभी ने उसे डरा रखा था किन्तु मेरी ओर से आश्वस्ति पाकर वह सीधे मेरी कुर्सी के नीचे आकर पसर गया। शायद उसे लगा था कि कोई कुछ कहेगा भी तो मैं उसका पक्ष लेने के लिए हूं ही।
एक बार जब उसका गृह प्रवेश हो गया तो उसका डर भी शायद खत्म सा हो गया। कुछ समय के बाद तो टफी का पलंग भी उसने हथिया लिया था और जब भी वह उसपर बैठने की कोशिश करता तो उसका गुर्राना शुरू हो जाता।कई बार दोनों के झगड़े भी तो मुझे ही सुलझाने पड़े। हां,छोटू ने हर जगह अधिकार जमाना शुरू कर दिया था लेकिन उसकी मासूमियत सबका दिल जीत लेती थी।
एक बार की घटना मुझे याद आ रही थी जब भावना बड़े गुस्से में मेरे स्टडी रूम की तरफ आई और बोली – “ पापा,आपने छोटू को बहुत बिगाड़ दिया है। आप पर बस एकमात्र छोटू का ही अधिकार रह गया है।आज तो उसने हद कर दी जब आपके नाती को ही उसने स्टडी रूम में घुसने नहीं दिया।जब तक आप यहां बैठते हैं,वह भी आपकी कुर्सी के नीचे बैठा रहता है और दूसरे किसी भी आने-जाने वाले पर गुर्राना शुरू कर देता है।” तब मैं बस मुस्कुरा कर रह गया था। वैसे भी छोटू इतना वफादार था कि घर और बगीचे के चारों ओर जरा सी भी आहट होने पर दौड़ पड़ता था। कई बार तो बगीचे में सर्प और दीवड़ निकल आने पर उसी ने हमें सचेत किया था।
सुबह शाम जब मैं बगीचे में घुमता तो मेरे पास गेंद लेकर आ जाता, इधर उधर दौड़ लगाने लगता, बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह। जब मैं बगीचे में कुर्सी पर अखबार पढ़ रहा होता तो मेरे पैरों को चाटने लगता।जब वह आया था तब उसका नाम तो शेरू रखा था लेकिन नाती रोहन ने उसकी कद-काठी और हाव-भाव देखकर उसका नामकरण छोटू कर दिया था और हम सभी उसे छोटू नाम से ही पुकारने लगे थे।
यही सब विचार करते -करते ट्रेन से उतरकर रिक्शा में सवार होकर हम कब घर पहुंच गए,पता ही नहीं चला।मेरी विचार तंद्रा तो तब भंग हुई जब रिक्शे वाले ने कहा – “बाबूजी,गेट खुलवा लीजिए, ऑटो अंदर ही ले चलता हूं।”
इतने में सविता ने किशन को फोन कर दिया और उसने आकर गेट खोल दिया। मैंने दुखी मन से घर के दरवाजे पर लगा ताला खोला ही था कि बाहर के गेट से दौड़ता हुआ छोटू मेरे कदमों में आकर लौट लगाने लगा।मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, आंखें नम हो गई,किशन भी विस्मय से देख रहा था और सविता की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह चमत्कार कैसे हो गया और उधर किशन सफाई दे रहा था कि बाबूजी,हो न हो,अपना छोटू डर के कारण इतने दिनों तक कहीं इधर उधर छुपा रहा और आपको देखकर घर लौट आया।जो कुत्ता ट्रेन से कटा था,वह छोटू से मिलता जुलता मोहल्ले का कुत्ता रहा होगा!
आदरणीय महोदय
सादर नमस्कार
संलग्न कहानी प्रकाशनार्थ प्रेषित कर रहा हूँ । रचना मौलिक होकर स्वरचित एवं अप्रकाशित है।
कृपया प्रकाशित कर अनुगृहीत करेंगे।रचना स्वीकृति/अस्वीकृति से अवगत कराने का कष्ट कीजिएगा।
सादर