ख्वाहिशें

कविता

ख्वाहिशें

अजय कुमार झा

तमन्ना थी सितारों की

खजूर पर अटकाया

पसीने की बूंदों ने

मिट्टी को दलदल बनाया 

भरपूर जिया सपनों में

जो मेरे अपने थे

साथ हैं आज भी सपने 

लेकिन जुबां हैं अपनी

अल्फ़ाज़ किसी और के हैं 

गर्दनों को तलब करती

म्यानों में थीं तलवारें

शोर है शहर में कातिलों की

खोजती तलबगारों के सर

सौंप दी सादी अर्जी मैंने

अपने रूखसत की

बिना हस्ताक्षर की

सपनों के सागर ने उछाला

अपनी गहराई से मुझे

मुर्दा नहीं होते सपने

हां लोग मरते हैं

लहरें जुदा नहीं किनारों से

सपने जुड़े हैं जिंदगी से

मुख्तलिफ मुर्दों से।

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अजय कुमार झा

मुरादपुर,सहरसा, बिहार।

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