आत्महत्या -एक लंबित प्रकरण – प्रेम प्रकाश चौबे
आत्महत्या -एक लंबित प्रकरण
– प्रेम प्रकाश चौबे
मित्रो, प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनेक कार्य होते हैं। जिन्हें वह समय रहते सम्पन्न कर लेना चाहता है, किन्तु कुछ काम ऐसे होते हे जो देखने में छोटे होते हुए भी निबटने में नहीं आते। ऐसा ही मेरा एक काम है जिसे में पिछले कई वर्षों से कर लेना चाहता हूँ, किन्तु नहीं कर पा रहा है आप सोच रहे होंगें कि ऐसा कौन सा काम है जो सालें बीतने पर आदमी कर न सके । जी नहीं ये वैसा कोई काम नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं ।
ये है आत्महत्या ! जी हाँ आत्महत्या ! आप हँस रहे है। सोच रहे होगें कि इस में कौनसी बड़ी बात है । चुटकी बजाते ही यह काम हो जाता है । लेकिन सच मानिए जब भी मैने आत्म हत्याका विचार बनाया रेल कंपार्टमेंट में लिखा रेल विभाग का निर्देश कि “उचित और पर्याप्त कारण के बिना जंजीर खींचना अपराध है। 1000 रु. तक का जुर्माना या/और 2 वर्ष तक कैद”। मेरी आँखों में कोंध जाता है और कानों में गूंजने लगता है l मैं ठहरा कानून का जानकार आदमी । अच्छी खासी रफ्तार में चल रही जिंदगी की गाडी की जंजीर खींचने के लिए उचित और पर्याप्त कारण भी तो होना चाहिए न । आप कहेंगे कि अच्छी खासी रफ्तार से चल रही जिंदगी में आत्म हत्या की क्या आवश्यकता ? सो सुनिए, मैं ठहरा खतरों का खिलाड़ी । खतरों से खेलना मेरा शौक है । (कृपया इसे सच न माने क्यों कि सच्चाई हमेशा खोजने पर ही पता चलती है) वे मूर्ख हैं जो आत्महत्या को कायरतापूर्ण कदम बताते हैं। ऐसा कहने वाले एक बार आत्महत्या करके तो दिखाएं?
मेरी नजर में यह कोई साधारण काम नही है। बड़ा ही विशिष्ट और साहसिक कार्य हैं। हर आदमी के
बस की बात नहीं । किसी की हत्या करने से भी अधिक साहसिक । आप ही कहिए धारा के विरूद्ध तैरना कोई सहज कार्य हैं ? जब सारी दुनिया आत्म -रक्षा में रत हो और इस के लिए तरह तरह के उपाय
करती हो व इसके लिए परिवार, समाज और सरकार पर दवाब बनाने का प्रयास करती हो, ऐसे में आत्म
हत्या ! परिवार, समाज और सरकार पर उपकार नहीं तो और क्या है?
हां तो मैं बात कर रहा था उचित और पर्याप्त कारण की। लोग छोटी-2 बातों में आत्महत्या कर बैठते हैं, महाराष्ट्र में किसान गन्ना की फसल का उचित मूल्य न मिलने पर आत्म हत्या कर लेते हैं। यह भी कोई कारण है।
प्रेम में विफल होना, परीक्षा में फेल होना आदि मेरी नजर में यह तो कोई उचित कारण नहीं है। मैं वीरोचित मृत्यु का वरण करना चाहता हूँ, और इसके लिए शार्टकट या यूं कहें कि किसी निरापद तरीके का चुनाव करना चाहता हूँ, । असफलता मेरे लिए अपमान और परिवार के लिए परेशानी ही देगी । मैं आजतक किसी भी मिशन में असफल ही नहीं हुआ हूं। कक्षा 1 से लेकर संपूर्ण परीक्षाओं में सफलता मेरे कदम चूमती चली आई। प्रेम किया तो सुखद परिणित विवाह में हुई और जो कभी प्रेमिका हुआ करती थी 3-3 बच्चों की सफलता पूर्वक मां बनकर जीवन यात्रा में साथ दे रही है । अन्य कोई ऐसा कारण ही नहीं मिल रहा है जिस की बिना पर यह शुभ काम किया जा सके ।
खैर, कारण तो खोज ही लिया जाएगा जैसा कि अपनी सरकारें करती हैं, जो फिजूल खर्ची के नाम जो काम करना चाहती हैं कर गुजरती है। इसके लिए कारण ढूंढ़ ही लिए जाते हैं और न मिलें तो गढ़ लिए जाते है ।
खैर, कारण को छोड़ो दूसरी मुश्किल है “तरीका” । काफी सोच विचार व मित्रों, सहकर्मियों, रिश्तेदारों से चर्चा के उपरांत भी मैं किसी नतीजे पर नही पहुंच पाया हूं। वही पुराने घिसे पिटे पारंपरिक तरीके, “सैल्फास खा लो”, ऊंची ईमारत से कूद जाओ, गले में पत्थर बांध कर पानी में डूबो, फांसी लगाओ, रेल से कट जाओ आदि, मैं किसी अत्याधुनिक तरीके यह साहसिक कारनामा अंजाम देना चाहता हूँ।
‘सैल्फास खा लो, मित्र ने सुझाब दिया ।
“इसमें कोई रिस्क तो नही है? मैंने आश्वस्त होना चाहा ।
“सुना है, पेट में जलन पड़ती है, हलक सूखता है, घवराहट होती है……
“कोई निरापद मार्ग सुझा यार। मैं ने उसकी बात काटते हुए कहा। मैं ने मन ही मन उसके सुझाए इस तरीके को नकार दिया था ।
“तो फिर एक काम कर, फांसी ! इससे बढ़िया व शर्तिया तरीका दूसरा नही है, उसने इस विश्वास से बताया यह अनुभूत नुस्खा हो ।
“मगर इसके लिए परिस्थितियां अनुकूल होनी चाहिए” उसने बात पूरी की।
‘जैसे? मैनें पूछा ।
“जैसे रस्सी का मजबूत होना, वह आधार मजबूत होना, जिससे रस्सी बांधी जाएगी । मेरे एक रिश्तेदार ने जल्दबाजी में कम दाम में कमजोर रस्सी खरीद कर आत्महत्या जैसा महत्वपूर्ण कार्य करना चाहा । ऐन मौके पर रस्सी टूट गई l धम्म से जमीन पर आ पड़े। आवाज सुनकर पड़ौसी इकट्ठे हो गए । रस्सी का फंदा खोल कर बचा लिए गए। अब तक मुकदमा चल रहा है। ऐसे ही एक केस में कच्चा मकान था, छत ही टूट कर नीचे आ पड़ी। दिन का समय था, उन्हें भी घायल अवस्था में बचा लिया गया । अब तक इलाज चल रहा है”। मित्र ने दोनों घटनाओं द्वारा अपने तर्क को पुष्ट किया।
“नींद की गोलियां”? मैं ने अपनी जानकारी प्रश्नवाचक ढंग से प्रस्तुत की.” अधिक मात्रा में सेवन कर ली जाए तो सुना है कि सुषुप्ति की अवस्था में ही आदमी मृत्यु का आलिंगन कर सकता है।”
“हां SSS ! लेकिन पक्का नही है. मित्र ने मुझे बेवकूफ सिद्ध किया ।
“मेरा मतलब ये था कि मैं दोहरी रणनीति अपनाना चाहता हूँ, ताकि कोई रिस्क न रहे.”मैंने कहा !
“यार, एक काम कर कैरोसिन डाल कर आग लगा ले”, मित्र ने होशियारी दिखाई ।
“अबे बेवकूफ, कल कैरोसिन की लाईन में खड़े रहकर ही यह आत्महत्या का सुविचार मन में उतपन्न हुआ है । हर सप्ताह 1 लीटर कैरोसिन के लिए छः-छः घंटे लाईन में लगे रहना पड़ता है. ऑफिस लेट पहुंचकर बॉस की डांट खाना पड़ती है, तभी तो यह विचार दूध के उफान की तरह दिमाग में आता हैं, दिल कहता है कि मूर्ख! इतनी मुश्किल से प्राप्त कैरोसिन को तू आत्महत्या जैसे काम मैं फूँक देना चाहता है।
” तो फिर पेट्रोल’ ?
” कितने लीटर लगेगा?”
“यही कोई 5 से 10 लीटर के बीच काम हो जाएगा,” उसने फिर ऐसे बताया जैसे खुद दो चार बार आत्म हत्या कर चुका हो।
“दस लीटर यानी 500/- रू.। नहीं, मेरी मासिक बचत इतनी नहीं है। महीना पूरा होते होते हाथ खाली हो जाता है । बचत के नाम पर 100 महीने की R.D है। सो बेटी के नाम । उस रकम को मैं हाथ लगाना नहीं चाहता। वह पैसा मेरे बाद मेरी बेटी की शादी के काम में आएगा।”
“और सोचकर बताऊगा”, कहकर मित्र चल दिया।
“कनपटी पर अपने हाथ से गोली दाग लेने से बेहतर और क्या उपाय हो सकता है”, मेरे एक थानेदार मित्र ने सुझाव दिया, यह आत्महत्या का एक संभ्रात एवं सुसंस्कृत तरीका है और कारगर भी।”
“तो फिर यार तू इसमें मेरी मदद कर न, जो सिर्फ तू ही कर सकता है। एक दिन के लिए अपना सर्विस रिवाल्वर मुझे दे न।”
“मरवाएगा क्या ? मेरे सर्विस रिवाल्वर से आत्महत्या करेगा। मेरा क्या होगा ? ये भी सोचा तू ने ? मेरी पत्नि अभी जवान है बच्चे छोटे छोटे हैं। मैं तो बिना आत्महत्या किए ही मृत्यु को प्राप्त हो जांऊगा। तू एक काम कर जब आत्महत्या का पक्का इरादा कर ही लिया है तो फिर “लीगल वे” में मर l लाइसेंसी रिवाल्वर खरीद, फिर शान से मर। उसका यह सुझाव मुझे ऐसा भाया कि अगले ही दिन दलाल से मिलकर लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया। बड़ी शान और ईमानदारी से लाइसेंस लेने का कारण वाले कालम में “आत्महत्या हेतु” भर कर फार्म सौंप दिया ।
“कब तक बन जाएगा’? मैने पूछा ।
“कल ही, उसने कहा।
सचमुच! अगले ही दिन विभाग ने मुझे एक बंद लिफाफा थमा दिया ।
मन बल्लियों उछल रहा था कि अब मैं “लीगल वे” में आत्महत्या कर सकूँगा। कंपकंपाते हाथों से लिफाफा खोला । विभाग ने “आत्म हत्या का कारण” पूछा था। मुझे समझ में आ गया कि शुभ कार्य में अड़ंगा आना स्वाभाविक ही है। हम भी पीछे हटने वाले नही थे। जवाब लिखा ।
1. प्रत्येक व्यक्ति अपनी पूंजी बने अपने मनपंसद ढंग से खर्च करने का वैध अधिकार है और मेरा जीवन मेरी पूंजी नहीं तो और क्या है? मैं इसे आत्महत्या के रूप में खर्च कर देना चाहता हूँ ।
2. राजनीति व नौकरशाही में बढ़ते भ्रष्टाचार व अपराधी तत्वों को देखकर मैं जिन्दा रहना नहीं चाहता ।
3. घटते लिंगानुपात बढ़ती कन्या भ्रूण हत्याओं ने मेरा जीना दुश्वार कर दिया है ।
4.आरक्षण की आग में झुलसती प्रतिभाओं की आंच मुझे दिन रात जलाती है।
5. फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए निर्दोष लोगों की आत्मा मुझे ऐसा करने के लिए विवश करती है।
6. दहेज के लिए जलाई जाती नवेली दुल्हनों की चीखें मुझसे सुनी नहीं जातीं l
और इन सबसे ऊपर स्थिर, लड़खड़ाती व गिरती केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों की नकारा चुप्पी! ऐसे वातावरण में मर मर कर जीने से मैं आत्महत्या को श्रेष्ठ मानता हूँ।
एक दिन एक धार्मिक स्थल के सामने से गुजरते हुए सुना था कि अच्छे काम करने वालों को मौत के बाद जन्नत नसीब होती है। कैसी है वह जन्नत? जहां आदमी कभी बूढ़ा ही नहीं होता । खाने के लिए स्वादिष्ट व्यंजन व पीने के लिए उम्दा किस्म की शराबें व 70-70 हूरें उपलब्ध हैं । यानी कि 5 सितारा होटल का आनंद l सच मानिए, मन किया कि कहॉ पचड़े में पड़े हो, प्यारे । जो काम कुछ वर्षों बाद होने वाला है उसे जल्दी ही क्यों न हासिल किया जाए। क्योंकि उन धर्माचार्य के अनुसार “अच्छे काम करने वालो को” यानी अपना नाम पक्का । क्यों कि मैंने जीवन में कोई बुरा काम किया ही नहीं (अपनी बुद्धि के अनुसार) सो अपने को जन्नत का मिलना तय। इसी लिए इतनी उठा पटक कर रहा था। मगर कहा गया है, कि वक्त से पहले कभी भी किसी को कुछ नहीं मिलता। लाइसेंस बनाने वाले विभाग को मैं अपना उत्तर भेज रहा हूँ । देखो क्या होता है ?
– प्रेम प्रकाश चौबे
पता – शांति कुंज, वार्ड नंबर -05
कुरवाई जिला – विदिशा (म. प्र.) 464224
मो.- 971333145, 8770911108
ई -मेल – choube.prem123@gmail.com