एडजस्टमेंट……
एडजस्टमेंट......
- पारुल अग्रवाल मित्तल
रश्मि चुपचाप बिस्तर ठीक कर रही थी ….दिवाकर समझ गया था वो कुछ कहना चाहती हैं।
” रश्मि क्या हुआ कुछ परेशान हो….बताओ मुझे…दिवाकर ने पूछा।
” नही कुछ नही….रश्मि ने भी मुंह फेरकर जवाब दिया।
” बताओ ना यार….प्लीज …क्यों मुंह लटका है मेरी प्यारी पत्नी का….दिवाकर ने रश्मि को हाथ पकड़कर बैठाते हुए कहा।
” दिवाकर मां ने मेरे ऊपर कितनी बाउंडेशन लगाई थी …सूट नही पहनो,छत पर मत जाओ,रिश्तेदारों से बात मत करो,बाल खुले नही रखो,सबके पैर छुओ….और यहां तक कि मेरी नौकरी भी छुड़वा दी….लेकिन श्रुति को तो वो कुछ नही कहती…सारी रोक टोक मेरे लिए ही थी क्या….क्या मैं इस घर की बहु नही या मां को पसंद नही….श्रुति को तो नौकरी की इजाजत भी मिल गई है…अब मैं सारा दिन घर में काम करूंगी …और वो नौकरी करके बड़ी बन जाएगी..रश्मि ने अपनें मन की भड़ास निकालते हुए कहा।
” ऐसा नहीं है रश्मि….अपने मन में इस तरह की बातो को मत पनपने दो….संयुक्त परिवार में थोड़ा ऊपर नीचे होता रहता हैं। एडजस्टमेंट तो करना ही पड़ता है रश्मि….और जानती हो श्रुति के साथ अब तुम भी नौकरी कर सकती हो….मां ने तुम्हारे लिए भी हां कर दी।रश्मि जो सुन लेता है सुनाया भी उसे जाता है ,तुमने शुरू दिन से मां का कहना माना तो उन्हें आदत हो गई….अब वो एडजस्ट कर रही है थोड़ा सा दिल बड़ा करो और उनकी हेल्प करो….
रश्मि को एडजस्टमेंट का मतलब समझ आ गया था….अब उसे आने वाला भविष्य सुखद दिखाई दे रहा था।उसके मन से सारा गुस्सा खत्म हो चुका था…रश्मि अब दिवाकर की बांहों में थी।
– पारुल अग्रवाल मित्तल
पता – निवास – अलीगढ़,
ई -मेल – agarwalmittalparul@gmail.com