अनामिका सिंह की ग़ज़लें
अनामिका सिंह की ग़ज़लें
अनामिका सिंह
(1)
बीते पलों के फिर वही मौसम नहीं हुए।
तुम भी नहीं हुए तो कभी हम नहीं हुए।
कितनी कलाइयाँ कटीं कितने टँगे मिले,
बेरोज़गार फिर भी यहाँ कम नहीं हुए।
गांधी, सुभाष और भगत को पढ़ा मगर,
उनकी तरह तो आज तलक हम नहीं हुए।
औरत पे ही तमाम लगीं बंदिशें वहाँ ,
आदम के भेष में जहाँ आदम नहीं हुए।
कितने ही गीत और ग़ज़ल कह चुके सभी,
आलोचकों की आँख में ऑसम नहीं हुए।
चूल्हों में झोंक दी गईं ज़िंदा ही औरतें,
शौहर हुए जहाँ, कभी हमदम नहीं हुए।
कितनी उदास हो के उठी होंगी सब ‘अना’,
लाशें वो जिन पे ठीक से मातम नहीं हुए।

(2)
काट कर पहले उनके पर रख दो
फिर ये फरमान कि “हुनर रख दो”
काम होगा ज़रूर ही होगा
दाम कुछ हाथ में अगर रख दो
बात हम भी महीन कर लेंगे
ढूँढ पूरा हिसाब गर रख दो
बात *मुद्दों* पे कोई कर न सके
हॉट टी०वी० पे *इक* ख़बर रख दो
हाँ हाँ, इससे *ही है* ज़माना बुरा
क्यों न घर पे ये बद-नज़र रख दो
गुफ़्तगू करनी है अगर हमसे
होगी, पहले अना उधर रख दो।
अनामिका सिंह
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