अनहद

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक: ‘अनहद’ उपन्यास

लेखक: डॉ. उपमा शर्मा

पुस्तक: ‘अनहद’ उपन्यास
लेखक: डॉ. उपमा शर्मा
प्रकाशक: शुभदा प्रकाशन, ग़ाजियाबाद
भाषा: हिन्दी
कीमत: 290/- पृष्ठ: 149

प्रेम की लय पर दो दिलों पर दो दिलों की दास्तान: अनहद

समीक्षक: डॉ शबनम सुल्ताना

हद चले सो मानवा, बेहद चले जो साध।
हद बेहद दोऊ तजे, वा को मता अघाध।
जो हद में चलता है वो मानव हो और जो हदों को तोड़कर निकल जाता है वह साधु है। लेकिन जो हद और बेहद दोनों से पार निकल जाता है उसकी मति की गहराई नापना संभव ही नहीं है। कबीर दास का यह दोहा इस उपन्यास को पढ़ अनायास ही याद आ जाता है ।यह उपन्यास हद और बेहद के मिलन की प्रेमकथा है। एक सीमाओं में बँधा है, दूसरा सीमाओं से परे। फिर भी दोनों मिलते हैं जैसे बंधन और मुक्ति,प्रकाश और अंधकार। विलोम हमेशा जोड़ों में क्यों होते हैं? शायद इसीलिए कि वे एक दूसरे के विपरीत ही नहीं पूरक भी होते हैं। यह उपन्यास दुख- सुख, मिलन-विरह, प्रेम-उदासीनता जीवन के सारे रस समेटे है और अंत में आत्मा से आत्मा का मिलन है। इसमें शाश्र्वत और अलौकिक प्रेम के बारे में बताया गया है।
प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की ओर धीरे- धीरे अग्रसर करता है। यह एक मजबूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है जो सब भूल कर उसके साथ जुड़ जाता है।
प्रेम का दूसरा नाम ही परमात्मा हैं प्रेम शाश्वत निस्वार्थ सच्चे अर्थों में बिना किसी लालच के होता है हम जिससे प्रेम करते हैं उससे बावस्ता हर चीज से मोहब्बत करते हैं । प्रेम की वह इकलौता अध्यात्म है जो जिंदगी को चैन और सुकून दे सकता है। प्रेम बंधन नहीं देता प्रेम मुक्त करता है। जैसे देवयानी का प्रेम प्यार में त्याग कर्त्तव्य कभी बाधा नहीं बनते बल्कि सच्चा प्यार हर परेशानी पर भी अडिग टिका रहता है।
दूर रहकर भी पास होता है एक के आँसू दूसरे की आँखों में होते हैं हर पल दिल सिर्फ उसी को याद करता है।
उसी से बात करता है प्यार में सबसे ज्यादा ईश्वर ही करीब होता है । विरह होकर भी विरह नहीं होता है।क्योंकि ये प्रेम अलौकिक और शाश्र्वत होता है। प्रेम हमेशा होता है रहता है तभी तो मानव में संवेदनाएं रहती है।
कथ्य के केंद्र में तीन पात्र हैं- देव, देवयानी और शर्मिष्ठा।
उपन्यास में डा उपमा शर्मा ने बड़े ही अच्छे से दो प्रेमियों से पति-पत्नी बने देव देवयानी के प्रेम फिर उनकी प्रणय जो विरह होकर भी विरह नहीं था पर कलम चलाई है ।
वे दोनों ही शून्य में जाकर अलौकिक रुप से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।
देव देवयानी प्रेमी- प्रेमिका से पति-पत्नी बनते हैं उनमें असीम प्रेम होता है फिर क्या कारण रहा जो देव के मन में शर्मिष्ठा अपनी जगह बनाने लगती है। देव अपना पद-प्रतिष्ठा, देवयानी सब भूलकर शर्मिष्ठा को समय देने लगता है। यह एक अनाथ बच्ची के प्रति खुद अनाथ रहे देव के मन की सिम्पैथी थी या हृदय से उपजा प्रेम।रीते मन के एक कोने में शर्मिष्ठा का आ जाना देवयानी के प्रेम की कोताही थी या पुरुष मन की कमजोरी। देवयानी पूरे मन से देव को समर्पित थी। एक अनाथ बच्ची के प्रति उपजी संवेदनाओं ने अनायास ही किसी कमज़ोर लम्हे में देव के मन ने शर्मिष्ठा को जगह दे दी।
जब तक देव को अपनी गलती का एहसास होता है तब तक बहुत देर हो जाती है वो देवयानी से नजर नहीं मिला पाता और शर्मिष्ठा को समझा नहीं पाता ।
शर्मिष्ठा जो की उसकी बहू से भी उम्र में छोटी थी और अनाथ थी जिससे हमदर्दी करते करते शर्मिष्ठा का देव के लिए आकर्षण बढ़ जाता है तब देव सब कुछ त्याग कर आश्रम चले जाता है और गुरु जी का सहारा लेता है।
लेकिन बेचैन मन में देवयानी ही थी। तब उसे पता चलता है उसने सिर्फ और सिर्फ देवयानी से प्रेम किया। शर्मिष्ठा सिर्फ कमजोर पलों का आकर्षण थी।
आश्रम में गुरु जी देव को साधना सिखाते हैं और बताते है कि जब प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर होता है तो अनहद नाद से शून्य में बदल जाता है तब हम जिसका आहृवान करते हैं उस तक अलौकिक रूप से पहुँच जाते हैं। देव का प्रेम अलौकिक था लेकिन कर्तव्य पथ से बहुत दूर। वो विरह में जलता है लेकिन देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों को ही छोड़कर चला आता है। या कहीं न कहीं उसे अपने प्रेम पर अगाध विश्वास था। वो जानता था प्रेम में डूबी देवयानी अपने पति की ग़लती को भी गले लगा लेगी। वो देव से नाराज होगी, लेकिन उसकी जिम्मेदारी ज़रूर पूरी करेगी। देव का यकीन सच्चा था।
प्रेम हमें कर्त्तव्य बोध कराता है जैसे देवयानी शर्मिष्ठा को अपने गले से लगा लेती है ।प्रणय विरह झेल रही देवयानी अपने कर्त्तव्य से पल भर भी विमुख नहीं होती न ही उसे शर्मिष्ठा से कोई शिकायत होती है बल्कि उसे शर्मिष्ठा से भी प्यार हो जाता है ।उसे शर्मिष्ठा में भी देव ही दिखता है। वो शर्मिष्ठा की पढ़ाई करा उसका विवाह करा अपने पति अपने प्रेमी को कर्त्तव्य मुक्त कर अपराध मुक्त कराती है।
देव और देवयानी ईश्वरीय शक्ति से जीवन मुक्त हो हमेशा के लिए एक दूसरे के हो जाते हैं।
प्रेम विश्वास और संवेदनाओं के उत्तम शिखर पर पहुँच जाता है कठिनाइयाँ न ही उसे बिखेरती है न ही टूटने देती है।
ऐसा नहीं है की देवयानी आहत नहीं होती लेकिन जब प्रेम सच्चा हो तो नाराजगी क्षणिक होती है।
लेकिन देव से देवयानी की क्षणिक नाराजगी भी सहन नहीं होती लेकिन देवयानी के लिए अनायास आई शर्मिष्ठा भी प्रेम ही थी वो उसे भी देव की सम्पत्ति समझ कर प्रेम करती है।
दुलारती है।
जहाँ पुरुष कमजोर पड़ता है वहाँ स्त्री का प्रेम शाश्वत अडिग खड़ा रहता है वो कभी अपने कर्त्तव्य अपने अपनों से मुंह नहीं मोड़ती वो कभी कही नहीं भागती इसीलिए तो उसे सृष्टा कहा जाता है।
प्रेम संगीत है कला है और इसका अच्छे से उदाहरण दिया है डॉ उपमा शर्मा ने बल्कि जो शाश्वत और अलौकिक प्रेम के बारे में उन्होंने बताया है वो कमाल है। अनहद नाद से शून्य से होकर आह्वान कर अलौकिक मिलन ये मनुष्य का ईश्वर तक पहुँचने का बहुत ही अनोखा साधन है जिसमें अपनी शक्ति अपनी ऊर्जा को एक ही वस्तु पर केंद्रित कर हम बिना बिखरे वो पा सकते हैं जो हमें चाहिए।
योग की सीढ़ियाँ आयाम ,नियम,धारणा, प्रत्याहार इत्यादि।
भटकता मन जब स्थर हो जाता है तो शून्य से होकर अनहद और अहद हो जाता है। फिर आहृवान होता है वो कोई भी हो परमात्मा हमें उससे अलौकिक रुप से मिला देता है ।
अलौकिक प्रेम राधा कृष्ण,शिव पार्वती जैसा होता है।
इतने गहरे प्रेम के बाबजूद भी जब शर्मिष्ठा बीच में आई तो देव और देवयानी उसे समझा नहीं पाये। क्योंकि समझदार और एक दूसरे के प्रेम में होते हुए भी इंसान बेबस हो जाता है वो उसे नहीं समझा पाता उसे समझ ही नहीं आता की क्या समझाएं। किसी अनाथ का दिल भी तो दुखाना गलत है न क्योंकि मानवीय संवेदनाएं ही ऐसी है।
पुस्तक का शीर्षक सटीक है। शीर्षक किसी भी कथानक का सार होता है।
अनहद – योग का ऐसा साधन जिसमें कानों को हाथों से बंद कर उस ध्वनि को सुना जा सकता है।वो है हमारे हृदय की आवाज इससे हमारी ऊर्जा स्तर में अचानक बढ़ोतरी होती है ये हमें परमात्मा से मिलाने का साधन है। इसके प्रकट होने पर आत्मा परमात्मा से मिल जाती है ।
जब बाहर की दुनिया का शोर पूरी तरह बंद होता है तब हमें ये नाद सुनाई देता है।
ये हमें बाहरी दुनिया से काटता नहीं है बल्कि जब हम नाद करते करते शून्य में डूब जाते हैं। और फिर जिसका आहृवान करते हैं ,तब हम उसे अलौकिक रुप से पा लेते हैं उससे बात कर लेते हैं देख लेते हैं। देव को हर क्षण देवयानी ही नज़र आती है। देवयानी उसका अनहद नाद। देव का प्रेम विरह के बाद तपस्या में तप कर पूर्ण हो जाता है।
शिल्प की दृष्टि से उपन्यास सुगठित और रोचक है। पूरा घटनाक्रम आँखों के आगे दृश्य या गुजर जाता है। लेखिका का संवेदनाओं का संसार जितना समृद्ध है, शब्द-भंडार भी उतना ही विस्तृत है। लेखिका के बिंब दार्शनिकता से भरे हुए हैं। उपन्यास में ऐसे कई सूत्र वाक्य हैं जो पाठक को चिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। दर्शन और आध्यात्म के धीमे मगर गंभीर स्वर हैं। उपन्यास में कुछ चीजें खटकती भी हैं जैसे प्रेयसी सी पत्नी के होते हुए शर्मिष्ठा के आकर्षण में काम छोड़ उसे लेकर यहाँ-वहाँ घूमना। लेकिन प्रेम कहाँ कुछ ऊँच-नीच सोचता है। वो तो मन- आकाश में स्वच्छंद विचरता है। और देवयानी वो क्यों पति की प्रेयसी को गले लगाती है। तो प्रेम तो प्रेम है। देवयानी देव को कहती भी है “ तुम जिसे प्रेम करोगे मैं भी उसे प्रेम करूँगी। तुम से कहीं ज्यादा।” प्रेमी के प्रेम में प्रेम देखना देवयानी को प्रेम के सर्वोच्च पर बैठा देता है। प्रेम और दर्शन का यह अनूठा तालमेल पाठकों के दिल में अवश्य ही अपनी जगह बनायेगा।

पुस्तक : ‘अनहद’ उपन्यास
लेखिका : डॉक्टर उपमा शर्मा
पेज संख्या: 149
मूल्य: 290

प्रकाशक: शुभदा प्रकाशन , बी-140/एस-2, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद
संपर्क: 8851578398

समीक्षक: डॉ शबनम सुल्ताना

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