अंसार कम्बरी की गज़लें

अंसार कम्बरी की गज़लें

अंसार कम्बरी

ग़ज़ल

ग़ज़ल में ‘क़म्बरी’ से जब कभी ‘अंसार’ मिलते हैं,
ज़माने भर को फिर अश्आर ही अश्आर मिलते हैं।

नदी में हर तरफ़ मझधार ही मझधार मिलते हैं,
न कोई नांव मिलती है न अब पतवार मिलते हैं।

चले हम इश्क़ की राहों पे तो हर बार मिलते हैं,
कहीं पत्थर नुकीले तो कहीं यो पे ख़ार मिलते हैं।

ज़रा तुम ग़ौर से देखो तो ये तस्वीर इंसॉं की,
फ़क़त रंगीन इसमें फ़्रेम के आकार मिलते हैं।

बड़ी उम्मीद थी जिनसे वो मेरे काम आयेंगे,
पड़ा जब वक़्त तो वो लोग ही बेज़ार मिलते हैं।

गुलाबो की ये बगिया है सॅंभल कर तोड़ना इनको,
जहॉं पर फूल खिलते हैं वहीं पर ख़ार मिलते हैं।

ज़रा सी बात पर तुम तोड़ मत देना इसे ज़ालिम,
बड़ी मुश्किल से दिल के तार से फिर तार मिलते हैं।

मोहब्बत

बरसती है जब बनके रहमत मोहब्बत
बना देती दुनिया को जन्नत मोहब्बत

मोहब्बत न होती तो कुछ भी न होता
ख़ुदा की है ऐसी इनायत मोहब्बत

नज़र से मिलेगी नज़र जब भी उनसे
निगाहें करेगी शरारत मोहब्बत

ख़ुदा भी मिलेगा, सनम भी मिलेगा
जो करिये तो है वो इबादत मोहब्बत

अजूबा नहीं है कोई ताज जैसा
बनाती है ऐसी इमारत मोहब्बत

वफ़ाओं का सौदा ही होता है इसमें
नहीं कोई करती तिजारत मोहब्बत

यही एक पैग़ाम है ‘ क़म्बरी ‘ का
बिखेरो जहां में मोहब्बत मोहब्बत

अंसार कम्बरी

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा 1996 में सौहार्द सम्मान से पुरस्कृत और देश की अनेक साहित्यिक संस्थानों से सम्मानित एवम पुरस्कृत
अंतस का संगीत (दोहा गीत संग्रह), कह देना (गजल संग्रह)
मो. 9450938629

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