गिर जाएगी नफ़रत की ये दीवार किसी दिन
बदलेगी मुह़ब्बत में ये तकरार किसी दिन
लगती है मुझे रेत की दीवार के जैसी
ढह जाएगी अब आपकी सरकार किसी दिन
साँसों का भी अब बोझ उठाने की नहीं ताब
गिर जाए न ये जिस्म की दीवार किसी दिन
मुफलिस का कलन्डर जुदा होता है यहाँ पर
मिलता नहीं मज़दूर को इतवार किसी दिन
नादारी-ओ- ज़रदारी पे क़बज़ा तो नहीं है
ज़रदार भी हो सकता है नादार किसी दिन
आसार मुझे अच्छे नहीं दिखते है तेरे
लगता है उजड़ने को है दरबार किसी दिन
नफरत के सहारे से बनाया जो अभी तक
अब गिरने ही वाला है वो मेआ़र किसी दिन
– अशफाक़ ख़ान”जबल”
पेशा — रिटायर्ड शिक्षक
साहित्यिक गतिविधि – ग़ज़ल, कविता, कहानी , निबंध
गज़ल के मजमुए – गुलदस्ता, कारवान ए गज़ल ,अदबी कहकशाँ ,रख्शाँ ए गज़ल
अन्य गतिविधि -जिला स्तर के क्रिकेट कोच ,