जेईई मेन के लिए ड्रॉप ईयर लेना जोखिम भरा हो सकता है? लाभ और चुनौतियाँ

जेईई मेन के लिए ड्रॉप ईयर लेना जोखिम भरा हो सकता है? लाभ और चुनौतियाँ विजय गर्ग जेईई के 15% अभ्यर्थी ड्रॉप ईयर लेते हैं आईआईटी में प्रवेश करने वाले 40-45% छात्र ड्रॉपर होते हैं जोखिमों में तनाव और खोया हुआ शैक्षणिक वर्ष शामिल है हर साल, बड़ी संख्या में छात्र संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई)…

संविधान, विधान या शासनादेशो का परिवर्तन कितना ज़रूरी ? और किस तरह??

संविधान, विधान या शासनादेशो का परिवर्तन कितना ज़रूरी ? और किस तरह?? पीयूष अवस्थी इधर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा आदि में अनेकों वाद -विवादों की स्थितियों का प्रदर्शन देखने को मिला! बात महत्वपूर्ण ये भी नहीं कि संविधान क्या है और उसका प्रारूप और परिवर्तन क्या होना चाहिए ? बल्कि विरोधाभाष की लपटों में ही घिरता…

प्रियंका सौरभ का गीत

समय सिंधु – प्रियंका ‘‘सौरभ’’ समय सिंधु में क्या पता, डूबे, उतरे पार।छोटी.सी ये ज़िंदगी, तिनके.सी लाचार॥ ★★★ सुबह हँसी, दुपहर तपी, लगती साँझ उदास।आते.आते रात तक, टूट चली हर श्वास॥पिंजड़े के पंछी उड़े, करते हम बस शोक।जाने वाला जायेगा, कौन सके है रोक॥होनी तो होकर रहे, बैठ न हिम्मत हार।समय सिंधु में क्या पता,…

शेष होकर भी अशेष

शेष होकर भी अशेष – डा.वीणा विज ‘उदित’ अतीत के झरोखों में झांकती, मन ही मन स्वयं से बतियाती नींद की आगोश में जा ही रही थी कि फोन की घंटी टन टना उठी… “हेलो” “हेलो –हेलो मां! आज फिर से मैं सपने में अपने पुराने वाले घर में रात भर खेलता रहा। वही पुरानी…

बड़ी बी….!

बड़ी बी….! – सपना चन्द्रा अरे ओ कमाल! मुँआ कहाँ मर गया। देखता भी नहीं कि मेरी पनडिब्बी की सारी कसैली खत्म हो गयी। “बड़बड़ाते हुए दरवाजे तक उसे देखने आई। कहीं किसी के साथ गप्पें तो नहीं मार रहा। गुस्से से कमाल को आवाज लगाती रहीं पर वह घर में होता तो सुनता। किसी…

पागल

पागल – उपमा शर्मा शाम का ऑंचल झिलमिलाने लगा था। अपनी प्रचंड धूप समेट कर आदित्य नारायण अब बादलों की गोद में चल दिये थे। सुरमई आकाश दिन के बिखरे उजाले को अपने आँचल में,समेट मंद- मंद मुस्कुरा रहा था। मेरी आँखें सांझ की उस खूबसूरती को अपनी पलकों में समेट ही रही थी कि…

आम वाक्य नहीं ” अब बस”

आम वाक्य नहीं ” अब बस” – मेघा राठी आम जिंदगी में प्रयुक्त होने वाला एक आम सा वाक्य,”अब बस”। हमारे आस–पास घूमता यह वाक्य न जाने कितनी ही बार हमसे टकराता है। “अब बस” …छोटा सा यह वाक्य अर्थ की गहराई में इतना छोटा नहीं होता है। इस एक वाक्य के अंदर कई भाव…

डॉ.मंजु लता श्रीवास्तव का गीत

‘वर्तमान जल-संकट ‘ डॉ मंजु लता श्रीवास्तव ‌सावन बरसे             भादों बरसे बरसे बीच कुंँवार में          मेघ बावरे            ‌ ऐसे बरसे ज्यों पत्ते पतझार में           तन-मन-धन        सब डूब रहे हैं राहत के पल ढूंँढ रहे हैं        त्राहि-त्राहि       हर ओर मचा है विधि ने कैसा खेल रचा है  …

रिश्तों में गर्माहट

रिश्तों में गर्माहट – डॉ. शिखा अग्रवाल मां, आपके और पापा के लिए स्वेटर भेजे थे, मिल गए होंगे। कैसे लगे? बहुत गर्म है ना” दूर देश बैठे बेटे ने फोन पर पूछा। “हां बेटा, स्वेटर तो मिल गए पर तुम लोग कब आओगे। बहुत साल हो गए तुम लोगों से मिले हुए।” बेटे से…

किन्नर का नजरिया

किन्नर का नजरिया – डा.वीणा विज ‘उदित’ हमारी गली के आखरी घर में करतार सिंह के घर पोता होने पर हिंजड़े नाचने आए थे। इसके लिए सारी गली को आमंत्रित किया गया था। जितने लोग आएंगे ,उतने ही नवजात शिशु पर नोटों के वारने होंगे और वो पैसे हिंंजड़ों को मिलेंगे। घर वाले तो रिवाज…