लुटती जाए द्रौपदी, जगह-जगह पर आज। – प्रियंका सौरभ

लुटती जाए द्रौपदी, जगह-जगह पर आज। -प्रियंका सौरभ अगर यह बलात्कार संस्कृति नहीं है, जिसे समाज के समझदार पुरुषों और महिलाओं, संस्थानों और सरकारी अंगों द्वारा समर्थित और बरकरार रखा जाता है, तो यह क्या है? आप सभी कानून, सभी तेज़ अदालतें, यहाँ तक कि मौत की सज़ा भी ला सकते हैं, लेकिन कुछ भी…

प्रभावी विज्ञापन कैसे लिखें – विजय गर्ग

प्रभावी विज्ञापन कैसे लिखें – विजय गर्ग विज्ञापन अधिकांश कंपनियों के लिए एक प्रमुख व्यावसायिक रणनीति है। प्रभावी विज्ञापन के लिए अक्सर छवियों और वीडियो के साथ विचारशील और प्रेरक लेखन की आवश्यकता होती है। विज्ञापन और मार्केटिंग के लिए विशेष रूप से लिखने का तरीका जानने से आपके करियर विकास और आपके संगठन को…

दीवाली पर्व – विजय अरुण

दीवाली पर्व विजय ‘अरुण’ आज अमावस है पर  कितनी फैली है उजियाली।हर दीपक ने लौ अपनी अम्बर को आज उछाली।नन्हे नन्हे  दीप  हैं पर  कितनी  है  बात  निराली।इन  दीपों ने आज बदल दी रात  भयानक काली।फिर से आज धरा पर है एक नूर की बेला आली।जगमग जगमग दीप लिए फिर आई है दीवाली।। दीपक हैं …

शशिकला की कविताएँ

शशिकला की कविताएँ शशिकला त्रिपाठी 1. खुशी मिलती है पल दो पल वह थी सुखी औरों की निगाह मेंखूबसूरत आशियाना,अधिकारी पतिसुंदर सुयोग्य दो प्यारे बच्चेउससे ईर्ष्यालु थी स्त्रियाँजो तथाकथित दोस्त थीं या रिश्तेदार।मगर, अक्सर वह उदास होतीसोचती, ख़ुशी किस चिड़िया का नाम हैधन-दौलत सब बेमानी लगतेऊब होती शान-शौकत पाखंड सेकिसी पल लगता जीवन पहाड़ सा…

शब्द – संजय मृदुल

शब्द संजय मृदुल शब्दमीठे भी होते हैं शहद सेनमकीन भी आंसुओं सेकड़वे भी धतूरे की तरहशब्द बस शब्द होते  हैस्वाद बदलता रहता हैवक्त के साथ साथ।  शब्दनम होते हैं अश्को सेसूखे भी बंजर जमीन सेगीले भी होते दरिया जैसेशब्द शब्द होते हैंरूप बदलता रहता हैमौसम के साथ साथ। शब्दसाबूत होते हैं चट्टान की तरहरेत की…

तुम अब मत आना – अम्बिका कुमारी कुशवाहा

तुम अब मत आना – अम्बिका कुमारी कुशवाहा जब भी जागूँ मैं निंद्रा सेतुम ख्यालों में मेरे मत आना उदित किरणों की आंनदित ऊष्मा सेतुम काया कण में मेरे मत आना मत आना मेरी किस्सों बातों मेंमेरे ख्वाबों में भी तुम मत आना दर्पण में स्वयं की बिम्बों सेतुम साया बन मेरी मत आना मत…

कम्मो – यशोधरा भटनागर

कम्मो – यशोधरा भटनागर काली घटाओं का घटाटोप, उमड़ते- घुमड़ते बादल ,माटी की सौंधी गंध और बूंदों का संगीत।अहा!वर्षा ऋतु का मंगलकारी आगमन !  शीघ्र ही पकौड़ों की सुगंध वातावरण में रच-बस गई और नथुनों के रास्ते उतर जिह्वा को रससिक्त कर गई। यही तो सरस आनंद है।    बरसते पानी में भीगते-थिरकते,तन-मन भीग गया।तभी…

पेंशन – रश्मि वैभव गर्ग

पेंशन – रश्मि वैभव गर्ग सुरेश जी के दोनों बेटों में झगड़ा चल रहा था.. दोनों ने अंततः निश्चय किया कि एक एक महीने दोनों अपने माँ बाप को रखेंगे।दोनों ही अपने माँ बाप को साथ नहीं रखना चाहते थे।सुरेश जी को रिटायर हुए छह महीने हो चुके थे लेकिन अभी तक उनकी कंपनी में…

पड़ोस वाली आंटी – अलका अग्रवाल

पड़ोस वाली आंटी – अलका अग्रवाल मैं कॉलोनी में ही घर के पास वाली किराने की दुकान पर कुछ सामान लेने गई थी। पड़ोस वाली आंटी भी दुकान पर सामान लेने आई थीं। हालांकि वह बहुत दूर नहीं रहती हैं, लेकिन मिलना जुलना कम ही हो पाता है। 6 माह  में ही आंटी के बालों…

सेहत का साथ – विजय गर्ग

सेहत का साथ – विजय गर्ग एक बार मिली जिंदगी में जाहिर है शरीर भी एक बार ही मिलता है। शरीर ही इंसान के अंत तक साथ उसका देता है । जो दुर्लभ और महासदुपयोगी वस्तु एक बार ही मिली हो, उसे बेइंतहा प्यार करना चाहिए। बच्चों के शरीर की देखभाल का जिम्मा अभिभावकों का…