घटता शारीरिक श्रम, बढ़ती व्याधियाँ

घटता शारीरिक श्रम, बढ़ती व्याधियाँ – विजय गर्ग किसी देश में सेहत और बीमारी का संबंध सिर्फ इलाज की सहूलियतों और आबादी की तुलना में उपलब्ध अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या से हो, जरूरी नहीं। लोगों को कई रोग इसलिए भी घेरते हैं, क्योंकि उनकी दिनचर्या सेहत से जुड़े कायदों के मुताबिक नहीं होती और…

एडजस्टमेंट……

एडजस्टमेंट…… – पारुल अग्रवाल मित्तल रश्मि चुपचाप बिस्तर ठीक कर रही थी ….दिवाकर समझ गया था वो कुछ कहना चाहती हैं। ” रश्मि क्या हुआ कुछ परेशान हो….बताओ मुझे…दिवाकर ने पूछा। ” नही कुछ नही….रश्मि ने भी मुंह फेरकर जवाब दिया। ” बताओ ना यार….प्लीज …क्यों मुंह लटका है मेरी प्यारी पत्नी का….दिवाकर ने रश्मि…

सहृदयता

सहृदयता – डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा “कौन है ये महिला ? क्या शिकायत है इसकी ?” बाहर शोरगुल की आवाज सुनकर निरीक्षण पर आए एस.पी. साहब ने थानेदार से पूछा ।  “सर, ये महिला लगभग रोज ही थाने में आकर बैठ जाती है।” थानेदार ने बताया।  “क्यों आती है ? कुछ तो वजह होगी ?”…

सर्व व्याप्त चलायमान जूते…?

सर्व व्याप्त चलायमान जूते…? – दिनेश गंगराड़े जैसे अहंकार गुर्राता है,पैसा बोलता है,वैसे ही जूता भी बोलता है।जूतों की कीमत देखकर गरीबो का खून खौलता है,महंगे दामों के कारण आजकल जूते पैरों में कम सिर पर अधिक रखे जाते हैं?आजकल जनजीवन में जूतों का चलन, सट्टे की बलन,बढ़ते सुख,साधनों की जलन,सदविचारों की गलन का दौर…

मानसून –प्लीज कम सून

मानसून –प्लीज कम सून – डॉ मुकेश ‘असीमित ‘ हे ! बादल भैया, कब तक छुप-छुप के मुस्कुराओगे, जरा बरस के तो दिखाओ रे ! देखो मेरे “मेरे शहर की सड़कों पर जो गड्ढे हैं, वो तुम्हें पुकार रहे हैं। देखो, वो बिल्कुल पुरानी जींस में जैसे फैशन के छेद झांकते हैं , ऐसे तुम्हारी…

चिड़िया कैद में

चिड़िया कैद में – दिलीप सिंह यादव उसने अपने आप कोउबारना चाहा खुले आसमान कीसैर करना चाहाउसने उड़ान भी भरालेकिन कुछ ही समय मेंउसके पंख कुतर गएएक ऐसी धारदार छुरी सेजो बनी है पुरुष प्रधानसमाज के लोहे सेउसने हंसना चाहाखुलकर हंसना चाहालेकिन उसकी हंसीदूर तक न पहुंचने दिया गयाउसे बंद कर दिया गयाचारदीवारी के अंदरताकि…

मानवता के गिरते मूल्य

मानवता के गिरते मूल्य -डॉ. मुकेश ‘असीमित’ मानवता का भाव सभी हम भूल गए ,परपीढा का घाव सभी हम भूल गए ।बंधे सब मनुज, स्वार्थ के घेरे में,भूल गए परहित , अपने पराये फेरे में ।घायल पथिक सड़कों पर, पड़ा तड़पता है ,लोग गुजर जाते हैं, जैसे कुछ न घटता है ।हॉर्न की आवाज में,…

परिभाषा

मोतीलाल दास की कविताएँ मोतीलाल दास मेरी बात सुनोकि आरंभ की वह बिन्दुहाथ से न छूटेऔर बहुत देर तकटंगा न रह जाएइन हवाओं के बीच छूटने का श्रोतअंतस से फूटता हो जबजैसे उग आये होंढेर सारे नागफनीइन आंखों मेंऔर बहती हो कहींएक नदीचांद पर जाने को आतुरसंभलने की प्रक्रियाचुभता क्यों रहता हैउन्हीं आंखों में परिभाषा…

राजेश पाठक की कविताएँ

– राजेश पाठक 1.तुम तुम न मिलोतो लगता हैसूख गई कोई नदी तुम न खिलोतो लगता हैमुरझा गई कोई कली तुम न दिखोतो लगता है गायबहो गई चांद से रोशनीइसलिएतुम मुझमें मिलोजैसे आकरमिलती है नदी समुद्र में तुम मुझमें खिलोजैसे खिलता है गुलाबकांटों के बीच में तुम मुझमें दिखोजैसे दिखती है रोशनीचांद में,, 2.उड़न छू…

जोंक हुई मछली

जोंक हुई मछली – पीयूष अवस्थी ‘‘आई-लव-यू’’ कहते हुए सामने वाले ने अचानक उसके हाथ पर हाथ रख दिया। वह इस हमले के लिए तैयार नहीं थी। वह बुरी तरह घबरा गई। उसने ज़ल्दी से अपना हाथ हटा लिया। कमरे में कोई नहीं होगा, उसे यकीन था, फिर भी एहतियातन उसकी नज़र इधर-उधर घूम गई।…