बंधन सात फेरों का

बंधन सात फेरों का

- तेजेन्द्र शर्मा

दो निजी लोगों के तलाक के मामले ने हिन्दू विवाह के रीति-रिवाज पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देने के लिये बाध्य कर दिया। इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इतना अहम जजमेंट पास कर दिया मगर कहीं कोई शोर नहीं मचा; किसी प्रकार के प्रदर्शन नहीं हुए। टीवी चौनलों पर बहस नहीं हुई। देश इस चक्कर में व्यस्त रहा कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ेंगे या रायबरेली से, और हिन्दू विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व निर्णय सुना दिया।
 
 
1979 में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी – ‘बिन फेरे हम तेरे’। उस फ़िल्म में गीत इंदीवर ने लिखे थे और गीत तैयार किया था उषा खन्ना ने। इस फ़िल्म में इंदीवर लिखते हैं, “सजी नहीं बारात तो क्या / आई ना मिलन की रात तो क्या / ब्याह किया तेरी यादों से / गठबंधन तेरे वादों से / बिन फेरे हम तेरे”। बहुत रोमांटिक सा ख़्याल है। शरीर से बाहर निकल कर विवाह का गठबंधन।
मगर भारत की सुप्रीम कोर्ट को यह गाना पसन्द नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीषों को 1982 की फ़िल्म ‘नदिया के पार’ का गीत – “जब तक पूरे ना हों फेरे सात / तब तक दुल्हन नहीं दुल्हा की / रे तब तक बबुनी नहीं बबुवा की, / ना, जब तक३!” सोच बेहतर लगी। 
दरअसल हिन्दू धर्म में विवाह सात जन्मों का साथ है। यह एक धार्मिक पद्धति से पूरा किया गया ‘संस्कार’ है जिसे देवताओं की उपस्थिति में मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है। वहीं अन्य मज़हबों में यह एक काँट्रेक्ट है जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। 
इस बात पर अलग-अलग राय है कि हिन्दू विवाह के लिये सात फेरे लिये जाते हैं या चार। मगर आज मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा है एक महिला और पुरुष का जिन्होंने तलाक के लिये एक साझा अर्ज़ी दायर की हुई थी और मामला बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। बिहार के मुज्ज़फ़रपुर की अदालत में एक पति-पत्नी ने तलाक की अर्ज़ी दाखिल की। दोनों ही पति-पत्नी प्रशिक्षित कमर्शियल पायलट हैं। 
इन पति-पत्नी का नाम प्रेस में गोपनीय ही रखा गया है। इनके रिश्ते की शुरूआत और अंत विमान की गति से ही हुआ। इन तथाकथित पति-पत्नी की सगाई 7 मार्च 2021 को हुई। इन दोनों का दावा है कि 7 जुलाई 2021 को इन दोनों ने शादी भी कर ली। इन्होंने वैदिक जनकल्याण समिति से एक ‘विवाह का प्रमाण पत्र‘ यानी कि मैरिज सर्टिफ़िकेट भी हासिल कर लिया। और इस प्रमाण पत्र का इस्तेमाल करते हुए उन दोनों ने उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण निय 2017 के तहत अपनी शादी को रजिस्टर भी करवा लिया। ज़ाहिर है कि अब अदालती नियमों के अनुसार दोनों विवाहित थे और पति-पत्नी थे।
बैरी समाज तो हमेशा ही प्रेमियों के लिये परेशानियां खड़ा करता रहता है। दोनों परिवारों को अच्छा नहीं लग रहा था कि उनके बच्चों ने चोरी-चोरी चुपके-चुपके शादी कर ली है। तो दोनों परिवारों ने आपस में तय किया कि अब इन दोनों का विवाह यानी कि पाणिग्रहण संस्कार की तारीख़ भी तय कर ली जाए। इन दोनों के अनुसार जो तारीख़ हिन्दू पद्धति और रीती रिवाजों के अनुसार तय की वो थी 25 अक्टूबर 2022३
इस बीच ये दोनों पति-पत्नी रहते अलग-अलग थे। जब हमें यह ग़लतफ़हमी हो जाती है कि हम पढ़े-लिखे व्यस्क हैं और अपने जीवन के फ़ैसले स्वयं लेने में सक्षम हैं तो कहीं न कहीं अपनी योग्यता को अधिक आंक रहे होते हैं। अलग-अलग रहते हुए भी इस दम्पति में आपस में विवाद होने लगा। ज़ाहिर है कि मतभेद इतने बढ़ गये कि दोनों ने पारंपरिक विवाह होने से पहले ही अदालत का दरवाज़ा तलाक के लिये खटखटा दिया। 
यह तो हम सब जानते हैं कि भारत की अदालतों में मुकद्दमे बरसों तक लटके रहते हैं। इनका मामला भी मुज्ज़फ़रपुर की लोकल अदालत में मुकद्दमों की भीड़ में कहीं खो गया। दोनों एक दूसरे से छुटकारा पाने के लिये बेचौन थे। तो दोनों ने केस को झारखण्ड की राजधानी रांची की एक अदालत में अपना केस ट्रांस्फ़र करवाने की अर्ज़ी दायर कर दी। इस अर्ज़ी पर कार्यवाही गहरी नींद सोती रही। अंततः दोनों ने भारतीय संविधान की धारा 142 के तहत एक संयुक्त आवेदन किया कि इनका संबन्ध विच्छेद कर दिया जाए। उन दोनों का तर्क था कि इनके विवाह में किसी तरह के पारंपरिक रीति रिवाज का पालन नहीं किया गया इसलिये इनके मैरिज सर्टिफ़िकेट को निरस्त कर दिया जाए। 
अब मामले की सुनवाई कि ज़िम्मेदारी पड़ी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं अगस्टाइन जॉर्ज के कंधों पर। इस जोड़े को उम्मीद थी कि अब उनका केस जल्दी से सुलटा दिया जाएगा। मगर सुप्रीम कोर्ट की न्यायपीठ ने दोनों को समझा दिया कि मसला इतना सीधा नहीं जितना वे दोनों समझ रहे हैं। न्यायधीषों का कहना था कि आप दोनों का तो विवाह हुआ ही नहीं तो फिर तलाक़ का क्या मतलब है। न्यायपीठ के अनुसार हिन्दू विवाह तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक पारंपरिक ढंग से हवन और सात फेरे ना लिये जाएं। 
अपने निर्णय में दोनों न्यायधीशों ने कहा कि हिंदू विवाह एक ‘संस्कार’ है। इसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती जब तक कि इसे उचित रीति रिवाज और समारोहों के साथ नहीं किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध शादी के लिए मैरिज सर्टिफिकेट ही पर्याप्त नहीं है। ये एक संस्कार है, जिसे भारतीय समाज में प्रमुख रूप से दर्जा दिया गया है। 
न्यायाधीशों ने अपने फैसले मे जोर देते हुए कहा कि हिंदू विवाह को वैध होने के लिए, इसे सप्तपदी (पवित्र अग्नि के चारों ओर फेरे के सात चरण) जैसे उचित संस्कार और समारोहों के साथ किया जाना चाहिए और विवादों के मामले में इन समारोह का प्रमाण भी मिलता है। कोर्ट ने कहा कि मैरिज रजिस्ट्रेशन के फायदे ये हैं कि इससे किसी विवाद की सूरत में प्रूफ के तौर पर पेश किया जा सकता है, लेकिन अगर हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 7 के तहत शादी नहीं हुई है, तो रजिस्ट्रेशन करा लेने से विवाह को मान्यता नहीं मिल जाएगी।
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने अपने फैसले में कहा, हिंदू विवाह एक संस्कार है, जिसे भारतीय समाज में एक महान मूल्य की संस्था के रूप में दर्जा दिया जाना चाहिए. इस वजह से हम युवा पुरुषों और महिलाओं से आग्रह करते हैं कि वो विवाह की संस्था में प्रवेश करने से पहले इसके बारे में गहराई से सोचें और भारतीय समाज में उक्त संस्था कितनी पवित्र है, इस पर विचार करें।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट जज ने जैसे युवा पीढ़ी को दिशा-निर्देश देते हुए समझाया कि विवाह ‘गीत और नृत्य’ और ‘शराब पीने और खाने’ का आयोजन नहीं है या अनुचित दबाव द्वारा दहेज और उपहारों की मांग करने और आदान-प्रदान करने का अवसर नहीं है. जिसके बाद किसी मामले में आपराधिक कार्यवाही की शुरुआत हो सकती है।
पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह संतानोत्पत्ति को सुगम बनाता है, परिवार के यूनिट को मजबूत करता है। ये विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को मजबूत करता है। ये विवाह पवित्र है, क्योंकि यह दो व्यक्तियों के बीच आजीवन, गरिमापूर्ण, समानता, सहमतिपूर्ण और स्वस्थ मिलन प्रदान करता है। इसे एक ऐसी घटना माना जाता है जो व्यक्ति को मोक्ष प्रदान करती है, खासकर जब संस्कार और समारोह आयोजित किए जाते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों पर विचार करते हुए कि पीठ ने कहा कि जब तक शादी उचित समारोहों और रीति-रिवाज में नहीं किया जाता, तब तक इसे एक्ट की धारा 7(1) के अनुसार संस्कारित नहीं कहा जा सकता है।
भारत में व्यक्ति के धर्म के अनुसार विवाह के कानून लागू होते हैं। जैसे हिन्दू मैरिज एक्ट हिन्दू धर्म के लोगों पर लागू होता है। इसी तरह मुसलमानों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट1937 लागू होता है। किन्तु एक धर्म के किसी व्यक्ति का दूसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह करने की स्थिति का कोई विशेष कानून नहीं है। इसीलिये 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट लागू किया गया। इसके तहत देश में या विदेश में दो नागरिक आपस में विवाह कर सकते हैं। इसमें व्यक्ति के धर्म से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 
दो निजी लोगों के तलाक के मामले ने हिन्दू विवाह के रीति-रिवाज पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देने के लिये बाध्य कर दिया। इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देना आवश्यक है  कि सुप्रीम कोर्ट ने इतना अहम जजमेंट पास कर दिया मगर कहीं कोई शोर नहीं मचा; किसी प्रकार के प्रदर्शन नहीं हुए। टीवी चौनलों पर बहस नहीं हुई। देश इस चक्कर में व्यस्त रहा कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ेंगे या रायबरेली से, और हिन्दू विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व निर्णय सुना दिया।
 
– तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा
यूके के महासचिव और पुरवाई के
संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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