भावना मेहरा की ग़ज़लें –
भावना मेहरा की ग़ज़लें -
- भावना मेहरा
इस जहाँ में आजतक किसका निशाँ बाक़ी रहा।
चल दिए सब छोड़कर कोई कहाँ बाकी़ रहा।।
चाह ने उसकी घुमाया है हमें यूँ दर- बदर,
याद का लेकिन गुज़िश्ता कारवाँ बाक़ी रहा।
जल रहा था घर हमारा दोस्तों की भीड़ में,
सब गए मुँह मोड़ कर बस ये धुआँ बाक़ी रहा।
गुलशनों में हर शज़र पर बस खिज़ा कायम रही,
गुल सभी मुरझा गए पर बागवांँ बाक़ी रहा।
जुल्म करते ही रहे हम पर मुसलसल वो बहुत,
‘ भावना’ के सब्र का बस इम्तहाँ बाक़ी रहा।
(2)
मेरा तुमसे कोई झगड़ा नहीं है।
मगर कुछ राब्ता रखना नहीं है।
सफ़र जितना भी चाहे अब कठिन हो,
हमें चलना ही है रुकना नहीं है।
कहो जो तुम उसे ही हम कहेंगे,
हमारा मन कोई बच्चा नहीं है।
कभी तुम देखना मेरी ग़ज़ल को,
कोई एक शेर भी झूठा नहीं है।
जो समझो खुद को तो समझा करो तुम,
तुम्हारी हर जगह सत्ता नहीं है।
नहीं अब आजमाओ सब्र मेरा,
न समझो अब कोई रस्ता नहीं है।
शज़र सा मान लें कैसे उसे हम,
किसी पर छाँव जब करता नहीं है।
बशर हैं ‘ भावना ‘ अपनी कहेंगे,
हमारा हौसला टूटा नहीं है।
– भावना मेहरा
शिक्षिका, ग़ज़लकार
आगरा
Mobile – 8449196991