मानवता के गिरते मूल्य

मानवता के गिरते मूल्य -डॉ. मुकेश ‘असीमित’ मानवता का भाव सभी हम भूल गए ,परपीढा का घाव सभी हम भूल गए ।बंधे सब मनुज, स्वार्थ के घेरे में,भूल गए परहित , अपने पराये फेरे में ।घायल पथिक सड़कों पर, पड़ा तड़पता है ,लोग गुजर जाते हैं, जैसे कुछ न घटता है ।हॉर्न की आवाज में,…

परिभाषा

मोतीलाल दास की कविताएँ मोतीलाल दास मेरी बात सुनोकि आरंभ की वह बिन्दुहाथ से न छूटेऔर बहुत देर तकटंगा न रह जाएइन हवाओं के बीच छूटने का श्रोतअंतस से फूटता हो जबजैसे उग आये होंढेर सारे नागफनीइन आंखों मेंऔर बहती हो कहींएक नदीचांद पर जाने को आतुरसंभलने की प्रक्रियाचुभता क्यों रहता हैउन्हीं आंखों में परिभाषा…

राजेश पाठक की कविताएँ

– राजेश पाठक 1.तुम तुम न मिलोतो लगता हैसूख गई कोई नदी तुम न खिलोतो लगता हैमुरझा गई कोई कली तुम न दिखोतो लगता है गायबहो गई चांद से रोशनीइसलिएतुम मुझमें मिलोजैसे आकरमिलती है नदी समुद्र में तुम मुझमें खिलोजैसे खिलता है गुलाबकांटों के बीच में तुम मुझमें दिखोजैसे दिखती है रोशनीचांद में,, 2.उड़न छू…

ग़लत युग में: सुशांत सुप्रिय

ग़लत युग में सुशांत सुप्रिय ग़लत युग में यदि तुमसूरज को गाली देकरधूप से दोस्ती नहीं कर सकते यदि तुमचाँद को दाग़दार कह करचाँदनी से इश्क़ नहीं कर सकते यदि तुमफूल को नकार करख़ुशबू को नहीं अपना सकते तो तुमग़लत युग में पैदा हुए हो सुशांत सुप्रिय A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी , वैभव खंड,इंदिरापुरम ,…

किसान का फोटो: सुशांत सुप्रिय

किसान का फोटो सुशांत सुप्रिय किसान का फ़ोटो वह हमारे देश काएक गरीब किसान था मिट्टी से सम्मानित हुआ थामिट्टी ने अपमानित किया था मिट्टी से मिट्टी तक कीउसकी सारी यात्राएँ थीं इस साल भारी सूखा पड़ा थाइतना कि उसकी आँखों केकोरों का पानी भीसूख गया था जब मैंने उसे देखामुरझाई फसल-सावह घुटनों के बलझुक…

हे पार्थ ! रुको अब …

हे पार्थ ! रुको अब … व्यग्र पाण्डे हे पार्थ ! रुको अब बहुत लड़ लिएहिस्से के खातिरकब तक चलेगा महाभारतअपनों से हे पार्थ !माना कि हिस्से का किस्सातुम्हारा नहीं था गलतपर इतना सच भी नहींकितने ही रिश्ते चंढ़ गए थेहिंसा की बलिवेदी पर हे पार्थ !कितना खोया कुछ पाने के लिएबुद्धि विवेक पराक्रम अपनों…

मेघ मनमीत

मेघ मनमीत मधुकर वनमाली मेघ ये मनमीत सदृश लग रहे हैंइस नयन में शीत बनकर सज रहे हैंदग्ध अवनी सींचती काली घटाएँवैद्य जैसे घाव औषध मल रहें हैं। तुंग पर्वत को बढी गज की सवारीजल तुमुल कर में लिए विद्युत कुठारीगीत मंगल गा रहे दादुर यहीं परग्रीष्म तुमपर यह पड़ेगी रात भारी। तेज जल मलयज…

वह श्रमिक है

कविता वह श्रमिक है अशोक कुमार बाजपेई अखिल ब्रह्मांड अंड सा दिखता जिसे स्वर्ण पृष्ठों पर इतिहास है लिखता जिसे हिमालय शिखर पर सूर्य जैसा जो उगा है प्रात जिस की आवाज सुनकर प्रकाश पुंज बनकर जगा है कौन है वह चल रहा जो लिए गति क्रमिक है अजेय योद्धा विश्व पथ का वह श्रमिक…

वचनबद्धता

कविता वचनबद्धता डॉ. सुरेश अवस्थी तुम में से कौन  “लव”  है और कौन ‘‘कुश’’ ! पहले ये बताओ, फिर इसका मुहरांकित प्रमाण प्रस्तुत करो तुम्हें….निराश्रित…निष्काषित माँ ने जन्म दिया है, साथ ही यह घोषणा करते हुए कि तुम्हें कतई पता नहीं है कि तुम्हारा पिता कौन है उसके इस धरती पर होने का प्रमाण एकत्र…

पेड़ और नदी

कविता पेड़ और नदी अनिल कुमार ‘निलय’ पक्की सड़क है मेरे गाँव जाती,छोटी नहीं है;बडी बात साथी।मुझे पग में पगडंडियों की है चाहत,सड़क कोई कब दिल के द्वार जाती?होकर शहर से बहरा मैं निकला,मुझे गाँव की एक झोपड़ बुलाती।आंटी मेरे गाँव तक जा चुकी हैं,ढूँढू कहाँ बोलो;मैं अपनी काकी।पक्के हुए जा रहे सारे मन्दिर,घरों तक…