ख्वाहिशें

कविता ख्वाहिशें अजय कुमार झा तमन्ना थी सितारों की खजूर पर अटकाया पसीने की बूंदों ने मिट्टी को दलदल बनाया  भरपूर जिया सपनों में जो मेरे अपने थे साथ हैं आज भी सपने  लेकिन जुबां हैं अपनी अल्फ़ाज़ किसी और के हैं  गर्दनों को तलब करती म्यानों में थीं तलवारें शोर है शहर में कातिलों…

स्त्री विमर्ष : दृष्टि

कविता स्त्री विमर्ष : दृष्टि अजय कुमार झा. वैचारिक संशय के युग में नवीन प्रतिमान के गढ़ने में ‘फ्यूडल माइंड सेट’ से जूझते गर आँखे चुराता                                              नजर आये वर्त्तमान  अतीत के झरोखे में …

परिंदे तेरी जात क्या?

कविता परिंदे तेरी जात क्या? ए के अर्चना परिंदे तेरी जात क्या?अक्सर आसमान में,परिंदों को उड़ते देखती हूं तो,यह खयाल आता हैं,क्या मनुष्यों की तरह,पशु पक्षी, जानवर भी,जात – पात के,भेद भाव में बंट जाता हैं।कैसे स्वच्छंद विचरण करते हैं,ये आकाश, नभ और थल में,इनके पैरों में धार्मिक,भेद भाव की जंजीरें नहीं हैं।मनुष्य तो परिंदों…

तुम आओ

कविता तुम आओ संजय कुमार सिंह तुम आओ आँखों में स्वप्न डालियों में फूल कि जैसे गाँव में स्कूल। तुम आओ जैसे देहरी पर दीप साँसों में प्रीत, होंठों पर गीत। तुम आओ नदियों में पानी नसों में जवानी यादों में रवानी बनकर। तुम आओ दाने में दूध   दिल में उम्मीद बनकर चाँद, तारे  तितली,…