ख्वाहिशें
कविता ख्वाहिशें अजय कुमार झा तमन्ना थी सितारों की खजूर पर अटकाया पसीने की बूंदों ने मिट्टी को दलदल बनाया भरपूर जिया सपनों में जो मेरे अपने थे साथ हैं आज भी सपने लेकिन जुबां हैं अपनी अल्फ़ाज़ किसी और के हैं गर्दनों को तलब करती म्यानों में थीं तलवारें शोर है शहर में कातिलों…