रिश्तों में गर्माहट

रिश्तों में गर्माहट – डॉ. शिखा अग्रवाल मां, आपके और पापा के लिए स्वेटर भेजे थे, मिल गए होंगे। कैसे लगे? बहुत गर्म है ना” दूर देश बैठे बेटे ने फोन पर पूछा। “हां बेटा, स्वेटर तो मिल गए पर तुम लोग कब आओगे। बहुत साल हो गए तुम लोगों से मिले हुए।” बेटे से…

किन्नर का नजरिया

किन्नर का नजरिया – डा.वीणा विज ‘उदित’ हमारी गली के आखरी घर में करतार सिंह के घर पोता होने पर हिंजड़े नाचने आए थे। इसके लिए सारी गली को आमंत्रित किया गया था। जितने लोग आएंगे ,उतने ही नवजात शिशु पर नोटों के वारने होंगे और वो पैसे हिंंजड़ों को मिलेंगे। घर वाले तो रिवाज…

कम्मो – यशोधरा भटनागर

कम्मो – यशोधरा भटनागर काली घटाओं का घटाटोप, उमड़ते- घुमड़ते बादल ,माटी की सौंधी गंध और बूंदों का संगीत।अहा!वर्षा ऋतु का मंगलकारी आगमन !  शीघ्र ही पकौड़ों की सुगंध वातावरण में रच-बस गई और नथुनों के रास्ते उतर जिह्वा को रससिक्त कर गई। यही तो सरस आनंद है।    बरसते पानी में भीगते-थिरकते,तन-मन भीग गया।तभी…

पेंशन – रश्मि वैभव गर्ग

पेंशन – रश्मि वैभव गर्ग सुरेश जी के दोनों बेटों में झगड़ा चल रहा था.. दोनों ने अंततः निश्चय किया कि एक एक महीने दोनों अपने माँ बाप को रखेंगे।दोनों ही अपने माँ बाप को साथ नहीं रखना चाहते थे।सुरेश जी को रिटायर हुए छह महीने हो चुके थे लेकिन अभी तक उनकी कंपनी में…

पड़ोस वाली आंटी – अलका अग्रवाल

पड़ोस वाली आंटी – अलका अग्रवाल मैं कॉलोनी में ही घर के पास वाली किराने की दुकान पर कुछ सामान लेने गई थी। पड़ोस वाली आंटी भी दुकान पर सामान लेने आई थीं। हालांकि वह बहुत दूर नहीं रहती हैं, लेकिन मिलना जुलना कम ही हो पाता है। 6 माह  में ही आंटी के बालों…

एडजस्टमेंट……

एडजस्टमेंट…… – पारुल अग्रवाल मित्तल रश्मि चुपचाप बिस्तर ठीक कर रही थी ….दिवाकर समझ गया था वो कुछ कहना चाहती हैं। ” रश्मि क्या हुआ कुछ परेशान हो….बताओ मुझे…दिवाकर ने पूछा। ” नही कुछ नही….रश्मि ने भी मुंह फेरकर जवाब दिया। ” बताओ ना यार….प्लीज …क्यों मुंह लटका है मेरी प्यारी पत्नी का….दिवाकर ने रश्मि…

सहृदयता

सहृदयता – डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा “कौन है ये महिला ? क्या शिकायत है इसकी ?” बाहर शोरगुल की आवाज सुनकर निरीक्षण पर आए एस.पी. साहब ने थानेदार से पूछा ।  “सर, ये महिला लगभग रोज ही थाने में आकर बैठ जाती है।” थानेदार ने बताया।  “क्यों आती है ? कुछ तो वजह होगी ?”…

थप्पड़ की गूंज

थप्पड़ की गूंज मृत्युंजय कुमार मनोज राजू…राजू… जरा गेहूं पीसवा कर लेते आना। और आते समय पापा के लिए ये दवाइयां भी लेते आना’ -श्यामा जी ने अपने ग्यारह वर्ष के बेटे को प्रेस्क्रिप्शन थमाते हुए कहा। अस्सी का दशक, वर्ष 1989, बिहार की राजधानी पटना का ‘श्यामा निवास’। मार्च महीने का एक रविवार। दोपहर…

खुशियों के साथी

खुशियों के साथी डॉ अलका अग्रवाल उस दिन सड़क पर लाल बत्ती होने पर , जब मैने कार रोकी तो देखा कि एक बच्चा खिलौने बेच रहा है । उसके मासूम और दयनीय चेहरे को देखकर समझा जा सकता था कि उसे पैसों की सख्त जरूरत है। इसलिए अपनी जेब से कुछ रुपये निकालकर मैने…

इंसान

इंसान डॉ. शिखा अग्रवाल कीर्ति की कार लाल बत्ती पर रुकते ही एक किन्नर ने कार की विंडो खटखटाते हुए पैसे मांगना शुरु कर दिया। कीर्ति ने बड़े ही उपेक्षित भाव से उस पर नजर डाली और दूसरी तरफ देखने लगी। अच्छी कद-काठी का वह किन्नर, कीर्ति की गाड़ी के शीशे पर तब तक दस्तक…