दर्द न जाने कोय: आदित्य अभिनव


दर्द न जानै कोय

आदित्य अभिनव

“पिया मोरा गइलें रामा पूरबी बनिजिया से दे के गइलें ना।
एगो सुगना खेलवना रामा से दे के गइलें ना … ‘’
सेब कपड़े से चमका-चमका सजा रहा राम प्रवेश अपने आप में ही डूब उतरा रहा था।
“सेब क्या भाव ‘’ विमला ने अपने माथे पर आँचल रखते हुए पूछा।
राम प्रवेश सकपका गया। उसने ग्राहक पर नजर डाली। उसे काठ मार गया … वही … ठीक वही … अपरूप–रूप … वही आँखें , वही नाक … केश भी वैसे ही लम्बे-लम्बे , जो अब आधा से ज्यादा सफेद हो गए हैं लाल-लाल फुले हुए गाल अब मुरझा गए हैं … उम्र की मार है अन्यथा है तो वही …
यादों की लहर उसे हिलोरते निकल गई। बटोही विदेसिया से कह रहा है –
केसिया त बाड़ी जइसे काली रे नगिनियाँ से
सेनुरा से भरल बा लिलार रे विदेसिया।
अँखिया त हउबे जइसे अमवा की फँकिया से,
गलवा सोलहा गुलेनार रे विदेसिया ।।
धा—धि – – ना- -नि – -ना – ना – – – धित – -ढोलक गड़-गड़ा उठा।
“ कैसे किलो – – “ उसने दूबारा पूछा।
वह वर्तमान में लौटते हुए हड़बड़ा कर बोला “ हाँ – हाँ – बीस – – बीस रुपये ‘’
विमला के बगल में कंधे पर मटमैला झोला लटकाये एकटक से संतरे को निहार रहा दस वर्ष का मोहना लोभ का संवरन न कर सका । उसने संतरा उठाया ही था कि विमला ने आँख गुरेरा और हाथ से छिनकर ठेले पर रख दिया।

“ दे दीजिए आधा किलो।‘’ उसने आँचल में बँधे गाँठ को खोल दस रुपये के नोट को निकालते हुए कहा।
“ आपका घर कहाँ हुआ ?‘’ राम प्रवेश ने सेब तौलते हुए पूछा।
“ हमारा गाँव बिहार है … बिहार … छपरा जिला।‘’ विमला ने दस का नोट बढ़ाते हुए कहा।
“ छपरा में कौन गाँव … । ’’
“ मुबारकपुर… नगरा थाना … अपने के घर ?‘’
“ परौना गाँव का नाम सुनी हैं , पहले छपरा में पड़ता था अब सीवान जिला में पड़ता है। ‘’
“ ह… ह … सुनी हूँ … सुनी हूँ क्योंकि उसके बगल के गाँव मोलनापुर में मेरा ममहर है , रउरा बृज बिहारी सिंह के नाम सुनले बानी ।‘’
“ बृज बिहारी सिंह … कोइरी ।‘’
“ ह … ह … ह – बृज बिहारी , श्याम बिहारी अउर कृष्ण बिहारी … तीन भाई हैं हमरे मामा ।‘’
“अरे … रउरा जान जाई कि … ओ लोग से त हमनी के भइयदी ह … ।‘’
“ अरे … तब त रउरा गाँवे-घर के निकल गईनी। रउरा केतना दिन से ऐहजा बानी ।‘’
“ पंद्रह साल से।‘’
“आ रउरा आपन बिहार छोड़के ऐजवा … करनाल में कब से ? ‘’
“ लमहर कथा बा … अच्छा तो चल रही हूँ कभी बाद में बतलाऊँगी … हस्पताल में मोहना के पापा भरती हैं … लीवर डैमेज हो गया है … आइ. सी. यू. में … ।‘’
सेब झोली में रख कंधे पर रख विमला ने मोहना का हाथ पकड़ा और हॉस्पीटल की ओर चल पड़ी। मोहना ललचाई निगाह से मुड़-मुड़ कर संतरे को देख रहा था।
विमला के जाने के बाद राम प्रवेश अपने अतीत में खो गया . . .

एक साथ चार सामियानें लगाए गए हैं। हजारों की भीड़ … गणेश रजक की पार्टी आई है। बारह चौकियों का स्टेज बना है। बड़ा-सा पर्दा लगा है। पर्दे पर बैनर लगा है –
भिखारी नाच –नौटंकी पार्टी
प्रोप्राइटर- गणेश रजक
स्टेज पर चल रहा है भिखारी ठाकुर का ‘ बेटी बेचवा ’ नौटंकी ’। “ ऐ सखी ! ऐ सखी ! दुअरा ( द्वार ) पर बारात आ गईल।‘’ गाँव की सुहागिन औरतें दुल्हा का परिछावन में गीत गा रही है. . .
चलनी के चालल दुलहा सूप के फटकारल हे
दियका के लागल बर दुआरे बाजा बाजल हे।
आँवा के पाकल दुलहा झाँवा के झारल हे
कलछुल के दागल , बकलोलपुर के भागल हे — – –
लड़की की माई और गाँव-टोला की मर्द-मेहरारू सब कलेजा मसोस कर रह जाते हैं। चटक लाल बुढ़वा वर से बछड़ी नियर बेटी को ब्याह देते है।…
… लड़की शादी के बाद अपने बाप के घर आई है। बेटी का पाट निभा रहा प्रवेश स्टेज पर आकर इस तरह कलपता है कि पत्थर कलेजा भी रो पड़े ।
सूत्रधार पर्दा के पीछे से कहता है। अब देखी रउरा सभन के तरे कलप–कलप के आपन दुख बाप के बतावत बिया… ( अब आप सब देखें कि दुखियारी बेटी किस तरह रो-रो कर अपना दु:ख अपने पिता को बता रही है… )
गिरिजा-कुमार ! कर दुखवा हमार पार ;
ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी।
पढल-गुनल भूलि गइल समदल भेंड़ा भइल
सउदा बेसाहे में ठगइल हो बाबूजी।
X x x x
X x x x

रोपेया गिनाई लिहल पगहा धराई दिहल
चेरिया के छेरिया बनवल हो बाबूजी …

दो बजे भोर तक नाच जमा रहा। कुछ लोग बाहर तो कुछ लोग सामियाना में सो गए। नाच पार्टी वाले अपने रावटी में सो रहे थे। जवाहिर को प्यास लगी।
“प्रवेश ! काहे नहीं सो रहे हो । अरे … ई का … फोटो … कइसन फोटो … जरा हम को भी दिखाओ यार ।‘’ जवाहिर प्रवेश के सिरहाने बैठ गया।
प्रवेश ने झट से फोटो अपने पॉकेट में रख लिया।
जवाहिर उसका जिगरी दोस्त। गणेश रजक के पार्टी के दो अनमोल हीरे – – प्रवेश और जवाहिर।
“प्रवेश ! इ ठीक बात नइखे … फोटो देखेंगे तो तुम्हारा कुछ ले लेंगे का ?’’
“ इधर आओ बैठो … देखो लेकिन किसी से नहीं बताना।‘’
जवाहिर एकटक बिना पलक झपकाये निहार रहा था। क्या अपरूप-रूप । नागिन जइसन कमर तक लहरात केश , सेब के माफिक लाल-लाल गाल , सुग्गा के ठोर नियर नाक , आम के फाँक जइसन आँख …
“ कब शादी है… प्रवेश ! ‘’
“ इसी महीना में 24 तारीख को । छेका –सगुन सब हो गया है। 18 तारीख को तिलक है … जवाहिर … तुम जरूर आना मेरे तिलक में । ‘’
“ हाँ … हाँ … आऐंगे … जरूर आऐंगे ।‘’

21 तारीख को प्रवेश के पार्टी का सट्टा हुआ था तीनराता, बाबू कमला सिंह, गाँव आकुचक, तरैया थाना। पूरी पार्टी अपना अपना साज-समान साइकिल पर रख सुबह ही निकल गई। रास्ते में ताड़ीबाना में सब रुके।

“प्रवेश ! तुम्हारे लिए घुघुनी और ठंढ़ा मँगा देते है।‘’ गणेश रजक ने जमीन पर बिछे बोरा पर बैठते हुए कहा।
“ ना … मालिक ! हम भी पियेंगे आज … ।‘’ प्रवेश बोरा पर बैठ गया।
“ चलो… ठीक है दो दो गिलास … घुघुनी के साथ।‘’

प्रवेश पीये जा रहा है … तीन … चार … पाँच … छ: … सात … ।

पूरी नाच पार्टी आश्चर्य से देख रही थी। लेकिन प्रवेश के भीतर के दर्द को जवाहिर समझ रहा था। कही तिलक देहुआ पार्टी बाजार आने के बाद रास्ता तो नही भूल गई। उस रात को प्रवेश चार बार साइकिल से बाजार गया था। अंतिम बार साढ़े दस बजे रात को गया था। पण्डित जी अपना पोथी-पतरा लेकर चल दिए।
“जजमान ! हम चलते हैं , तिलकदेहुआ पार्टी आ जाए तो बुलवा लीजिएगा।‘’
एक –एक कर गाँव-जवार के सब हित-पाहुन जाने लगे थे।
खीस में काँपते हुए बड़े भाई गिरजेश ने पिता को अंगुली दिखाते हुए कहा “ और भेजिए नाच-नौटंकी में … कहाने को सिंह और लड़का है नाच का लवंडा … कौन खानदानी कोइरी देना अपनी लड़की … अब भोगिए … ये तो होना ही था।‘’
प्रवेश के पिता माथे पर हाथ रखे बैठे चुपचाप टुकुर-टुकुर प्रवेश को देख रहे थे। वे एकाएक उठे और दरियाव की ओर तेज कदमों से बढ़ने लगे। नात-रिश्तेदार समझा-बुझा कर किसी तरह लाए थे।
आकुचक बबुआन गाँव है। तरैया थाना में आकुचक और भटगाई दो गाँवों में राजपूतों का ठठ है। लम्बा-चौड़ा सामियाना लगा है। छ: सामियाना एक साथ लगाया गया है। पूरा जवार उमड़ पड़ा है नाच देखने के लिए। पुलिस भी बुला ली गई है, कही भटगाई के लौड़ा-छौड़ा बवाल न मचा दें। सामियाना में कही सुई रखने का भी जगह नहीं है। जितना लोग सामियाना के भीतर हैं उससे ज्यादा लोग सामियाना के बाहर खड़ा होकर देख रहे हैं। भिखारी ठाकुर के ‘विदेसिया’ का पाट हो रहा है ।

प्रवेश सुंदरी की भूमिका में है। वह बटोहिया से अपने स्वामी के रूप का वर्णन कर रही है –

हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अंखिया से,
चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया।
ओठवा त बाड़े जइसे कतरल पनवा से,
नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया।

आगे वियोगिनी रोते –रोते कहती है – –

अमवा मोजरी गइले , लगले टीकोरवा रे
दिन पर दिन पियराये रे विदेसिया
एक दिन बहि जइहें जुलुमि बेयरिया
डार पात जाइहें खहराइ रे विदेसिया …

धीरे-धीरे गाँव-समाज में लवंडा नाच का चलन कम होने लगा था। लोग बाईजी (रण्डी) का नाच बाँधने लगे थे। आसाम, बंगाल , नेपाल से आई लड़कियाँ नाच पार्टी में डांस करती थी। भोजपुरी नौटंकी के कद्रदान कम होते जा रहे थे। सन् 90 तक कोई-कोई पार्टी किसी प्रकार लटते-बुड़ते चल रही थी। खुद गणेश रजक के पार्टी में चार नेपाली लड़कियाँ आ गई थी। लेकिन वे कैसेट पर डांस करती थीं , भोजपुरी गीत नहीं गाती थी। लोग धीरे-धीरे देशी घी छोड़कर डालडा-रिफाइन की तरफ बढ़ते जा रहे थे । सन् 2005 आते- आते डी. जे. का फैशन चल निकला। नाच के सब लवंडा बेकार हो गए। कोई दिल्ली भागा तो कोई कलकत्ता। कोई सुरत गया तो कोई पंजाब-हरियाणा। आखिर पेट तो भरना ही था। उसे भी खुद गाँव छोड़े पंद्रह साल हो गया है। सन् 2005 में जब एक तरह से नाच का साटा बयाना बिल्कुल बंद हो गया ; भाई ने घर से निकाल दिया तो वह माई को लेकर गाँव के लड़कों के साथ पंजाब में बरनाला आ गया था। कुछ दिन तक गेहूँ-धान का कटाई किया। फिर बाद में करनाल आ गया। फल का ठेला लगाता है। सबलोग उसे सिंगजी –सिंगजी कहते है। उसने अपना पूरा नाम बताया था – राम प्रवेश सिंग। लोगों ने छोटा कर सिंगजी कर दिया। करनाल-दिल्ली हाई वे पर बनी झुग्गी-झोपड़ियों में से एक उसका भी था। उसने करकट डालकर दो छोटे-छोटे कमरें और आगे ओसारा बना लिया था।. . .

विमला को यहाँ सिंगजी के झुग्गी में रहते हुए बारह वर्ष हो गए है। जरूर कोई अवतारी पुरुख है सिंगजी। ऐसा देव पुरुख … इस कलयुग में नामुमकिन … असम्भव। वह यहाँ रहना नहीं चाहती थी, लेकिन चाहकर भी कहाँ जाती ? कोई और ठौर तो था नहीं। यदि ठौर-ठिकाना होता तो उसका पति क्यों आता लेकर यहाँ आन देश में । आया था पंजाब कि

खेती, कटाई, रोपाई कर कमायेगा , परिवार चलायेगा। उसके गाँव के और भी कई लोग हैं। बाकी सब लोग तो कमाने के साथ-साथ जोगाना भी जानते है। एक-एक पैसा
जोड़कर कुछ लोगों ने अपना छोट-मोटा घर भी बना लिया है। यहीं का आधार कार्ड है उनका। खैर आधार कार्ड तो अब उसका और उसके बेटे का भी यही बन गया है। उसका मरद … उसका मरद तो था एक नंबर पियक्कड़। जितना कमाता उससे कहीं ज्यादा पी जाता। उसके हाथ-पाँव मारने से काम चलता था। कटनी- गोरनी-रोपनी कर किसी तरह घर चलाती थी। कितना समझाया उसने और उसके दोस्तों ने भी लेकिन काहे को मानने जाए। आखिर वही हुआ जो होना था- लिवर फेल हो गया। छोटे हॉस्पीटल में दिखाया तो डिस्ट्रीक्ट
हॉस्पीटल में रेफर कर दिया। सात दिन तक आइ. सी. यू. में रहा था। फिर दगा देकर चला गया निर्मोहिया । अकेली रह गई थी वह। माँ-बाप तो कब के मर चुके थे। सास-ससुर भी गुजर गए थे। भाइयो ने तो वैसे ही सास-ससुर ने जिंदगी में ही उसके पति को फरका कर दिया था। अब एक ही आसरा था मोहना जो अभी मात्र दस साल का था।

अस्पताल के सामने बेंच पर बैठकर रो-कलप रही थी कि किसी ने कंधे पर हाथ रखा था और मोहना को खीचकर गले से लगा लिया था। सचमुच सिंगजी देव पुरुख हैं– -देव पुरुख।

“ मोहना का कहीं एडमिशन करवाई कि नहीं , मोहना की माई ! ‘’ ठेला लेकर निकलते समय सिंगजी पूछे थे।
“ नहीं , क्या करेगा पढ़-लिख कर और कहाँ से आयेगा पैसा-कौड़ी … ?’’
“ कल इसका एडमिशन होगा , बगल के न्यू ऐंजल पब्लिक स्कूल में , तैयार रहिएगा। ‘’
एडमिशन के समय अभिभावक के जगह सिंगजी ने अपना नाम लिखवाया था और अपना मोबाइल न. दिया था- 9756438765 .
सचमुच छत्रछाया बनकर रहे हैं सिंगजी मोहना का। नहीं तो चौका-बरतन से कहाँ इतना आमदनी कि उसे कॉन्वेंट में पढ़ा सकती मैं। खैर, मेरा रोआ-रोआ उनको आशीर्वाद देता है इस देव पुरुख को।

बड़ा ही जालिम दुनिया है । हाय रे दैव ! इनका भी कोई नहीं है। शायद अच्छे लोगों के साथ ऐसा ही होता है। भगवान् के यहाँ भी न्याय नहीं है । एक महतारी थी उनकी अपनी वो भी पिछले साल चली गई। अब निपट अकेले – – -सुबह उठते ही ठेला लेकर

हॉस्पीटल गेट पर चले जाते हैं। रात को आते हैं तो खाना बनाते हैं । मैंने कितनी बार कहा कि मैं बना दिया करूँगी लेकिन माने तब न। ‘द’ अक्षर जानते हैं ‘ल’ अक्षर नहीं जानते।

कभी-कभी अपना दुखड़ा सुनाते हैं ; कहते हैं कि किस तरह भाई-भाई न होकर दुश्मन हो जाता है। खैर, यह तो घर-घर कि कहानी है। हमारे घर में भी इनको ( मोहना के पापा) भी तो भाइयो ने मार-पीट कर भगा ही दिया था। दोष भाई-गोतिया को क्या देना जब अपना करम ही खोटा हो। भाग्य-करम खोटा नहीं होता तो शराबी–पियक्कड़ गले क्यों पड़ता। कल शाम को ही तो सिंगजी कह रहे थे कि अब हमारी उम्र हो गई है न जाने
कब बुलावा आ जाए। इस चला-चली के बेला में अब शरीर भी साथ नहीं दे रहा है। कहने लगे “ यदि मैं मर जाऊ तो मेरा सबकुछ मोहना का है … ये सुन रही हैं न … मोहना की माई … सब मोहना का है मोहना का।‘’ रोआई फूट पड़ी थी , उसने मुँह में आँचल ठूँस लिया था।
“ दोहाई काली माई के … सौ बरस की आयु दीही हे माई … अइसन अवतारी देव पुरुख के। बाबा भोलेनाथ सबका भला करें। ‘’

विमला खाना बनाने के लिए अपने कमरे में आ गई। आज शाम तक मोहना आयेगा। पंजाब पुलिस की बहाली में गया है। भगवती स्थान पर सवा सेर लड्डू चढ़ाने की मन्नत माँगी है वह। देखे माई क्या करती हैं ? मुझ अभागिन के आसरा तो वही हैं।

शाम को मोहना आया। आते ही माँ से लिपट गया।
“माई ! मैं चुन लिया गया पुलिस में … माई … पुलिस में … ।‘’

विमला के आँखों से ढर-ढर आँसू बहने लगे थे। मोहना ने आँसू पोछते हुए कहा
“ यह क्या माई ! … तुम रो रही हो… ।‘’
“ ये खुशी के आँसू है … बेटा … तुम्हारी यह बदनसीब माँ इतनी ज्यादा खुशी सम्भाल नहीं पा रही है ।‘’
वह लड्डू खरीदने के लिए निकल पड़ी।
जब से मोहना के पुलिस में भर्ती की खबर सुनी है सिंगजी ने , तब से उखड़े-उखड़े से रहते हैं।

“ हमारा क्या … हम तो चल देंगे सब छोड़कर … जिसका यह सब है वो जाने … ।‘’

मोहना को दूर से देखते हैं लेकिन पास आने पर मुँह मोड़ लेते हैं। पहले तो सुबह-सुबह ठेला ले जाने के पहले मोहना की माँ से कुछ बात भी करते थे लेकिन आजकल कुछ नहीं बोलते। दिन-प्रतिदिन शरीर मुरझाता चला जा रहा है। लगता है जैसे उनके अंदर ही अंदर कुछ टूट रहा हो। पिछले इतबार को मोहना अपने साथियों के साथ जब क्रिकेट खेलने गया था तो उसके पढ़ने के टेबुल पर आकर बैठ गए और उसके किताब-कॉपियों को छूते-टटोलते रहे। उसके कपड़ों को उतार कर अपने शरीर से सटा कर नापा फिर खूँटी पर पहले की तरह टाँग दिया। लगता जैसे किसी अनहोनी से डरे हुए हो। पहले सुबह पाँच बजे उठ जाते थे लेकिन आजकल सात से पहले नहीं उठते। मोहना के कमरे में आ एक नजर उसे देखकर चुपचाप चले जाते हैं।

मोहना का ट्रेनिंग पूरा हो गया है। उसकी पोस्टिंग मेहतपुर जिले में हुई है। मोहना की माँ सामान पैक करने में लगी है। वैसे तो कुछ खास सामान नहीं है लेकिन जब हमेशा के लिए जाना है तो साज-सामान हो ही जाता है। सिंगजी आजकल ठेला लेकर नहीं जा रहे हैं। अपने कमरे से नहीं निकलते हैं। ट्रक आ गया है। सामान ट्रक पर लादे जा रहे हैं। सिंगजी खिड़की से देख रहे हैं । अपने कमरे ही चहल कदमी कर रहे हैं। मोहना ने पुलिस की वर्दी पहन रखी है । विमला सामान लदवाने में व्यस्त है।
विमला ने अपने पुराने आशियाने को आँखों में आँसू भर कर देखा; मुसीबत के समय का ठिकाना … सिर छुपाने का ठौर। उसने आँचल से आँसू पोछते हुए कहा “ सिंगजी चाचा से मिल लो , उनका बड़ा उपकार है हम पर … बेटा । ‘’

मोहना ने सिंगजी के कमरे का दरवाजा खटखटाया।
“कौन … ‘’
“ मैं … मोहना … ‘’

“ आ जाओ , दरवाजा खुला है ।‘’ बड़ी मुश्किल से सिंगजी बोल पाए थे।

सिंगजी खाट पर पेट के बल गिरे छटपटा रहे थे। शायद दिल का दौरा पड़ा था। मोहना दौड़कर सिरहाने बैठ उनका सिर अपने गोद में रख लिया। उनका शरीर एक बार जोर से काँपा फिर शांत हो गया। पंछी उड़ गया था।

मोहना ने टेलीग्राम भेजकर एक सप्ताह की छुट्टी ले ली। सिंगजी को मुखाग्नि मोहना ने दिया। तीन दिन बाद आर्य समाजी ढंग से उनका श्राद्धकर्म किया गया। एक छोटा-सा बक्सा ही उनकी जमा-पूँजी थी। उसकी चाभी उनके सिरहाने मिली थी। मेहतपुर जाने से एक दिन पहले मोहना ने बक्से को खोला। … विमला के कानों में गूँज रहा था
“मोहना की माई ! मेरे जाने के बाद सबकुछ मोहना का है … मोहना का … ।‘’

बक्सा खुला पड़ा था। बनारसी साड़ी में लिपटा एक पोस्टकार्ड साइज का फोटो और लाल रंग का एक छोटा-सा डिबिया। फोटो … हाँ … हाँ … उसे अच्छी तरह से याद है यह वही फोटो था जो शादी से पहले छपरा छायालोक स्टुडियो में साड़ी पहनकर खिचवाया गया था। उसने डिबिया को खोला उसमें एक बहुत ही खूबसूरत कम से कम तीन तोले सोने का मंगल-सूत्र था। डिबिया के नीचे एक जन्मपत्री थी। नीचे लिखा हुआ था –
पुकार का नाम – विमला कुमारी
सुपुत्री – श्री वीरेंद्र कुमार सिंह
मौजा- मुबारकपुर , थाना – नगरा
छपरा (सारण)
विमला के आँखों से टप-टप आँसू टपक रहे थे। . . .
… पिता जी की दहकती लाल लाल आँखों से अंगारें बरस रहे थे। रौद्र रूप धारण किये
आँगन में रखे हुए तिलक के सामान को इधर-उधर फेकते हुए वे चिल्ला रहे थे
“ विमला की माई ! यह शादी नहीं होगी … नहीं होगी – कभी नहीं होगी … साला … बृज बिहरिया … तुम्हारा भाई … धोखा दिया है … धोखा … । लड़का … लवंडा है … लवंडा … गणेश रजक के नाच का … लवंडा … ।‘’ वह डर कर माँ से लिपट गई थी।
…. लवंडा … लवंडा … लवंडा … लवंडा … लवंडा …
पिता जी के शब्द … लवंडा … लवंडा … अब भी उसके कानों में गूँज रहे थे।

आदित्य अभिनव

उर्फ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव

सहायक आचार्य ( हिन्दी )
भंवरा मेहता महाविद्यालय, भरवारी, कौशाम्बी (उ. प्र.) 212201,
मो – 7972465770
ई – मेल -chummanp2@gmail.com

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