दिल लौटना चाहता है वतन – मीरा सिन्हा

Meera Sinha

दिल लौटना चाहता है वतन

- मीरा सिन्हा

दिल लौटना चाहता है वतन—
एक कसक–
कभी बड़ी तमन्ना थी
वतन से बाहर जाने की
बहुत सुख सुविधा जुटानेकी
विदेश ने बड़ेआदर सेर अपने गले लगाया
सुख सुविधा के सारे इंद्रजाल दिखाया
दिन के हर पल बड़े भले लगे
यहां कि सुख सुविधा को रोज धन्यवाद देने लगा
सारी सुविधाएं मिल गई
अब मैं मेरा परिवार बीबी बच्चे
बस यही तो चाहिए
पर देखा एक दिन-
एक पूरे परिवार को विदेश में –
दादा दादी बच्चे हंसते खिलखिलाते
पति पत्नी एक दूसरे से खुश हो बतियाते
दिल मे एक हुक उठा
माँ पिता दोस्तों भाई बहनों के चेहरे याद आये
एक एक कर दिल नेकहा –
आंसुओं को रोक कर यहां सब है पर माँ !
तुम्हारा रक्षा कवच वाला सर पे हाथ नही
पिता की स्नेह भरी बात नही
भाई बहनों का उल्लास नही
पर्व त्योहार नही
दोस्तों का हंसी मजाक नही।
दिल तड़प उठा अपने वतन लौटने को।
दोस्तों- कभी आप सबो को वतन छोड़ने का मन करे तो मत छोड़ना अपनी मातृभूमि की मिट्टी काप सम्मान करना।
हो सके तो अपने माँ पिता की रक्षा कवच के बीच रहना ।
जो सुख वतन में वह और कहाँ—

– डॉ. मीरा सिन्हा
नई दिल्ली।
संगीत प्रभाकर, शास्त्रीय संगीत (प्रयाग महाविद्यालय)
सम्प्रति : शिक्षिका, पूर्व व्याख्याता, इंटर कॉलेज 2 सी, बोकारो !

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