हम सब आज़ाद हैं?

हम सब आज़ाद हैं?

पीयूष अवस्थी

हमारे देश की आज़ादी का माह चल रहा है, देशवासी अपने देश की आज़ादी के 77 वर्ष पूरे करने की खुशियाँ मनाने की तैयारी में लगे हैं ! लेकिन आज़ादी के विषय में कुछ लोगों की अलग-अलग राय है, कोई कहता है देश को आज़ादी 1914 में मिली थी, फिर अपनी गलती सुधारने की कोशिश में 2014 कहने लगता है, हर किसी को आज़ादी है, लेकिन शायद ये उसने ठीक ही कहा है, ईडी को आज़ादी, सीबीआई को आज़ादी, इनकमटैक्स विभाग को आज़ादी, बुलडोज़र को आज़ादी, पुलिस को इनकाउंटर की आज़ादी, सबको आज़ादी है, जब चाहे जिसके भी घर में घुस जाये, तोड़फोड़ दे……! पूछतांछ के लिए महीनों आफिस में बैठाए….. कारण भी न बताये…… शायद इन विभागों में ट्रेनी कर्मचारियों को ट्रेनिग देने का नया तरीका ईजाद किया गया हो, और उस पर यह सितम कि ‘‘जबरा मारे….. रोवैं न दे’’, सत्ता पक्ष को झूठ बोलने की आज़ादी, जुमलों की रेवड़ी बाँटने की आज़ादी, गलत आंकड़े पेश करने की आज़ादी….. उस पर भी मौन साधना या बेशर्मी से हँसने की आज़ादी, पेपर लीक कराने की आज़ादी, तमाम घोटालेबाजों को अपनी वाशिंगमशीन में धोकर गोद में खिलाने की आज़ादी, उन्हें विदेश भेजने की आज़ादी, तमाम योजनाओं-यथा नमामि गंगे के हज़ारों करोड़ रुपये हज़म कर राजनीति के मुख्य पटल से गायब होने की आज़ादी, ‘‘जाँच हमारी जेब में-मुखिया का दिल पाजेब में’’ और पीछे जायें तो सैनिकों के  ‘‘ताबूत’’ घपला कांड,जो दूसरे ही दिन संसद में हमला होने से, बिना चर्चा के ही बन्द हो गई आदि-आदि… क्या कहूँ ? बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी !

इतनी आज़ादी देखी है क्या ? आपने दुनिया के किसी और देश में ?

अब जब नेताओं को इतनी आज़ादी है तो हम सब को क्यूँ नहीं !! जहाँ चाहो गुटखा, पान खाकर ‘‘पिच-पिच’’ कर लो, उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, चाहे जौन प्रदेश लई लेव, जहाँ-जहाँ गुटखा बिकत है, वहाँ-वहाँ पिच-पिच मची ज़रूर! एकौ सरकारी कार्यालय, अस्पताल, सामाजिक स्थल अइस नहीं है जहाँ की दीवारें पीक से लाल न हों, जहाँ चाहो अपनी टिर्री (ई-रिक्शा) बीच सड़क में रोक लो, पैसे का लेनदेन कर लो, नई सवारी बिठा लो, तबहीं टस से मस होना, कोई का करी, दायें बायें से निकल ही जाई, घर का कूड़ा गली, सड़क जहाँ मर्जी होय फेंको, पूरी आजादी है, कूड़ा उठाने वाला भी आज़ाद है जब मर्जी होई तब आई ! ऑटो वाले, स्कूटर मोटरसाइकिल वाले, सबको जल्दी है, आपकी गाड़ी के आगे चोंच घुसाकर बीच में घुस आयेंगे, आगे निकल जाएंगे किसी प्रतियोगिता की तरह, वे भी आज़ाद हैं, देश में एकाध प्रदेशों को छोड़कर किसी ऑटोवाले के पास मीटर नहीं है, मुँहमाँगा दाम ! वो भी आज़ाद हैं !

एम्बुलेंस और फायरब्रिगेड वाले भी आज़ाद! मरीज मरने की कगार पर आ जाये तब उसके दर्शन होंगे और फायरब्रिगेड तो राख बुझाने तक पहुँच पाती है! ट्रैफिक का कोई नियम कहीं लागू नहीं होता कि आपके पीछे का वाहन बाएं से ओवरटेक करेगा कि दायें से, जहाँ से जगह मिले वहाँ से निकाल लो, देसी भाषा में कहें तो ‘‘घुसाय’’ दो, जाम लगता है तो लगे ! ट्रैफिक पुलिस भी वसूली के लिए ट्रक, ट्रैक्टर और नए लड़कों को ताड़े रहती है, चौराहे से अलग किनारे की तरफ खड़े हो जाते हैं, आखिर उन्हें भी तो धूप लगती है, वसूली का काम किनारे पर अच्छे से होता है, आखिर उसे भी तो शाम को अच्छी जगह ड्यूटी लगाने वाले अफसर से मिलना है,  घरवालों को अपना हँसता चेहरा और मुस्कुराती जेब भी दिखानी है !

अब संसद, राज्यसभा और विधानसभाओं में भी झाँककर देखते हैं, बड़ा हो हल्ला मचा है भाई ! यहाँ तो नज़ारा ही बदला हुआ है प्यारे! एक तरफ की टीम तो बड़ी आज़ादी के साथ डायलॉग पर डायलॉग बोल रही है- जैसे किसी ज़माने में फ़िल्म अभिनेता राजकुमार बोला करते थे, जगह भी हमारी, बंदूक भी हमारी और गोली भी हमारी!! चलो समझते हैं……! अच्छा ! तो ई हुआ- बड़े सरकार को बहुमत नहीं मिला, दो भाड़े के लड़ाके मंहगे दामों में लाये हैं, फिर भी…! ये विपक्ष वाले उनका गला दबा देंगे क्या? वो चीख रहे हैं, बचाओ-बचाओ….ये मेरा गला दबा रहे हैं बोलने नहीं दे रहे हैं ! उफ्फ्फ ! इतनी दयनीय स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया विपक्ष वालों ने, ज़रा सी ताकत क्या मिल गई, पहलवानी पर उतर आए! न-न भाई ऐसा न करो ! आखिर माननीय तुम सबको बता चुके हैं वो नॉन बायोलॉजिकल हैं, उन्हें ईश्वर से संकेत मिलते हैं, एक आप लोग हैं जो मानने को तैयार नहीं हैं ! अरे भाई….! अवतार पुरुष इस कलयुग में गुलामी में तो पैदा ही नहीं हुए! तभी तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी आज़ादी के तीन वर्ष बाद इस तथाकथित अभिशप्त मुल्क में इसके उद्धार हेतु प्रकट हुए थे ! कितने-कितने महानतम कार्य किये हैं आदरणीय ने ! हमारी सोच से भी परे…! जिनके वे चश्मदीद भी हैं, गोधरा कांड, पुलवामा कांड, सर्जिकल स्ट्राइक, श्रीराम को हाथ पकड़कर अयोध्या लाने का काम, इलेक्ट्रॉल बांड जैसे उल्लेखनीय काम ! जो काम कांग्रेस 60 वर्षों में नहीं कर पाई वो माननीय ने 10 वर्षों में करके दिखा दिया, बीजेपी को दुनिया की सबसे अमीर पार्टी बना दिया, अमीरी का यह रिकॉर्ड सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि दुनिया भर में विश्वगुरू का डंका बज रहा है, हम सभी को गर्व करना चाहिए कि विश्व के 10 महानतम धनी लोगों में 2 भारतीयों को यह उपलब्धि हासिल हुई है, ये माननीय के अथक प्रयासों का परिणाम है, अब इन दोनों धनी लोगों को अर्थात ‘‘ख्यात’’ लोगों के आगे आपको ‘‘कु’’ जोड़ना है या ‘‘वि’’, इसके लिए आप सभी आज़ाद हैं !

जबसे राजा ने सिंहासन संभाला है हर चीज़ बुलन्दी पर है, हर विपक्षी पार्टी के नेता का डर बुलन्दी पर है, बेरोजगारी, मँहगाई, शिक्षा का गिरता स्तर, पेपरलीक, रेल दुर्घटनाएँ, घूसखोरी,असंसदीय भाषा का प्रयोग, झूठे प्रचार आदि-आदि, कहाँ तक बखान करूँ, सब बुलन्दी में हैं, फिर भी विपक्ष कहता है विकास नहीं, कितना विकास है… 

हर तरफ हाई-वे हैं, टनल हैं , अब ये दो चार पुल ढह जाने, एयरपोर्ट के मेट्रो पुल टूट जाने से क्या ? टनल से क्या, पहाड़ तो धसकते रहते हैं! अब नये संसद का भवन पानी-पानी हो गया तो क्या आपके घर सीलन नहीं आती ? एक बड़ा सा तिरपाल लग जायेगा, इतना हो हल्ला क्यूँ है भाई! सबकी तरह इन सब योजनाओं के ठेकेदार भी आज़ाद हैं, जैसे तलघर में कोचिंग चलाने वाले आज़ाद हैं, उनको अनुमति देने या न रोकने  वाले दोनों आज़ाद हैं !

लेकिन माननीय भी आज़ाद तबियत के हैं उन्हें अपनी आज़ादी में कोई दख़ल बर्दास्त नहीं है, अब ये कई वर्षों की बिना टोका-टाकी की आदत पड़ी है, अब एकदम से क्या ख़ाक बदलेगी, वो कहावत है न ‘‘बन्दर क्या बुढ़ापे में कुलाटी मारना सीखेगा ! सो भाई ! उन्होंने भी एक दो बागड़बिल्लों और एक बागड़बिल्ली पाल रखी है, उनकी हर गलती पर उनकी पीठ थपथपाने का काम उनकी आदत में शुमार है, अब उनकी वजह से कोई नई मुसीबत गले पड़ जाएगी, ये सोच ही नहीं पाते, क्योंकि वे भी अभी आज़ाद हैं ! किसी भी प्रश्न का उत्तर न देने के लिए आज़ाद हैं, ईडी, सीबीआई, इनकमटैक्स जिसको जैसा चाहें ऊँगलियों पर नचा सकते हैं! लेकिन सुना है इन विभागों में भी कुछ लोग इस चंगुल से आज़ाद होना चाहते हैं, शायद उन्हें माननीय उच्चतम न्यायालय का बड़ा सा हंटर दिखाई देने लगा है !

संसद में भी मौखिक मल्लयुद्ध हो रहा है,कभी-कभी लगता है ये वास्तविक मल्लयुद्ध में प्रवेश न कर जायें ! जैसे राजा जरासंघ को अजेय बनने के लिए 100 राजाओं की बलि देनी थी, बस एक दो कम रह गए थे, बाकी उनके कारागार में बंद थे ! अब ये श्रीकृष्ण जनता के रूप में भीम को हाथों में थामकर ले आये ! वो भी महाबली भीम (माननीय भीमराव अंबेडकर द्वारा सृजित संविधान), अब जरासंघ मना तो नहीं कर सकते, ये नियम विरुद्ध था, अब पूरे जोश में मल्लयुद्ध चल रहा है, भीम तो हर दाँव में भारी पड़ रहे हैं, ये तो युद्ध की शुरुआत है अब देखना है द्वापर की कथा कलयुग में दोहराई जाती है या नहीं ?

बजट पर विचार-विमर्श, चर्चा कहूँ कि प्रतिरोध चल रहा है, हर बात, हर विषय पर सवाल है, प्याज के दाम क्यों इतना ज्यादा हैं, उन्होंने भी कह दिया वो प्याज़ नहीं खातीं, अब जब माननीया वित्तमंत्री जी प्याज खाती ही नहीं तो उन्हें प्याज से क्या मतलब ? वो तो अपना मुँह छिपा लेती हैं! अब हेज के तमाम सवाल हैं विपक्षियों ने तो उसे गब्बर सिंह टैक्स नाम दिया है, सत्ता-पक्ष के एक नामचीन मंत्री ने ही बजट की आलोचना लिखित रूप में की है, सच भी है बच्चों की किताबों में 18 प्रतिशत टैक्स, किसानों पर 18 प्रतिशत टैक्स,प्रॉपर्टी टैक्स, मरने वालों पर टैक्स, अगरबत्ती जो मंदिर और मजारों, गुरुद्वारों पर चढ़ाई जाती है उस पर टैक्स, और तो और ईश्वर का भोजन है हवन, हवन के लिए हवन सामग्री पर 5 प्रतिशत टैक्स, भगवान का व्यापार करने वालों ने भगवान के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया ! बात तो सही है !

लेकिन सही गलत क्या है, सत्ता पक्ष के लोग जानना नहीं चाहते, और जानें भी तो क्यूँ जाने ? ये टैक्स खत्म होंगे तो फिर आंध्र प्रदेश और बिहार राज्यों के पैकेज का क्या होगा? पैकेज नहीं दिया तो सरकार का क्या होगा ? आखिर इस विपक्ष (प्रतिपक्ष नहीं) को कुछ तो सोचना चाहिए! अभी अमृतकाल में ये हाल है तो आगे कौन सा काल आएगा ! ये भी जो मन में आया बोल दिए, फ़िल्म वालों से पूछ लेते, जो फ़िल्म हिट होती है पहले उसे सिल्वर जुबली, फिर गोल्डन जुबली, उसके बाद प्लेटिनम जुबली का दर्ज़ा दिया जाता है, अब अमृत के बराबर तो विष ही खड़ा रहेगा! लगता है 2047 का मिशन का नाम परमाणु अमृतकाल रखना पड़ेगा !

अब किसानों को 6000/- सालाना देना है, अब उन्हीं से 18000/- नहीं वसूले तो देश कैसे चलेगा ! और ये विपक्ष वालों ने जाने क्या-क्या सब्जेक्ट बना रखे हैं ‘‘नीट’’ पेपर लीक!! अरे भाई ! जब नई संसद भवन की छत लीक है, तमाम पुल टूट गए, अयोध्या की सड़क धंस गई, भगवान राम का मंदिर लीक हो गया, तो ‘‘नीट’’ क्या है, थोड़ी सीमेंट से ये भी भर जाएगा! आप खामखाँ पीछे पड़े हैं माननीय शिक्षा मंत्री तो कह रहे हैं पेपर लीक ही नहीं हुआ! जो कह दिया सो कह दिया ! चिल्लाते रहो !

अब आपस में ही कानाफूसी चल रही है, ‘‘अग्निवीर योजना’’ कितना अच्छा नाम रखा था, लेकिन ये विपक्ष वालों ने सब गुड़गोबर कर दिया,  ये चार साल की जगह आठ साल की कर देंगे,अब इस अस्थायी नौकरी में उसे ‘‘शहीद’’ क्यों कहें, काहे की पेंशन, काहे की ग्रेच्युटी, मरने वाले तो मरते ही रहते हैं, 10 सालों में जब 140 करोड़ को झुनझुना पकड़ाया, वो तो कुछ बोल नहीं पाए, अब ये 235 क्या कर लेंगे ! हुँह !! जो कहना है कहने दो, करेंगे वही जो हम चाहते हैं, वही कर भी रहे हैं !

संसद का स्पीकर लोकतंत्र के मंदिर का न्यायाधीश होता है, वो भी साहिब की पार्टी का है ! उसकी तराजू में पहले से ‘‘पसंगा’’ है, मगर विपक्ष वाले अब होशियार हो गये हैं कभी-कभी वो ‘‘पसंगा’’ निकाल लेते हैं जो चुम्बक की तरह तराजू के नीचे चिपका रहता है, वो खिसियाई हंसी हँसकर बात बदल लेते हैं, इस बार शायद उन्हें भी अपनी कुर्सी जाने का डर सता रहा है ! पिछली बार तो उन्होंने सांसदों की बर्खास्तगी का विश्व कीर्तिमान बनाया था, लेकिन अब ये नामुमकिन हो चला है !

अब नज़र माननीय की तरफ जाती है,कैसी बेचौनी है, कैसी चिंता की लकीरें माथे पर झलक रही हैं, ये दी साल पहले वाले तो नहीं दिख रहे, सारी दहाड़ लुप्तप्राय दिख रही है ! आखिर किया क्या है उन्होंने – जनता को कितनी बार बड़े प्यार से मंगलसूत्र से लेकर मुजरा तक की विस्तृत परिभाषा समझाई थी, जब मंगलसूत्र में ही मणियां लगी होती हैं तो ‘‘मणिपुर’’ की बातें क्यों हों ! जो बीत गया वो जाने दो ! इस देश में 142 करोड़ से अधिक आबादी है, उसमें 50 प्रतिशत से अधिक होनहार युवा हैं, जिनमें से लगभग 45 करोड़ बेरोजगार घूम रहा है ! माननीय ने 80 करोड़ लोगों के पेट से 5 किलो अनाज तो बांध दिया है, अब काहे ‘‘चिल्ल-पों मचाये’’ हो ! इतने सारे लोगों को नौकरी तो नहीं दी जा सकती, अब अगर सब आईएएस, पीसीएस,आईपीएस, इंजीनियर बन जाएंगे तो ई-रिक्शा कौन चलायेगा, ऑटो कौन चलायेगा ? अरे भाइयों! चाय -पकौड़ा बेचो, सब्जी बेचो, फुटपाथ पर कपड़े बेचो, गाने-बजाने का काम करो, मदारी का खेल दिखाओ ! और चाय पकौड़ा, चाट बनाने में कोई ज्यादा खर्चा भी नहीं है, फायदा बहुत है ! चाय पकौड़ा बनाने में गैस भी नहीं लगनी, नाले के किनारे ठेली लगाओ, चार-पाँच मीटर प्लास्टिक पाइप ले आओ, पाइप नाले में डुबो दो, गैस आने लगेगी, चूल्हा जलने लगेगा, वाआआह ! क्या आइडिया दिया है माननीय ने यही नहीं विदेशों तक में माननीय ने भारतीयों का देशी जुगाड़ भी बताया, नाला न हो तो किसी ट्रैक्टर के टायर का पुराना ट्यूब ले आओ, उसमें गोबर गैस भर लो,दुकान चालू, ये है मेक इन इंडिया आइडिया वो भी कमाल का, बहुत आइडिए हैं माननीय के पास लेकिन कोई समझना नहीं चाहता, तो भुगतो ! न-न ये हम नहीं कह रहे, माननीय के रिकॉर्डेड वक्तव्य हैं !

पुराने तज़ुर्बेकार कहते हैं जब कोई रास्ता न मिले तो सीधे किसी थाने में चले जाओ, बड़े साहब के पाँव पकड़ लो, उनसे कहो साहब ! कोई काम दिलवा दो, अफीम, गांजा, चरस, हीरोइन जो भी बेचना हो सब कर लूँगा, बस आप रास्ता बता दो, ये तो उनके बाएं हाथ का काम है, इसलिए कि वो भी आज़ाद है, पुलिस कुछ भी कर सकती है, बिना उसकी मरजी के सही या गलत कोई धन्धा नहीं कर सकता, बड़े व्यापारी हो तो ट्रक में माल आएगा जाएगा, अब नो इंट्री में ट्रक बिना उनकी मर्जी के नहीं घुस सकता, जिसे चाहे थाने में पीट सकती है, एक गलती पर कई धारायें लगा सकती है, अब वो भी बेचारे क्या करें, थाने की बोली लाखों रुपये में होती है, जैसा जिसको थाना चाहिए, वैसा खर्चा देना होता है, वसूली नहीं होगी तो खर्चा आएगा कहाँ से, कुछ अपने और अपने स्टाफ के लिए भी चाहिए, साहब एक तो तुम्हें कोई काम दिला ही देंगे, नहीं तो साहब से विनती करो, किसी केस में अंदर कर दें, वहाँ रोटी पानी सब मिलेगा, जब तक जमानत नहीं कराओगे, तब तक वहीं मजे करो ! ये भी में नहीं कह रहा साहब, ये तो कुछ समाचारों और नेट मीडिया में भी है, रिश्वत किश्तों में !

चलिए घूम फिर कर फिर संसद के अंदर चलते हैं, अरे बाबा ! ई तो बड़ा बवाला है, एक सत्ता पक्ष के नेता विपक्ष के नेता से ‘‘जाति’’ पर सवाल कर रहे हैं, हर तरफ शोर बरपा है, आप जात कैसे पूछ सकते हैं ?? मामला बेहद संगीन है, उलझ गया है, वैसे ये लोकतंत्र के मन्दिर में अशोभनीय है, इस भवन में जहाँ मतगणना जैसे महत्वपूर्ण मामले में चर्चा हो रही हो, वहाँ किसी की ‘‘जात’’ पूछना तो अलग ये बोलना कि ‘‘जात का पता नहीं’’ अत्यंत असंसदीय और किसी के पूरे परिवार को गाली देने जैसा है ! किसी द्वारा  किसी की जाति पर प्रश्न उठाने वालों को ख़ुद अपने गिरेबाँ में झाँक लेना चाहिए, प्रश्न पूछने वाले खुद अपने नाम के आगे ‘‘ठाकुर’’ लगाते हैं, जबकि उनके पिता सरनेम में ‘‘धूमल’’ और उनका भाई भी ‘‘धूमल’’ ही लिखता है ! पर ये जनाब अपना सरनेम ही बदल लेते हैं क्यूँ ?? एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह है ? जिसका जवाब देना आसान नहीं होगा, इस बारे में लोग कुछ कहते भी हैं, शायद इन्हें पता भी है या नहीं ! हमें क्या? आप अपने नाम के आगे पीछे कुछ भी लिखो, पदवी लिखो, जाति का नया नाम लिखो, उपनाम लिखो ! लेकिन साहब को मालूम होना चाहिए कि ‘‘ठाकुर’’ कोई जाति नहीं है, यह भारतीय उपमहा-द्वीप की एक सामन्ती उपाधि है! ‘‘ठाकुर’’ उपाधि की उत्पत्ति मैथिल क्षेत्र के ओइनवार राजवंश से हुई थी, महाराजा जयपति ठाकुर द्वारा सन 1325 ईस्वी में सर्वप्रथम ‘‘ठाकुर’’ उपाधि का प्रयोग किया था, उपनाम ठाकुर का उपयोग अक्सर राजपूत सरदारों और रईसों को दिए जाने वाले सम्मान और अधिकार की उपाधि के रूप में किया जाता था ! शास्त्रों व पुराणों में भी ‘‘ठाकुर’’ शब्द का प्रयोग भी श्रीकृष्ण के बाद ‘‘नाई’’ जाति के लिए किया गया है ! शायद तभी से सर्वाधिक ‘‘ठाकुर’’ उपनाम सैनी (नाई) जाति द्वारा किया जाता है,इसका महत्वपूर्ण उदाहरण भारतरत्न श्री कर्पूरी ठाकुर एवं भिखारी ठाकुर आदि अन्य महापुरुष जो सैन जाति से रहे हैं, उन सभी के उपनाम ‘‘ठाकुर’’ हैं! श्री एस.के .दास द्वारा ठाकुर शब्द का अर्थ ‘‘भगवान’’ सुझाया गया और ब्लेयर बी.क्लिंग द्वारा ‘‘लार्ड’’ और एच. डी. गुरुंग द्वारा ‘‘मास्टर आफ दि एस्टेट’’ !

हमारे हिन्दुस्तान में तो सदियों से हम लोग श्रीकृष्ण और महादेव को ‘‘ठाकुर जी’’ ही सम्बोधित करते आ रहे हैं !

अब जाति पूछने वालों को पहले अपनी जाति पर आश्वस्त हो जाना चाहिए ! कहीं ऐसा तो नहीं हमारे माननीय ने जो नानबायोलॉजिकल हैं, उन्होंने गौर कर लिया हो और सोचा हो मुझे तो भगवान ने भेजा है, ये कहीं ख़ुद भगवान बनकर न बैठ जाये, इसलिए इसको मंत्रिमंडल से दूर रखो, अब शायद कुछ दिनों बाद ये महोदय संसद में भी नज़र न आयें ! माननीय स्पीकर महोदय को ऐसे असंसदीय भाषण करने वाले सांसदों को बर्खास्त करना चाहिए, जबकि बर्खास्त करने में उनका विश्व रिकार्ड है !

चलिये आगे चलते हैं ,ये वाद-विवाद तो चलते ही रहेंगे ! जो भी ऐतिहासिक जानकारी थी आपको प्रदान की है, इसमें मेरी अपनी कोई कल्पना नहीं है, सब किताबों में लिखा है ! मैं तो बस इस संसदीय महाभारत में – संजय उवाच- की तरह हूँ !

बहरहाल लगे रहिये दोस्तों ! कुछ बदला है कुछ और बदलेगा ,इस देश का हर नौजवान चंद्रशेखर आज़ाद है, बब्बर शेर है ! गलत लोगों को ज़्यादा दिन टिकने नहीं देगा ! ऊपर बैठे लोगों को हमारी आवाज़, हमारा दर्द, हमारी ज़रूरतें, हमारी तकलीफें साझा करनी पड़ेंगी ! अब ये देश बदल रहा है, इसकी सोच बदल रही है, आती हुई पीढ़ी को दृढ़निश्चयी भाव से आगे बढ़ना होगा,तभी इस ‘‘अन्धकाल’’ को हम ‘‘अमृतकाल’’ में ले जा सकेंगे ! ऐसा मेरा सुझाव है, प्रार्थना है और अटल विश्वास भी! तब हम सब गर्व से कह सकेंगे! हम सब आज़ाद हैं !!

आपका अपना

पीयूष अवस्थी

 मुख्य सम्पादक शब्दकार पत्रिका /शब्दकार प्रकाशन

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