गण-पूर्ति का खेल

‘गण-पूर्ति का खेल’

- राम नगीना मौर्य,

मौसम में हल्के जाड़े की दस्तक है। काफी-हाउस में गूंज रहे धीमें संगीत के बीच अ, ब और स, जो वर्षों पुराने मित्र हैं, बिलकुल कोने वाली सीट पर बैठे गरमा-गरम, तल्ख बहस में मशगूल हैं। किसी बात पर हारी-बाजी के कारण, नौबत हंसी-मजाक से बढ़कर वाक-युद्ध पर आ गयी है। उनके बीच उत्तेजना, आपसी बड़बड़ाहट, खिसियाहट, झल्लाहट और अहंकार इस कदर तारी है कि कोई किसी की बातें सुनना नहीं चाहता, सभी अपनी कहना चाहते हैं, मानों एक सही है, बाकी दोनों गलत हैं। बहस के बीच ही, शुक्रवार शाम के मीनू में टोस्ट-बटर होने के कारण उन्होंने बैरे से नाश्ते में काॅफी और टोस्ट-बटर मंगवा लिये हैं।

         ताजा स्थिति ये है कि उनकी टेबल पर रखी तीन प्लेटों में परोसे टोस्ट-बटर में से अ ने पूरा, ब ने आधा खाया है। स ने अभी कुछ भी नहीं खाया है। स ने काफी का पूरा कप खत्म कर लिया है। अ और ब अभी भी अपनी काफी सुड़क रहे हैं।

         इससे कयास लगाया जा सकता है कि अ को ज्यादा भूख लगी थी, जिससे उसने जल्दी-जल्दी अपना टोस्ट खत्म कर लिया। या हो सकता है, टोस्ट-बटर उसका प्रिय नाश्ता हो, जिसे सामने देखकर उससे रहा न गया हो, सब-कुछ भूल-भाल कर पहले उसने इस टोस्ट-बटर पर ही हाथ साफ करने की सोची हो? ये भी हो सकता हो कि उसे कहीं जाने की जल्दी हो। ऐसे में बिना दोस्तों की परवाह किये या पूछने की सामान्य औपचारिकता निभाए ही, उसने फटाफट अपना नाश्ता खत्म कर लिया हो। ब को टोस्ट-बटर कुछ कम पसन्द हो, जिससे वो धीमें-धीमें, अनमने ढंग से खा रहा हो। स को भूख एकदम न हो, या उसे टोस्ट-बटर से ज्यादा मजा, काफी पीने में आ रहा हो। ये भी हो सकता है कि स को कहीं जाने की जल्दी ही न हो, जिससे वह अपनी काफी खत्म करने के बाद इत्मिनान से टोस्ट-बटर खाने के मूड में हो।

         बहरहाल…यहां मुद्दा ये नहीं है। हालांकि, उनके बीच मुद्दा कोई खास जटिल भी नहीं है। बस्स, आपसी अविश्वास, अबोलापन कुछ इस कदर घर कर गया है कि वे एक-दूसरे को इस बात के लिए भी समय नहीं दे पा रहे कि अपने बीच बढ़ रही इस सामान्य सी लग रही असहजता, गलतफहमी, खटास को सिरे से दूर कर सकें।

         पर ऐसा भी नहीं कि उन्होंने दिनों-दिन अपने बीच उपज रही ऐसी अवांछित, असहज देश-काल-स्थिति-परिस्थितियों को दूर करने के प्रयास ही न किये हों? ढ़ेरों प्रयास किये हैं। अलग-अलग तरीके भी आजमाये हैं। काहे से कि प्रायः आपसी मुलाकात, फोन पर बातचीत, एक-दूसरे के घर आने-जाने का सिलसिला उनके बीच अभी भी जारी है। गाहे-बगाहे त्यौहार या खुशी के मौकों पर एक-दूसरे को बधाइयां देने की औपचारिकताएं निभाना वे कभी नहीं भूलते।

           आखिर, बाइस-तेइस वर्षों की दोस्ती भला कौन आसानी से तोड़ना चाहेगा। फिर इस शहर में उनका है भी कौन? आखिर, मुश्किल समय में वे ही तो एक-दूसरे के काम आते रहे हैं। उम्मीद है आगे भी परेशानियों में वे एक-दूसरे के मददगार साबित होंगे। देखा जाय तो जहां एक तरफ उन्होंने साथ-साथ लम्बी रातों में रतजगे किये हैं, तो दूसरी तरफ एक-दूसरे की कमी और अकेलेपन को भी बड़ी शिद्दत से महसूस किये हैं। संग-संग गमों की शामें देखी हैं, तो खुशनुमा सुबहों से भी दो-चार हुए हैं। अन्ततः इस नतीजे पर भी पहुंचे हैं कि आगे निकलने की होड़ सी बाजीगरी चाहें जितनी भी कर लें, उनके बीच एक अदृश्य सा बन्धन, हर-हाल में उनमें संतुलन बनाए रखता है। काहे से कि चौहद्दी किसी ने भी कभी नहीं लांघी।

          पर…हाल-फिलहाल-बहरहाल, उनके बीच इन मेल-मिलाप की कवायदों का नतीजा सिफर ही रहा है।

          तभी अ के मोबाॅयल पर एक जरूरी काल…‘‘हां, हलो…?’’

          ‘‘…’’

          ‘‘ओ. के….बस्स अभी निकलता हं।’’

         ‘‘अच्छा पार्टनर, अब मैं निकलता हूँ। ‘ऑय एम टू लेट’…बस-स्टाप पर शुभि मेरा वेट कर रही है।’’

         ‘‘ओ. के….मिलते हैं…बाय…।’’ स ने वहां से जाते हुए अ से हाथ मिलाते कहा।

 

         ‘‘पर, सुनो…?’’ ब ने जैसे अ से कुछ कहना चाहा। लेकिन अ इतनी जल्दी में था कि उसने ब की बात अनसुनी कर दी। ऐसे में वापस स से निगाह मिलते ब को तनिक झेंप भी महसूस हुई।

 

          ब और स से विदा लेकर, अ काफी-हाउस से बाहर आ गया। अब वहां सिर्फ ब और स ही बैठे रह गये। सामने तीन प्लेटें। एक खाली, दो में अभी भी टोस्ट-बटर के अधखाए टुकड़े बचे हैं। काफी के तीन कप। एक खाली, दो कपों में अभी भी थोड़ी-थोड़ी काफी बची है। खाली कप के किनारों पर दो मक्खियां बैठी हैं, दो उसके चतुर्दिक भिनभिना रही हैं, जिससे ध्यानमग्न बैठे ब और स का बीच-बीच में ध्यान भंग हो जा रहा है।

 

          अ के जाने के आठ-दस मिनट बाद ही ब को भी जैसे कोई जरूरी काम याद आ गया। उसका जाना निहायत जरूरी हो गया। ‘‘यार, अभी-अभी याद आया। आज मुझे त्यौहारों की खरीदारी के लिए नैना को शाॅपिंग पर ले जाना था। यहां बातों-बातों में मैं भूल ही गया। मुझे बस्स, अभी निकलना होगा। नैना घर पर मेरा इन्तजार कर रही होगी। ओ. के. बाॅस, कल मिलते हैं। सेम-प्लेस, सेम-टाइम…और हां…अ को भी फोन कर देना।’’

 

         ‘‘ओ. के. पार्टनर।’’ इस तरह स ने ब को भी विदा किया।

 

         ब के जाने के बाद, अब सामने टेबल पर तीन खाली प्लेटों और खाली कप के साथ स अकेला ही बैठा रह गया है। मक्खियों द्वारा ध्यान भंग की कवायद पूर्ववत जारी है। स को यहां अभी आधा-पौन घण्टे और बैठना होगा। उसे अपनी बिटिया की कोचिंग-क्लास के छूटने का इन्तजार है। हफ्ते में तीन दिन, सोम-बुध-शुक्र के लिए उसकी यही ड्यूटी है। शाम को ऑफिस से निकलने के बाद बिटिया को कोचिंग से छूटने पर उसे साथ लेकर घर आना।

 

         ‘‘वेटर! कम हियर…वन मोर काॅफी प्लीज…एण्ड विदाउट सुगर।’’ समय बिताने के लिए स ने गहरी सांस भरते एक एक्स्ट्रा काॅफी और मंगा ली है।

 

         इस मध्य स की दुविधा…‘हमारे बीच ये अविश्वास सा क्यों उत्पन्न हो गया है? सामान्य मसलों पर भी हम छोटी-से-छोटी बातें एक-दूसरे से साझा नहीं कर पा रहे। पहले तो हम ज्यादातर मसलों पर एक-दूसरे की राय लेते, गूढ़-गम्भीर मसलों पर सलाह-मश्विरा करते, आपसी सहमति-असहमति को पूरा सम्मान देते थे। ये ठीक है कि हम तीनों की नौकरियां अलग-अलग क्षेत्रों में हैं। एक पत्रकार, दूसरा लेक्चरर और तीसरा एक दफ्तर में बाबू है। हमारे पद और वेतन भी अलग-अलग हैं। हमारे बच्चे भी अपने कैरियर के लिए अलग-अलग फील्ड में हाथ-पांव मार रहे हैं, पर हमारे बीच अविश्वास की वजहें ये तो नहीं हो सकतीं? भले ही हमारी पृष्ठभूमि, मेहनत, हमारी आदतें, फितरतें, रवायतें अलग-अलग हैं। हमारी सफलता, असफलता, पद-प्रतिष्ठा, ये सब भाग्य और कर्मों का मिला-जुला खेल है। लेकिन दोस्तों के बीच भला इन सब बातों के क्या मायने? जब हमने दोस्ती करते समय इन बातों पर गौर नहीं किया, तो इधर कुछेक बरसों में ऐसा क्या हुआ, जो हमारे सम्बन्ध अब महज दिखावे से, औपचारिक से बनकर रह गये हैं? ये भी कटु-सत्य है कि हमारे बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल अभी भी बदस्तूर जारी है।’

 

         ‘…अ को कहीं से झूठी काल तो नहीं आयी थी? या क्या पता वो हमारे साथ ज्यादा देर तक बैठना ही न चाहता हो। उसे कहीं जाने की जल्दी न हो। पर मौका देखकर पत्नी को मिस्स्काॅल कर दिया हो। ऐन मौंके पर पत्नी से काॅल-बैक करने के लिए इशारा कर दिया हो। फिर, ब को भी तो देखो! उसे अचानक ऐसा कौन सा जरूरी काम आ गया जो मुझे यहां अकेला छोड़कर चला गया। घड़ी-दो-घड़ी साथ बैठता तो शायद बर्फ पिघलती। मनसायन रहता। अ के जाते ही तुरत-फुरत टोस्ट-बटर और काॅफी, खा-पीकर, वो भी चलता बना। शाॅपिंग-वाॅपिंग, कल सेकेण्ड-सैटरडे, सण्डे में भी तो हो सकती है? त्यौहार आने में तो अभी एक हफ्ता बाकी है। फिर, मुझे भी तो त्यौहारों की खरीदारी करनी है। मैं तो इतनी हड़बड़ी में नहीं हूँ? हम तो वर्षों से यहां काफी-हाउस में बैठते-गपियाते रहे हैं। वो भी घण्टों…।’ बिटिया की कोचिंग छूटने के इन्तजार में जम्हाई लेते, स के मन में आलोड़न-विलोड़न जारी है।

 

         उधर स्कूटर पर सवार, घर पहुंचने की जल्दी में ताबड़-तोड़ गियर बदलते, एक्सीलरेटर ऐंठते ब के मन में अजीब सी उलझन है।…‘स को कहीं ये तो नहीं लगा होगा कि अ के पीछे वह भी बहाने से खिसक रहा है। अ और ब कहीं और जाकर बतियाने, बैठने के मूड में हों? मैंने गौर किया था। काॅफी-हाउस से निकलते वक्त अ के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी। आजकल, मुझे लेकर अ और स किसी-न-किसी बात पर, कभी-कभी एक-दूसरे की ओर कनखियों ताकते, एक-दूसरे का पक्ष लेते, कुटिलतापूर्वक ऐसे मुस्किया देते हैं जैसे मैं निरा बुद्धू हूँ। मैं तो बस्स…खिसियाकर ही रह जाता हूँ। कहीं वो दोनों मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रहे? या मुझसे कुछ छिपा तो नहीं रहे? पर, ये भी तो हो सकता है, मेरा ऐसा सोचना गलत भी हो? अ को ये भी तो आभास हो सकता है कि उसके जाने के बाद वहां सिर्फ ब और स ही बैठे रह गये हैं। उसके जाने के बाद पता नहीं ब और स के बीच क्या-कुछ छन-पक रहा हो?’ ब के मन में चल रहीं ये ऊभ-चूभ सी बातें भी अजब-गजब हैं।

 

         जबकि सच्चाई यही है कि अ के काफी-हाउस से जाने के आठ-दस मिनट बाद ही, कोई जरूरी काम याद आने की वजह बताकर या शायद पत्नी को शापिंग कराने का बहाने बताते, हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, वो तो ब ही जानता होगा, ब भी वहां से चला गया था।

 

         उधर शुभि के साथ बैठकर घर की ओर जाते अ के मन में तो अलहदा ही दुविधा चल रही है। ‘काफी-हाउस से निकलने के बाद पता नहीं मेरे बारे में ब और स क्या-कुछ बतियाते, गुल खिला रहे होंगे? कहीं वो दोनों मेरी पत्नी का फोन आने, मेरे वहां से निकलने का इन्तजार तो नहीं कर रहे थे? मैं वहां से जाऊं, और वो दोनों मजे से सिप-सिप करते, काफी पीते टोस्ट-बटर खाते, बतियाते, काफी-हाउस में आने-जाने वालों को निहारते, उनकी बाडी-लैंग्वेज से उनके बारे में जानने के हमारे द्वारा इजाद किये गये, वर्षों पुराने खेल का चाक्षुस-आनन्द ले रहे हों…? खैर…मुझे क्या लेना-देना, इन सब बातों से? अब किसी के मन में किसी तरह की गलतफहमी पैदा हो ही जाय तो कोई क्या कर सकता है? फिर कहा भी जाता है…‘जो आप पर विश्वास करते हैं, उन्हें स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं, और जो आप पर अविश्वास करते हैं, उन्हें आप लाख विश्वास दिलाइये, परन्तु वे विश्वास करने वाले नहीं।’

 

         कभी-कभी तो इनके बीच का अविश्वास इस कदर बढ़ जाता है कि बड़ी लकीर खींचने के बजाय वे एक-दूसरे की टांग खींचना ज्यादा मुफीद समझते हैं। ये आगे निकलने की होड़, सो-काल्ड दुनियादारी, रोजमर्रा की आपाधापी, भागम-भाग क्या कारण हो सकते हैं? आखिर, कुछ तो कारण हैं, उनके बीच बढ़ रही संकीर्णता, इस तरह के खटास, खोखलेपन, अबोलेपन के? कहां बिला गयीं, उनके बीच वो जोश-खरोश। वो गर्मजोशी। वो कसमें। वो वादे। वो मस्ती भरी बात-बतकहियां। वो मरासिमत। आखिर, कुछ तो गड़बड़ है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे वे अपनी दोस्ती निभाने या कह लीजिए ढ़ोते रहने के लिए अभिशप्त हैं। काहे से कि लोक-जीवन में उनकी दोस्ती को मिली मान्यताएं, उन्हें एक-दूसरे से अलग भी तो नहीं होने देतीं। फिर, उनके बीच के मन-मुटाव को लोग सहजता से स्वीकार भी तो नहीं कर पायेंगे।

 

          वाबजूद ऐसी अलमनाक हकीकतों के ये अक्सर ही यहां बैठे गपियाते दिख जाते हैं। यदि एक यहां पहले से ही बैठा है तो वो दूसरे-तीसरे का इन्तजार करता मिलेगा, और अगर दो बैठे हैं तो वे उस तीसरे का घण्टों इन्तजार करते मिलेंगे। इस बीच चाय-काफी के कितने ही दौर चल चुके होंगे, गिनना मुश्किल है। जाहिरन तौर इनकी ऐसी बैठकियों से काफी-हाउस के मालिक की चांदी-ही-चांदी है।  कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कहीं ये, लोगों को दिखाने वास्ते आपस में गण-पूर्ति का कोई खेल तो नहीं खेलते? इनके हाव-भाव से तो कुछ भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।

 

         ये किसी तरह के अवांतर-प्रसंग नहीं, बल्कि उनके तईं बेहद जरूरी और विचारणीय बिन्दु हैं। अगर उन्हें सुकून की दरकार है, पुराने दिनों में लौटने की उत्कट इच्छा है, तो रिश्तों में आ रही इस शुष्कता, इस खटास, ठण्डेपन का समाधान उन्हें खोजना ही होगा।

 

         एक्चुवॅली पार्टनर…यहां दिक्कत ये है कि अ, ब और स के बीच प्राब्लम क्या है, इस बारे में वो अच्छी तरह जानते हैं। बस्स उसे साझा नहीं करना चाहते। चूंकि ऐसे मामलों में धैर्य और गम्भीरता की अतिशय आवश्यकता होती है। अतः एक-दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुंचाये बिना वे सकारात्मक समाधान चाहते हैं। हां, अति-भावुकता में तो कत्तई कोई फैसला नहीं लेना चाहते। वे व्यावहारिक तरीके, कोई बीच का रास्ता निकालने के पक्षधर हैं।

 

        हालांकि, थोड़ा-बहुत आत्ममंथन किया जाय तो कोई-न-कोई, बीच का रास्ता अवश्य निकल आयेगा। सवाल उनके भूत, वर्तमान और भविष्य का भी तो है। वो कहते हैं न, ‘ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो।’ बस्स जरूरत होती है, सही दिशा, सही समय और सही जगह, सही लोगों को पहचानने की। उन्हें चाहिए कि वे इस ‘सही’ को अपने तरीके डेसिफर कर लें, ताकि उनके बीच सम्बन्धों का संतुलन भी बना रहे, और उनकी जिन्दगी की गाड़ी एक बार फिर से पटरियों पर सरपट दौड़ने लगे। आखिर…सवाल गण-पूर्ति का भी तो है? जो मजा मैदान में बने रहने में है, वो भला मैदान छोड़कर जाने में कहां? फिर…‘लोग क्या कहेंगे?’ जैसे शाश्वत सवालों से उन्हें जूझने की जरूरत ही न पड़े, तो और भी अच्छा। क्योंकि लोगों के पास ऐसे सवालों, ऐसी बातों के लिए फुर्सत-ही-फुर्सत है। आखिर, उनके बीच, दिन-ब-दिन बढ़ रहा मन-मुटाव, उनके चाहने वालों के लिए ‘कन्सर्न’ का विषय भी तो है?

 

         बहरहाल…उनकी समस्या का सन्तोषजनक समाधान निकालने की जुगत भिंड़ाने के इस प्रयास में, एक कहानी की नींव तो पड़ ही गयी।

 

– राम नगीना मौर्य,

5/348, विराज खण्ड, गोमती नगर

लखनऊ – 226010, उत्तर प्रदेश,

मोबायल न0-9450648701,

ई मेल- ramnaginamaurya2011@gmail.com

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